ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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३०२ ज्ञानयोग
करते हैं। किन्तु हम लोग तो सामान्य गृहस्थ हैं; धर्म करने के लिये हमे किसी न किसी प्रकार के भय या क्रियाकाण्ड की आवश्यकता रहती ही है, इत्यादि।
द्वैतवाद ने संसार पर बहुत दिनों तक शासन किया है, और यह उसीका फल है। अच्छा, एक नई परीक्षा क्यों न करो? संभव है, सभी मनुष्यों को ऐसी धारणा करने मे लाखों वर्ष लग जायें, किन्तु इसी समय इसे क्यों न आरम्भ कर दो? यदि हम अपने जीवन मे बीस मनुष्यों को भी यह बात बतला सकें, तो समझो कि हमने बहुत बड़ा काम किया।
भारतवर्ष मे और एक बड़ी शिक्षा प्रचलित है, जो पूर्वोक्त तत्व-प्रचार की विरोधी मालूम होती है। वह शिक्षा यह है कि—'मै शुद्ध हूँ, आनन्द स्वरूप हूँ,' इस प्रकार मौखिक कहना तो ठीक है, किन्तु जीवन में तो हम इसे सर्वदा नहीं दिखला सकते। मै इस बात को मानता हूँ आदर्श सभी समय अत्यन्त कठिन होता है। प्रत्येक बालक आकाश को अपने सिर से बहुत ऊँचाई पर देखता है, किन्तु उस कारण से क्या हम आकाश की ओर देखने की चेष्टा भी न करे? कुसंस्कार की ओर जाने से क्या सब अच्छा होजायगा? यदि अमृत का लाभ न कर सके तो क्या विषपान करने से ही कल्याण होगा? हम इसी समय सत्य का अनुभव नहीं कर सकते, इसलिये अन्धकार, दुर्बलता और कुसंस्कार की ओर जाने स ही क्या कल्याण होगा?
विभिन्न प्रकार के द्वैतवाद के सम्बन्ध में हमें कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु जो कोई उपदेश दुर्बलता की शिक्षा देता है, उसी पर हमें
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विशेष आपत्ति है। स्त्री-पुरुष, बालक-बालिका, जिस समय दैहिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक शिक्षा पाते हैं, उस समय मैं उनसे एक मात्र यही प्रश्न करता हूँ—"क्या तुम इससे बल पाते हो?" क्योंकि मैं जानता हूँ एकमात्र सत्य ही बल प्रदान करता है। मैं जानता हूँ, सत्य ही एकमात्र प्राणप्रद है। सत्य की ओर गये बिना हम किसीसे भी वीर्यलाभ नहीं कर सकते और वीर हुए बिना सत्य के समीप भी नहीं पहुँच सकते। इसी हेतु जो कोई मत, जो शिक्षाप्रणालियाँ मन और मस्तिष्क को दुर्बल कर दें और मनुष्य को कुसंस्काराविष्ट कर डाले, जिनसे मनुष्य अन्धकार मे टटोलता रहे, जिनसे मनुष्य सदैव ही सब प्रकार के विकृतमस्तिष्क-प्रसूत असंभव, अजीब और कुसंस्कारपूर्ण विषयो के अन्वेषण में लग जाय, मैं उन सब प्रणालियों को पसन्द नही करता, क्योकि मनुष्यो के ऊपर उन सब का परिणाम बडा भयानक होता है, और उनसे कुछ भी उपकार नहीं होता, वे सब व्यर्थ है।
जो इन बातों से अभिज्ञ है, वे हमारे साथ इस विषय मे एक-मत होंगे कि ये सब मनुष्य को विकृत और दुर्बल बना डालती हैं—इतना दुर्बल कि क्रमशः उसके लिए सत्यलाभ करना और उस सत्य के आलोक मे चलकर जीवन यापन करना एक प्रकार से असम्भव हो जाता है। अतएव हमारे लिये आवश्यक है एक मात्र बल या शक्ति मे शक्ति-संचार ही इस भव-व्याधि की एकमात्र महौषधि है। धनहीन व्यक्ति जब धनियो द्वारा पददलित होते हैं, उस समय शक्तिसंचार ही उनके लिये एक मात्र औषधि है। जब मूर्ख विद्वानों द्वारा उत्पी-डित होता है उस समय भी बल ही एक मात्र औषधि है। और जिस समय पापिगण अन्य पापियो से उत्पीडित होते हैं, उस समय भी यही
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एकमात्र अव्यर्थ महौषधि है। और अद्वैतवाद जिस प्रकार का बल और जैसी शक्ति देता है, उस प्रकार का बल और शक्ति किसी से भी नहीं मिल सकती। अद्वैतवाद हमे जिस प्रकार नीति-परायण बनाता है, उस प्रकार कोई भी हमे नीति-परायण नही बना सकता। जिस समय समस्त दायित्व हमारे कन्धों पर आ पड़ता है, उस समय हम जितने उच्च भाव से कार्य कर पाते है, उतना और किसी भी अवस्था मे उस तरह नहीं कर पाते।
मै तुम लोगों से यह पूछना चाहता हूँ कि यदि एक नन्हे बच्चे को तुम्हारे हाथ सौंप दूँ तो तुम उसके प्रति कैसा व्यवहार करोगे ? उस क्षण के लिए तुम लोगो का जीवन बदल जायगा। तुम्हारा स्वभाव किसी भी प्रकार का क्यों न हो, अन्ततः उन क्षणो के लिए तुम सम्पूर्ण निःस्वार्थी बन जाओगे। यदि तुम्हे उत्तरदायी बनाया जाय तो तुम्हारी सारी पापप्रवृत्तियाँ दूर हो जायेंगी, तुम्हारे चरित्र मे परिवर्तन हो जायगा। इस प्रकार जब सारे उत्तरदायित्व का बोझ हम पर पड़ता है तभी हम अपने सर्वोच्च भाव मे आरोहण करते है। जब हमारे सारे दोष और किसीके मत्थे नही मढ़े जाते, जब शैतान या भगवान किसी को भी हम अपने दोषों के लिए उत्तरदायी नहीं समझते तभी हम सर्वोच्च भाव मे पहुँच जाते है। अपने भाग्य के लिए मै स्वय ही उत्तरदायी हूँ। मै स्वयं ही शुभाशुभ दोनो का कर्ता हूँ। किन्तु मेरा स्वरूप शुद्ध तथा आनन्द मात्र है।
न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
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न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य-
श्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम्
न मन्त्रं न तीर्थं न वेदान्न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्य न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
वेदान्तं कहता है कि साधारण मनुष्य के लिए यह सत्य ही एक मात्र अवलम्बनीय है। उस अन्तिम लक्ष्य पर पहुँचने के लिए यही एक मात्र उपाय है—सभों से यही कहना है कि हमी वह है। वार बार ऐसा कहने से बल आयेगा। ‘शिवोऽहं’ रूपी यह अभय-वाणी क्रमशः अधिकाधिक पुष्ट होकर हमारे हृदय मे, हमारे सभी भावो मे भिद् जायगी, अन्त मे हमारी नस-नस मे, शरीर के प्रत्येक भाग मे यह समा जायगी। ज्ञानसूर्य की किरणे जितनी अधिक उज्ज्वल होने लगती है, मोह उतना ही दूर भाग जाता है, अज्ञानराशि ध्वंस होती है और धीरे धीरे एक समय ऐसा आता है जब कि सारा अज्ञान बिल्कुल लुप्त हो जाता है एवं एकमात्र ज्ञानसूर्य ही अवशिष्ट रह जाता है। अवश्य ही अनेको को यह वेदान्त-तत्व भयानक मालूम हो सकता है, किन्तु उसका कारण कुसंस्कार है, यह मैने पहले ही कहा है। इसी देश मे (इग्लैंड मे) ऐसे बहुत लोग है जिनसे मै यदि कहूँ कि इस दुनिया मे शैतान नाम की कोई चीज नहीं है तो वे समझेगे कि धर्म का सत्यानाश होगया। अनेकों ने मुझसे कहा है कि शैतान के न रहने से धर्म किस तरह कायम रह सकता है? उन लोगों का कहना है कि हमे परिचालित करने के लिये कोई न रहने से धर्म का क्या अर्थ है?
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शासन करने को यदि कोई न रहे तो हम अपना जीवन किस तरह बिता सकते हैं ? सच बात तो यह है कि हमें इस प्रकार का व्यवहार अच्छा लगता है। इस भाव से रहना हमारा अभ्यास होगया है और इसीलिये हम ऐसे जीवन को पसंद करते है। प्रति दिन यदि हमें किसी ने नहीं डॉटा तो हमे सुख नहीं मिलता। यह वही कुसंस्कार है। किन्तु अब यह बात कितनी ही भयानक क्यों न मालूम हो, ऐसा एक समय अवश्य ही आयेगा जब अतीत की सारी बातों का स्मरण कर, जिन कुसंस्कारों ने शुद्ध अनन्त आत्मा पर आच्छादन फैला दिया था, हम उन प्रत्येक की हँसी उड़ायेंगे और आनन्द, सत्य व दृढ़ता के साथ कहेगे कि मै ही 'वह' हूँ, चिरकाल वही था और सर्वदा वही रहूँगा।
१४. अमरत्व
( अमेरिका में दिया हुआ भाषण )
जीवात्मा के अमरत्व के सम्बन्ध मे मनुष्य ने जितनी बार प्रश्न किया है, इस तत्त्व के रहस्य का उद्घाटन करने के लिये उसने जगत् मे जितनी खोज की है, यह प्रश्न मनुष्य के हृदय को जितना प्रिय और उसके जितना निकट है, यह प्रश्न हमारे अस्तित्व के साथ जितना अच्छेद्य भाव से सम्बन्धित है उतना और कौनसा प्रश्न है ? यह कवियों की कल्पना का विषय रहा है, साधु, महात्मा, ज्ञानी—सभी की चिन्ता का यह विषय रहा है, सिंहासन पर बैठे हुये राजाओं ने इस पर विचार किया है, पथ के भिखारियों ने भी इसका स्वप्न देखा है। श्रेष्ठतम मानवों ने इसका उत्तर पाया है, और अतिनिकृष्ट मनुष्यो ने भी इसकी आशा की है। इस विषय मे लोगो का आग्रह अभी नष्ट नही हुआ है, और जब तक मानव प्रकृति विद्यमान है तब तक होगा भी नहीं। विभिन्न विचारक मस्तिष्को ने इसके विभिन्न उत्तर दिये है। दूसरी ओर इतिहास के प्रत्येक युग मे हजारो व्यक्तियों ने इस प्रश्न को बिलकुल अनावश्यक कहकर छोड दिया है, फिर भी यह प्रश्न ज्यो का त्यो नवीन ही बना हुआ है। जीवन-संग्राम के शोरगुल मे हम प्राय इस प्रश्न को भूल से जाते हैं, परन्तु जब अचानक कोई मर जाता है, एक ऐसा व्यक्ति जिससे हम प्रेम करते हैं, जो हमारे हृदय के अति निकट और अत्यन्त प्रिय है अचानक हमसे छीन लिया जाता है तब हमारे चारों का संघर्ष और शोरगुल क्षण भर