ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
३१० ज्ञानयोग
३१० ज्ञानयोग
क्रमसंकोच से। बालक क्रमसंकुचित मनुष्य है और मनुष्य क्रमविकसित बालक है। क्रमसंकुचित वृक्ष ही बीज है और क्रमविकसित बीज ही वृक्ष। सभी प्रकार के जीवन की उत्पत्ति की सम्भावना उन्हीं के बीज मे है। अब यह समस्या कुछ सरल हो जाती है। अब इसी तत्त्व के साथ पूर्वोक्त समुदाय जीवन की अखण्डता की आलोचना करो। क्षुद्रतम जीवाणु से लेकर पूर्णतम मानव पर्यत वस्तुतः एक ही सत्ता है—एक ही जीवन वर्तमान है। जिस प्रकार एक ही जीवन मे हम शैशव, यौवन, वार्धक्य आदि विविध अवस्थाये देखते है उसी प्रकार शैशव अवस्था के पीछे क्या है यह देखने के लिये विपरीत दिशा मे अग्रसर होकर देखो, देखते जाओ जब तक कि तुम जीवाणु तक न पहुँच जाओ। इसी प्रकार इस जीवाणु से लेकर पूर्णतम मानव पर्यंत मानो एक ही जीवन-सूत्र विराजमान है। इसी को क्रमविकास कहते है और यह हम पहले ही देख चुके है कि प्रत्येक क्रमविकास से पूर्व ही एक क्रमसंकोच रहता है। जो जीवनी शक्ति क्षुद्रतम जीवाणु से लेकर धीरे धीरे पूर्णतम मानव अथवा पृथिवी पर आविर्भूत ईश्वरावतार रूप मे क्रमविकसित होती है वह सम्पूर्ण शक्ति अवश्य ही सूक्ष्म रूप से जीवाणु मे अवस्थित थी। यह समस्त श्रेणी उसी एक जीवन की ही अभिव्यक्ति मात्र है, और यह समुदाय व्यक्त जगत् उसी एक जीवाणु मे अव्यक्त भाव से निहित था। यह समस्त जीवनी शक्ति, और तो क्या, मर्त्य लोक मे अवतीर्ण ईश्वर तक इसमे अन्तर्निहित थे। अवतार श्रेणी के मानव तक इसके अन्दर निहित थे; केवल धीरे धीरे—बहुत धीरे क्रमशः उन सब की अभिव्यक्ति हुई है। जो सर्वोच्च चरम अभिव्यक्ति है वह भी अवश्य ही बीज भाव से सूक्ष्माकार मे उसके अन्दर मौजूद थी—फिर ऐसा होने पर यह जो एक शक्ति से सभी श्रेणियाँ
अमरत्व ३११
या शृंखलाये आती है, वह किसका क्रमसंकोच है? यह उसी सर्वव्यापिनी जगन्मयी जीवनी शक्ति का क्रमसंकोच था, और यह जो क्षुद्रतम जीवाणु नाना प्रकार के जटिल यत्रो से युक्त उच्चतम बुद्धिशक्ति के आधाररूप मनुष्य के आकार में अभिव्यक्त हो रहा है, कौन सी वस्तु क्रमसंकुचित होकर इस जीवाणु के आकार में स्थित थी? वह सर्वव्यापी जगन्मय चैतन्य ही है-वही उस जीवाणु मे क्रमसंकुचित होकर वर्तमान था। वह सम्पूर्ण पहले से ही पूर्ण भाव से वर्तमान था। वह थोडा थोड़ा करके बढ़ रहा था यह बात नही है। बढ़ने की बात को मन से एकदम निकाल दीजिये। वृद्धि कहने से ही मालूम होता है कि कोई वस्तु बाहर से आ रही है। वृद्धि मानने पर पूर्वोक्त गणित के सिद्धान्त को अर्थात् जगत् की शक्तिसमष्टि सर्वदा सर्वत्र समान है, इसे अस्वीकार करना होगा। इस जागतिक सर्वव्यापी चैतन्य की कभी वृद्धि नहीं होती, यह तो सदा ही पूर्ण भाव से विद्यमान था, केवल अभिव्यक्ति यहाँ पर हुई। विनाश का अर्थ क्या है? यह एक गिलास है। मैने इसको भूमि पर फेंक दिया और वह चूर चूर हो गया। अब प्रश्न है कि गिलास क्या हुआ? वह केवल सूक्ष्म रूप मे परिणत हो गया, बस। तो विनाश का अर्थ हुआ स्थूल की सूक्ष्म भाव मे परिणति। उसके उपादानभूत परमाणु एकत्र होकर गिलास नामक कार्य मे परिणत हुए थे। वे अब अपने कारण में चले गये और इसीका नाम विनाश है अर्थात् कारण मे लय हो जाना। कार्य क्या है? कारण का व्यक्त भाव। अन्यथा कार्य और कारण मे स्वरूपतः कोई भेद नही है। फिर इसी गिलास की बात लीजिये! यह अपने उपादानो और अपने निर्माता की इच्छा के महयोग से बना है। ये दोनों ही उसके कारण है और उसमे वर्तमान
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हैं निर्माता की इच्छाशक्ति अब, उसमें किस रूप मे विद्यमान है ? संहतिशक्ति ( Adhesion ) के रूप मे ।
यह शक्ति न रहने पर इसका परमाणु अलग अलग हो जाता। तो कार्य क्या हुआ ? वह कारण के साथ अभेद है, केवल उसने एक दूसरा रूप धारण कर लिया है। जिस समय कारण निर्दिष्ट समय के लिये अथवा निर्दिष्ट स्थान के अन्दर परिणत, घनीभूत और सीमाबद्ध भाव से रहता है उस समय वही कारण कार्य कहलाता है। इस बात को हमें ध्यान में रखना चाहिये। इसी तत्त्व को हमारी जीवनसम्बन्धी जो धारणा है उसमें प्रयुक्त करने पर हम देखते हैं कि जीवाणु से लेकर पूर्णतम मानव पर्यन्त सभी श्रेणियाँ अवश्य ही उसी विश्वव्यापिनी प्राणशक्ति के साथ अभिन्न हैं। किन्तु अमृतत्व के सम्बन्ध मे जो प्रश्न था वह अभी मिटा नहीं। हमने क्या देखा ? पूर्वोक्त विचार द्वारा हमने इतना ही देखा कि जगत् का कोई पदार्थ ध्वस्त नहीं होता। नूतन कुछ भी नहीं है, होगा भी नहीं। वही एक ही प्रकार की वस्तुये पहिये के समान बार बार उपस्थित हो रही है। जगत् मे जितनी गति है वह सभी तरंग के आकार में एक बार उठती है, फिर गिरती है। कोटि कोटि ब्रह्माण्ड सूक्ष्मतर रूप से प्रसूत हो रहे है—स्थूल रूप, धारण कर रहे हैं। फिर लय होकर सूक्ष्म भाव धारण कर रहे है। फिर इसी सूक्ष्मभाव से उनका स्थूल भाव में आना—कुछ दिनों तक उसी अवस्था मे रहना और फिर धीरे धीरे उसी कारण मे जाना। जाता क्या है ? केवल रूप, आकृति। वह रूप नष्ट हो जाता है किन्तु फिर आता है। एक हिसाब से समझा जाय तो यह शरीर तक अविनाशी है। एक हिसाब से सभी शरीर
अमरत्व ३१३
और सभी रूप नित्य हैं। मान लो कि मैं पासा खेल रहा हूँ। मान लो कि ६-५-३-४ आये। मै और खेलने लगा। खेलते खेलते एक समय ऐसा अवश्य आयेगा जब ये ६-५-३-४ इसी क्रम से आयेंगे। और खेलो, फिर ये आयेंगे किन्तु देर मे। मै जगत् के प्रत्येक परमाणु की एक एक पासे से तुलना करता हूँ। उन्हीं को बार बार फेका जा रहा है, और वे वार वार नाना प्रकार से गिरते हैं। आपके सम्मुख जो समस्त पदार्थ है वे सब परमाणुओं के एक विशिष्ट प्रकार के सन्निवेश से उत्पन्न है। यह गिलास, यह मेज, यह जलघट, ये सभी वस्तुये परमाणुओं का समवायविशेष है—क्षण भर के बाद शायद यह समुदाय-विशेष नष्ट हो जा सकता है। किन्तु एक समय ऐसा अवश्य आयेगा जब ठीक यही समवाय आकर उपस्थित होगा—जब आप सब इसी तरह बैठे होगे और यह जलघट अथवा अन्य वस्तुये जो कुछ भी है वे सभी यथास्थान रहेगी और ठीक इसी विषय की आलोचना होगी। अनन्त वार इसी प्रकार हुआ है और अनन्त वार इसी प्रकार होगा। यहाँ तक हमने स्थूल जगत् की—वाह्य वस्तुओं की आलोचना की। हमने क्या देखा? यही कि इन भौतिक पदार्थसमूहों की विभिन्न समवाय मे पुनरावृत्ति अनन्त काल तक होती रहती है।
इसके साथ ही साथ और एक प्रश्न उठखडा होता है—भविष्य को जानना सम्भव है या नहीं। आप लोगों ने शायद ऐसे आदमी को देखा है जो मनुष्य के अतीत व भविष्य की सारी बाते बतला देता है। यदि भविष्य किसी नियम के अधीन न हो तो किस प्रकार भविष्य के सम्बन्ध में हम कह सकते हैं? परन्तु हमने पहले ही देखा है कि भविष्य मे बीती घटनाओ की ही पुनरावृत्ति होती है। जो भी हो
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इससे आत्मा का कुछ बनता बिगड़ता नहीं। हिण्डोले की बात याद करो। वह लगातार घूमता रहता है। कई आदमी आते है और उसके एक एक पालने में बैठ जाते है। झूला घूमकर फिर पलट आता है। वे जब उतर गये तो दूसरा एक दल आ बैठा। क्षुद्रतम जन्तु से लेकर उच्चतम मानव तक प्रकृति का प्रत्येक रूप ही मानो ऐसे एक एक दल हैं, और प्रकृति एक बड़ा झूला है तथा प्रत्येक शरीर या रूप इस झूले के एक एक पालना जैसा है। नई आत्माओं का एक एक दल उन पर चढ रहा है और जब तक उनको पूर्णता प्राप्त नहीं होती तब तक अधिकाधिक उच्च पथ मे उनकी गति है और अन्त में झूले से वे बाहर आती है किन्तु झूला निरन्तर चलता रहता है—हमेशा दूसरे लोगों को ग्रहण करने के लिए तैयार है। एवं जब तक शरीर इस चक्र के भीतर, इस झूले के भीतर अवस्थित है तब तक निश्चित रूप से तथा गणित के हिसाब से ये बातें बतला दी जा सकती है कि अब वह किस ओर जायगा। किन्तु आत्मा के बारे मे ये सब बाते नही कही जासकतीं। अतएव प्रकृति के भूत तथा भविष्य निश्चित रूप से गणित की तरह ठीक ठीक बतलाना असम्भव नहीं है। अब हमने देखा है कि जड परमाणु इस समय जिस प्रकार एकीभूत (संहत) है, विशिष्ट समय पर वे फिर ठीक उसी रूप मे सहत होते हैं। अनादि काल से ऐसे ही प्रवाह के रूप मे जगत् की नित्यता चल रही हैं। किन्तु इससे तो आत्मा का अमरत्व प्रमाणित नहीं हुआ। हमने यह भी देखा है कि किसी भी शक्ति का नाश नहीं होता, किसी जड़ वस्तु को भी कभी शून्य मे परिणत नहीं किया जा सकता। तब उनका क्या होता है? उनके विभिन्न परिणाम होते हैं, अन्त मे जहाँ से उनकी उत्पत्ति हुई थी, वहीं वे पुनरावृत्त होते है। सरल रेखा मे
अमरत्व ३१५.
कोई गति नहीं हो सकती । प्रत्येक वस्तु को ही घूम फिर कर अपने पूर्व स्थान पर लौट आना पड़ता है, क्योकि सरल रेखा अनन्त भाव से बढाने पर वृत्त मे परिणत होती है। यदि ऐसा ही हुआ तो अनंत काल तक किसी आत्मा की अवनति हो ही नही सकती—यह किसी तरह हो ही नही सकता । इस जगत् मे प्रत्येक वस्तु, शीघ्र हो या विलम्ब से ही हो, अपनी अपनी वर्तुलाकार गति को सम्पूर्ण कर फिर अपनी उत्पत्ति के स्थान पर पहुँचती है । तुम, मै अथवा ये सब आत्माएँ क्या है ? पहले क्रमसकोच तथा क्रमविकास तत्व की आलोचना करते हुए हमने देखा है. तुम, हम, उसी विराट् विश्वव्यापी चैतन्य या प्राण या मन के अंशविशेष हैं; हम उसी के सकोचस्वरूप है । अतएव घूमकर हम क्रमविकास की प्रक्रिया के अनुसार उस विश्वव्यापी चैतन्य मे लौट जायेगे—वह विश्वव्यापी चैतन्य ही ईश्वर है। लोग उसी विश्वव्यापी चैतन्य को प्रभु, भगवान, ईसा, बुद्ध या ब्रह्म कहते है—जडवादी उसी की शक्ति के रूप मे उपलब्धि करते है एवं अज्ञेयवादी उसी की उस अनंत अनिर्वचनीय सर्वातीत पदार्थ के रूप मे धारणा करते है। वही वह विश्वव्यापी प्राण है, वही विश्वव्यापी चैतन्य है—वही विश्वव्यापिनी शक्ति है और हम सब उसी के अंश है ।
किन्तु आत्मा के अमरत्व को प्रमाणित करने के लिये इतना ही पर्याप्त नही है। अभी भी अनेक संशय और आशकाये रह गई । किसी शक्ति का नाश नही है, यह बात सुनने मे बडी अच्छी लगती है, किन्तु वास्तविक बात यह है कि हम जितनी भी शक्तियाँ देखते है सभी मिश्रणोत्पन्न हैं, जितने भी रूप देखते है सभी मिश्रण से उत्पन्न है। यदि आप शक्ति के सम्बन्ध मे विज्ञान का मत ग्रहण कर
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ज्ञानयोग
उसे कतिपय शक्तियो की समष्टि मात्र मानते है तो फिर आपका ‘ मैपन ’ कहाँ रहा ? जो कुछ भी मिश्रण से उत्पन्न है वह शीघ्र अथवा विलम्ब से अपने कारणीभूत पदार्थ मे लय हो जाता है। जो कुछ भो कतिपय कारणों के समवाय से उत्पन्न है उसी की मृत्यु, उसी का विनाश अवश्यम्भावी है। शीघ्र या विलम्ब से वह विश्लिष्ट हो जायगा, भग्न हो जायगा और अपने कारणीभूत पदार्थ मे परिणत हो जायगा। आत्मा कोई भौतिक शक्ति अथवा चिन्ता-शक्ति नहीं है। वह चिन्ता-शक्ति का स्रष्टा है, स्वयं चिन्ता-शक्ति नहीं। वह शरीर का गठनकर्ता है किन्तु वह स्वयं शरीर नहीं है। क्यो ? शरीर कभी आत्मा नही हो सकता, क्योकि वह चैतन्यवान् नहीं है। मृत व्यक्ति अथवा कसाई की दूकान का मांसखण्ड कभी चैतन्यवान् नही होता। हम चैतन्य शब्द से क्या समझते है ? प्रतिक्रिया शक्ति।
और गम्भीर भाव से इस तत्व की आलोचना कीजिये। हमारे सम्मुख यह एक जलघट है, मैं उसे देख रहा हूँ। होता क्या है ? इस घट से कुछ प्रकाश-किरणे निकल कर मेरी आँख मे प्रवेश करती है। वे मेरे अक्षिजाल ( Retina ) के ऊपर एक चित्र अंकित करती है। और यह चित्र जाकर मेरे मस्तिष्क में पहुँचता है। शरीरविज्ञान-वेत्तागण जिसको अनुभवात्मक स्नायु ( Sensory nerves ) कहते हैं उन्हीं के द्वारा यह चित्र भीतर मस्तिष्क में ले जाया जाता है। किन्तु अभी देखने की क्रिया पूरी नहीं हुई, क्योकि अभी तक भीतर की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। मस्तिष्क के अन्दर स्थित जो स्नायु-केन्द्र है वह इसे मन के पास ले जायगा, और मन उसके ऊपर प्रतिक्रिया करेगा। इस प्रतिक्रिया के होते ही घट मेरे सम्मुख
अमरत्व ३१७
प्रकाशित हो जायगा। एक सरल उदाहरण से यह बात भली प्रकार समझ मे आ जायगी। मान लीजिये आप खूब एकाग्र होकर मेरी बात सुन रहे है और इसी समय एक मच्छर आपकी नाक पर काट रहा है, किन्तु आप मेरी बात सुनने मे इतने तन्मय है कि उसका काटना आपको अनुभव नही होता। ऐसा क्यों ? मच्छर आपके चमडे को काट रहा है; उस स्थान पर कितने ही स्नायु है, और ये स्नायु इस संवाद को मस्तिष्क के पास पहुँचा भी रही है; इसका चित्र भी मस्तिष्क मे मौजूद है; किन्तु मन दूसरी ओर लगा है इसलिये वह प्रतिक्रिया नहीं करता, अतएव आप उसके काटने का अनुभव नही करते। हमारे सामने एक नया चित्र आया किन्तु मन ने प्रतिक्रिया नहीं की—ऐसा होने पर हम उसे अनुभव नहीं कर सकते, किन्तु प्रतिक्रिया होते ही उसका ज्ञान होगा और तभी हम देखेंगे, सुनेगे और अनुभव आदि करने मे समर्थ होगे। इस प्रतिक्रिया के साथ साथ ज्ञान का प्रकाश होता है। अत-एव हमने समझ लिया कि शरीर कभी ज्ञान का प्रकाश नही कर सकता, कारण, हम देखते हैं कि जिस समय मनोयोग नहीं रहता उस समय हम अनुभव नही करते। ऐसी घटनाये सुनी गई है कि किसी किसी विशेष अवस्था मे कोई कोई व्यक्ति जो भाषा उसने कभी नहीं सीखी है वह बोलने मे समर्थ हुआ है। बाद में खोजने पर पता लगा है कि वह व्यक्ति कभी बचपन मे ऐसी जाति मे रहा है जो उस भाषा को बोलती थी, और वही संस्कार उसके मस्तिष्क में वर्तमान था। वह सब वहाँ पर सञ्चित था, बाद मे किसी कारण से उसके मन मे प्रतिक्रिया हुई और तभी ज्ञान आ गया और वह व्यक्ति उस भाषा को बोलने मे समर्थ हुआ। इसीसे फिर सिद्ध होता है कि केवल