ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
२३० ज्ञानयोग
२३० ज्ञानयोग
भी हमे इसी जगत् मे जीवनधारण तो करना पड़ेगा। अब इसकी मीमांसा कहाँ है ?
जगत् के बाहर जाना होगा, सभी धर्मों के इस उपदेश से ऊपर ऊपर सोचने पर मन मे यही भावना उदित होती है कि शायद आत्महत्या करना ही श्रेयस्कर है। प्रश्न यही है कि जीवन के दुःखों का प्रतिकार क्या है, और इसका जो उत्तर दिया जाता है उससे तो आपाततः यही बोध होता है कि जीवन का त्याग करना ही इसका एकमात्र उपाय है। इस उत्तर से मेरे मन मे एक प्राचीन कथा याद पडती है। एक मच्छर किसी के मुँह पर बैठा था। उसके एक मित्र ने उस मच्छर को मारने के लिये इतने ज़ोर से मारा कि वह मनुष्य मर गया, और मच्छर भी मर गया ! पूर्वोक्त प्रतिकार का उपाय मानो ठीक इसी प्रणाली का उपदेश देता है।
जीवन दुःखपूर्ण है, यह जगत् दुःखपूर्ण है, यह बात कोई भी व्यक्ति जिसने जगत् को अच्छी तरह जान लिया है, अस्वीकार नहीं कर सकता। किन्तु सभी धर्म इसका क्या प्रतिकार बताते है ? वे कहते है, जगत् कुछ भी नहीं है। इस जगत् के बाहर ऐसा कुछ है जो वास्तविक सत्य है। इसी स्थान पर वास्तव मे विवाद प्रारम्भ होता है। इस उपाय से मानो हमारा जो कुछ भी है सभी कुछ नष्ट करके फेक देने का उपदेश देते है। तब फिर यह प्रतिकार का उपाय कैसे होगा ? तब क्या कोई उपाय नही है ? एक उपाय और भी कहा जाता है। वह यह है: वेदान्त कहता है—विभिन्न धर्म जो कुछ कहते है सब सत्य है, किन्तु इसका ठीक ठीक अर्थ क्या है, यह समझना होगा। प्राय लोग विभिन्न धर्मों के उपदेशों को ठीक
सभी वस्तुओं में ब्रह्मदर्शन २३१
उलटा ही समझते है, और वे धर्म भी इस विषय में एकदम स्पष्ट करके कुछ भी नही कहते। मस्तिष्क एवं हृदय दोनो की ही हमे आवश्यकता है। हृदय अवश्य ही बहुत श्रेष्ठ है—हृदय के भीतर से ही जीवन को उच्च पथ पर ले जाने वाले महान् भावों का स्फुरण होता है। हृदयशून्य केवल मस्तिष्क की अपेक्षा यदि मेरे पास कुछ भी मस्तिष्क न हो, किन्तु थोडासा भी हृदय रहे तो मै उसे सैकड़ो बार पसन्द करूँगा। जिसके पास हृदय है उसीका जीवन सम्भव है, उसीकी उन्नति सम्भव है, किन्तु जिसके पास तनिक भी हृदय नही है, केवल मस्तिष्क है, वह सूख कर मर जाता है।
किन्तु हम यह भी जानते है कि जो केवल अपने हृदय के द्वारा परिचालित होते है उन्हे अनेक कष्ट भोग करने पड़ते है, कारण उनकी प्रायः ही भ्रम मे पडने की सम्भावना रहती है। हमको चाहिये हृदय और मस्तिष्क का सम्मिलन। मेरे कहने का अर्थ यह नही है कि कुछ हृदय और कुछ मस्तिष्क लेकर हम दोनो का सामञ्जस्य करे, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति का अनन्त हृदय हो और उसके साथ साथ अनन्त परिमाण मे विचारबुद्धि भी रहे।
इस जगत् मे हम जो कुछ चाहते है उसकी क्या कोई सीमा है? क्या जगत् अनन्त नही है? जगत् मे अनन्त परिमाण में भावों के (हृदय के) विकास का और उसके साथ साथ अनन्त परिमाण मे शिक्षा और विचार का भी अवकाश या सम्भावना है। वे दोनों ही अनन्त परिमाण् मे आये—वे दोनो ही समानान्तर रेखा मे प्रवाहित होते रहे।