ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
१४४ ज्ञानयोग
१४४ ज्ञानयोग
और वही वस्तु अपनी पूर्ववर्ती किसी अन्य वस्तु का कार्य भी है। इसी को कार्यकारण कहते है। यही हमारा स्थिर विश्वास है। हमारा विश्वास है कि जगत् के प्रत्येक परमाणु का अन्य सभी वस्तुओं के साथ जैसा भी कुछ क्यों न हो, कोई न कोई सम्बन्ध रहता ही है। हमारी यह धारणा किस प्रकार से बन गई इस बात को लेकर बहुत वाद-विवाद हो चुके है। योरप में अनेक सहज प्राज्ञ ( Intuitive ) दार्शनिक है जिनका यह विश्वास है कि यह मानव जाति की स्वाभाविक धारणा है और बहुत से लोगों का विचार है कि यह धारणा अनुभवजनित है किन्तु इस प्रश्न की मीमांसा अभी तक हो नही पाई। वेदान्त इसकी क्या मीमांसा करता है यह हम बाद में देखेंगे। अतएव पहले तो हमे यह समझना है कि ‘क्यों’ का प्रश्न इस धारणा के ऊपर निर्भर रहता है कि इसके पूर्व कुछ हो चुका है और इसके बाद भी कुछ होगा। इसी प्रश्न में एक अन्य विश्वास भी अन्तर्निहित रहता है कि जगत् का कोई भी पदार्थ स्वतंत्र नहीं है, सभी पदार्थों के ऊपर उनके बाहर स्थित अन्य कोई पदार्थ भी कार्य कर सकता है। जगत् के सभी पदार्थ इसी प्रकार परस्पर सापेक्ष है—एक दूसरे के आधीन हैं—कोई भी स्वतंत्र नहीं है। जब हम कहते है कि “ब्रह्म के ऊपर किस शक्ति ने कार्य किया ?” तब हम यह भूल करते है कि हम ब्रह्म को जगत् के अन्तर्गत किसी वस्तु के समान मान बैठते है। यह प्रश्न करते ही हमे यह अनुमान करना पड़ेगा कि वह ब्रह्म भी किसी अन्य वस्तु के आधीन है—यह निरपेक्ष ब्रह्मसत्ता भी किसी अन्य वस्तु के द्वारा बद्ध है। अर्थात् ब्रह्म, अथवा ‘निरपेक्ष सत्ता’ शब्द को हम जगत् के समान समझते है । ऊपर बताई हुई रेखा के ऊपर तो देश-काल-निमित्त है ही नहीं; कारण, वह एकमेवाद्वितीयम्—मन के अतीत वस्तु
ब्रह्म और जगत् १४५
है। जो केवल अपने अस्तित्व मे स्वयं ही प्रकाशित है, जो एक मात्र, एकमेवाद्वितीयम् है उसका कोई कारण हो ही नहीं सकता। जो मुक्तस्वभाव है, स्वतंत्र है उसका कोई कारण नही हो सकता, क्योकि, ऐसा होने पर वह मुक्त नहीं रहेगा, बद्ध हो जायगा। जिसके भीतर आपेक्षिकता है वह कभी मुक्तस्वभाव नहीं हो सकता। अतएव अब आपने देख लिया कि अनन्त सान्त कैसे हुआ, यह प्रश्न ही भ्रमात्मक और स्वविरोधी है।
यह सब सूक्ष्म विचार छोड़ कर सीधे सादे भाव से भी हम इस विषय को समझ सकते है। मान लो, हमने समझ लिया कि ब्रह्म किस प्रकार जगत् हो गया, अनन्त किस प्रकार सान्त हो गया, तब क्या ब्रह्म ब्रह्म ही रह गया, और क्या अनन्त अनन्त ही रह गया? ऐसा होने पर अनन्त सान्त ही हो गया। साधारण रूप से हम ज्ञान किसे कहते है? जो कोई विषय हमारे मन के विषयीभूत हो जाता है अर्थात् मन के द्वारा सीमाबद्ध हो जाता है वही हम जान सकते है, और जब वह हमारे मन के बाहर रहता है अर्थात् मन का विषय नहीं रहता तब हम उसे नहीं जान सकते। अब यह स्पष्ट हो गया कि यदि यही अनन्त ब्रह्म मन के द्वारा सीमाबद्ध हो गया तो फिर अब वह अनन्त नही रहा, वह सान्त हो गया। मन के द्वारा जो कुछ भी सीमाबद्ध है वह सभी ससीम है। अतएव, उसी 'ब्रह्म को जानना' यह बात भी स्वविरोधी ही है। इसीलिये इस प्रश्न का उत्तर अब तक नहीं मिला; कारण, यदि उत्तर मिल जाय तो वह असीम नही रहेगा; ईश्वर 'ज्ञात' हो जाय तो उसका ईश्वरत्व नहीं रह सकता—वह हमारे ही समान एक व्यक्ति हो जायगा—इस कुर्सी के समान एक
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