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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१४ ज्ञानयोग

१४ ज्ञानयोग

मीमांसा के लिये उसे दिन रात उत्तेजित तथा आह्वान करते है परन्तु इसका उत्तर देने मे वह असमर्थ है, कारण कि वह अपनी बुद्धि की सीमा का उल्लघन नहीं कर सकता। फिर भी वासनाएँ उसके अन्तर मे प्रवल वेग से उठती रहती है; किन्तु इस उत्तेजना का दमन ही एक मात्र मङ्गलकर पथ है, यह भी हम अच्छी तरह जानते है। हमारे हृत्पिण्ड का प्रत्येक स्पन्दन प्रत्येक निःश्वास के साथ हमे स्वार्थपर होने का आदेश करता है। दूसरी ओर एक अमानुषी शक्ति कहती है कि निःस्वार्थता ही एक मात्र मङ्गल का साधन है। जन्म से लेकर प्रत्येक बालक सुखाशावादी ( Optimist ) होता है; वह केवल सुख के ही स्वप्न देखता है। युवावस्था मे वह और भी अधिक आशावादी हो जाता है। मृत्यु, पराजय अथवा अपमान नाम की भी कोई वस्तु है यह बात किसी युवक की समझ मे आना कठिन है। अब वृद्धावस्था आती है; जीवन केवल एक ध्वंसराशि हो जाता है, सुख के स्वप्न आकाश मे विलीन हो जाते है और वृद्ध लोग निराशावादी हो जाते है। इसी प्रकार हम प्रकृति से ताडित होकर आशाशून्य, सीमा तथा गन्तव्य-ज्ञान से शून्य होकर एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव की ओर दौडते रहते है। ललितविस्तार मे लिखे हुए बुद्ध चरित का एक प्रसिद्ध गीत इस सम्बन्ध मे मुझे याद आता है। वर्णन इस प्रकार है कि बुद्धदेव ने मनुष्यों के परित्राता के रूप मे जन्म ग्रहण किया, किन्तु जब राजप्रासाद की विलासिता मे वे आत्मविस्मृत होने लगे तब उनको जगाने के लिये देवकन्याओं ने एक गीत गाया था जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है,—“हम एक प्रवाह मे बहते चले जा रहे है, हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे है—कही निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है।” इसी प्रकार हमारा जीवन विराम नहीं जानता,

माया १५

अविरत चलता ही रहता है। अब उपाय क्या है ? जिनके पास खाने पीने की प्रचुर सामग्री है वे सुखाशावादी हो जाते है और कहते हैं, “ भय उत्पन्न करनेवाली दुःख की बाते मत कहो, क्लेश की बात मत सुनाओ।” उनके पास जाकर कहो—“ सभी मंगल है।” वे कहेगे, “ हम तो निरापद है ही ; यह देखो, कितनी सुन्दर अट्टालिकाओं मे हम वास करते है, हमे शीत का कोई भय नही है। अतएव हमारे सम्मुख यह भयावह चित्र मत लाना।” किन्तु दूसरी ओर देखिये, शीत और अनाहार से कितने ही लोग मर रहे है। जाओ उन्हे जाकर शिक्षा दो कि ‘ सभी मङ्गल है।’ किन्तु यह, जो इस जीवन मे भीषण क्लेश पा रहा है. वह तो सुख, सौन्दर्य और मंगल की बात सुनेगा ही नही, वह कहता है, “ सभी को भय दिखाओ, मै जब रो रहा हूँ तो और सब कैसे हँसेगे ? मै तो अपने साथ सभी को रुलाऊँगा; कारण कि जब मै दुःख से पीड़ित हूँ तो सभी दुःख से पीडित हो, इसीसे मेरी शान्ति होगी।” हम इसी प्रकार सुखाशावाद से निराशावाद की ओर चले जाते है। इसके बाद मृत्युरूप भयावह व्यापार आता है—सारा संसार मृत्यु के मुख मे चलता जा रहा है; सभी मरने जा रहे है। हमारी उन्नति, हमारे व्यर्थ के आडम्बर पूर्ण कार्यकलाप, समाज-संस्कार, विलासिता, ऐश्वर्य, ज्ञान—मृत्यु ही सब की एक, मात्र गति है। यही सर्वस्व है, यही सुनिश्चित है। नगर के नगर बनते और बिगडते जाते है। साम्राज्यो के उत्थान और पतन होते है, ग्रहादिक खण्ड खण्ड होकर धूलि के समान चूर्ण बन कर विभिन्न ग्रहो के वायु-प्रवाह मे इधर उधर विक्षिप्त होते रहते है। इसी प्रकार अनादिकाल से चलता आ रहा है। इस सब का लक्ष्य क्या है ? मृत्यु ही सब का लक्ष्य है, मृत्यु जीवन का लक्ष्य है,