ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
३१४ ज्ञानयोग
३१४ ज्ञानयोग
होना असम्भव है; कारण, वास्तव में यदि इसी नियम से सभी कार्य हो तो प्रत्येक प्राकृतिक नियम के दो अंश हो जायेंगे — कभी तो एक देवता उसे चलाता है, वह चला गया, उसकी जगह और एक आया। किन्तु वास्तव मे हम देखते है कि जो शक्ति हमे खाना पीना देती है वही दैवदुर्विपाक द्वारा अनेकों का संहार भी करती है। यह मत स्वीकार करने मे एक और गड़बड़ यह है कि एक ही समय दो देवता कार्य कर रहे है। एक स्थान पर एक किसी का उपकार कर रहा है, दूसरे स्थान पर दूसरा किसी का अपकार कर रहा है। फिर भी दोनों के बीच सामञ्जस्य बना रहता है—यह किस प्रकार सम्भव है ? अवश्य ही यह मत जगत् के द्वैत तत्व को प्रकाश करने की एक बहुत ही स्थूल प्रणाली मात्र है—इसमे कोई सन्देह नहीं।
अब हम उच्चतर दर्शनों मे इस विषय में क्या सिद्धान्त माना गया है इस पर विचार करेगे। इनमें स्थूल तत्व की बात छोड़कर सूक्ष्म भाव की दृष्टि से कहा जाता है कि जगत् कुछ तो अच्छा है, कुछ बुरा। पहले जो युक्तिपरम्परा हमने ग्रहण की, उसके अनुसार यह भी असम्भव है।
अतएव हम देखते है कि केवल सुखवाद अथवा केवल दुःख-वाद—किसी भी मत के द्वारा जगत् की यथार्थ व्याख्या या वर्णन नहीं होता। कुछ घटनाएँ सुखवाद की पोषक है, कुछ दुःखवाद की समर्थक। किन्तु क्रमशः हम देखेंगे कि वेदान्त मे सभी दोष प्रकृति के कन्धे से हटाकर हमारे अपने ऊपर दिया गया है। और इसी में हमे विशेष आशा भी दी गई है। वेदान्त वास्तव मे अमंगल अस्वीकार नहीं करता। वह जगत् की सभी घटनाओ के सभी अंशों
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का विश्लेषण करता है—किसी भी विषय को छिपाकर रखना नहीं चाहता। वह मनुष्य को एकदम निराशा के सागर मे नही बहा देता। वह अज्ञेयवादी भी नही है। उसने इस सुख-दुःख के प्रतीकार के उपाय का आविष्कार किया है, और यह प्रतीकार का उपाय वज्र के समान दृढ़ भित्ति पर प्रतिष्ठित है। वह ऐसा उपाय नहीं बताता जिससे कि केवल बच्चे का मुँह बन्द कर दिया जाय एवं जिसे वह सहज मे ही समझ ले, ऐसे स्पष्ट असत्य के द्वारा उसकी दृष्टि को अन्धा कर दिया जाय। मुझे याद है, जब मैं बालक था उस समय किसी युवक के पिता मर गये जिससे वह बड़ा गरीब हो गया, एक बड़े परिवार का भार उसके गले पड़ गया। उसने देखा कि उसके पिता के मित्र लोग ही उसके प्रधान शत्रु हैं। एक दिन एक धर्माचार्य के साथ साक्षात् होने पर वह अपने दुःख की कहानी कहने लगा और वे उसको सान्त्वना देने के लिये कहने लगे, “जो होता है अच्छा ही होता है, जो कुछ होता है अच्छे के लिये ही होता है।” पुराने घाव को जिस प्रकार मखमल के कपड़े से ढक रखना होता है, धर्माचार्य की उपर्युक्त बात भी ठीक वैसी ही थी। यह हमारी अपनी दुर्बलता और अज्ञान का परिचय मात्र है। छः मास के बाद उसी धर्माचार्य के घर एक सन्तान हुई, उसके उपलक्ष्य मे जो उत्सव हुआ उसमे वह युवक भी निमंत्रित था। धर्माचार्य महोदय भगवान् की पूजा आरम्भ करके बोले—‘ईश्वर की कृपा के लिये उसे धन्यवाद है।’ तब युवक उठकर बोला—‘यह क्या कह रहे हैं? उसकी कृपा कहाँ है? यह तो घोर अभिशाप है।’ धर्माचार्य ने पूछा—‘वह कैसे?’ युवक ने उत्तर दिया—‘जब मेरे पिता की मृत्यु हुई तब ऊपर ऊपर अमंगल होने पर भी उसे आपने मंगल कहा था। इस
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समय आपकी सन्तान का जन्म भी यद्यपि ऊपर ऊपर आपको मगल सा लग रहा है किन्तु वास्तव मे मेरी दृष्टि से यह महा अमंगलकारी मालूम होता है।' इसी प्रकार जगत् के दुःख-अमगल को ढक रखना ही क्या जगत् का दुःख दूर करने का उपाय हो सकता है ? स्वयं अच्छे वनो और जो कष्ट पा रहे है उनके ऊपर दया करो। जोड जाड करके रखने की चेष्टा मत करो, उससे भवरोग दूर नहीं होगा। वास्तव मे हमे जगत् के बाहर जाना पडेगा।
यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है। किन्तु इन सभी व्यक्त भावों के पीछे—इन सब विरोधी भावो के पीछे वेदान्त उसी एकत्व को देखता है। वेदान्त कहता है, बुराई छोडो, और भलाई भी छोडो। ऐसा होने पर शेष क्या रहा ? वेदान्त कहता है कि केवल अच्छे बुरे का ही अस्तित्व है यह बात नहीं। इनके पीछे एक ऐसी वस्तु रहती है जो वास्तव मे तुम्हारी है, जो वास्तव मे तुम्हीं हो, जो सब प्रकार के शुभ और सब प्रकार के अशुभ के बाहर है। वही वस्तु शुभ और अशुभ रूप मे प्रकाशित हो रही है। पहले इसको जान लो—तभी, और केवल तभी तुम पूर्ण सुखवादी हो सकते हो। इसके पूर्व नही। ऐसा होने पर ही तुम सभी पर विजय प्राप्त कर सकते हो। इन्हीं आपातप्रतीयमान व्यक्त भावो को अपने अधीन करो, तब तुम उस सत्य वस्तु को इच्छानुसार जैसा चाहो प्रकाशित कर सकोगे। तभी तुम उन्हे चाहे शुभ रूप मे, चाहे अशुभ रूप मे जैसी इच्छा हो प्रकाशित कर सकोगे। किन्तु पहले तुम्हे स्वय अपना ही प्रभु बनना पड़ेगा। उठो, अपने को मुक्त करो, इस समस्त
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नियमो के राज्य के बाहर जाओ, कारण ये नियम प्रकृति के सभी अशो मे व्यापक नहीं है, वे तुम्हारे वास्तविक स्वरूप को बहुत कम प्रकाशित करते है। पहले अपने को समझो कि तुम प्रकृति के दास नही हो, न कभी थे, न कभी होओगे—प्रकृति यो तो अनन्त मालूम पडती है अवश्य, किन्तु वास्तव मे वह ससीम है। वह समुद्र का एक विन्दु मात्र है, और तुम्ही वास्तव मे समुद्र रूप हो, तुम चन्द्र, सूर्य, तारे सभी के अतीत हो। तुम्हारे अनन्त स्वरूप की तुलना मे वे केवल बुदबुदो के समान है। यह जान लेने पर तुम अच्छे और बुरे दोनो पर विजय पा जाओगे। तभी तुम्हारी दृष्टि एकदम परिवर्तित हो जायगी, तब तुम खडे हो कर कह सकोगे, 'मंगल कितना सुन्दर है और अमगल कितना अद्भुत है!'
वेदान्त यही करने को कहता है। वेदान्त 'यह नहीं कहता कि स्वर्णपत्र से घाव के स्थान को ढॉक कर रक्खो, और घाव जितना ही पकता जाय उसे और भी स्वर्णपत्रो से मढ दो। जीवन एक कठिन समस्या है इसमे सन्देह नहीं। यद्यपि वह वज्र के समान दुर्भेद्य प्रतीत होता है, तथापि यदि हो सके तो इसके बाहर जाने की चेष्टा करो—आत्मा इस देह की अपेक्षा अनन्त गुना शक्तिमान है। वेदान्त तुम्हारे कर्म-फल के लिये दूसरे देवता पर दायित्व नही डालता, वह कहता है, तुम स्वय ही अपने अदृष्ट के निर्माता हो। तुम अपने कर्म-फल से अच्छे और बुरे दोनो ही फल भोग करते हो, तुम अपने ही हाथो से अपनी आँख मूँद कर कहते हो—अन्धकार है। हाथ हटाओ—तुम्हे प्रकाश दिखेगा। तुम ज्योतिस्वरूप हो—तुम पहले से ही सिद्ध हो। अब हम—'मृत्यो. स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' 'इस श्रुति का अर्थ समझ पा रहे हैं।