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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१४२ ज्ञानयोग

१४२ ज्ञानयोग

कि वहाँ न मन है, न चिन्ता। देश भी वहाँ नहीं रह सकता, क्योंकि वहाँ कोई परिणाम नहीं है। गति एवं निमित्त अथवा कार्यकारण-भाव भी वहाँ नहीं रह सकता जहाँ एक मात्र सत्ता विराजमान है। यही बात समझना और अच्छी तरह धारणा बनाना हमारे लिये अत्यावश्यक है कि जिसको हम कार्यकारणभाव कहते है वह ब्रह्म के प्रपञ्च रूप में अवनत भाव को प्राप्त होने के बाद (यदि हम इस भाषा का प्रयोग करे तो) ही होता है, उससे पहले नहीं; और हमारी इच्छा वासना आदि जो कुछ है वह सब उसके बाद आरम्भ होता है। मेरी बराबर यही धारणा रही है कि शोपेनहावर (Schopenhauer) वेदान्त के समझने मे यहाँ-पर भ्रम में पड़ गये है कि उन्होंने इस 'इच्छा' को ही सर्वस्व मान लिया है। वे ब्रह्म के स्थान मे इस 'इच्छा' को ही बैठाना चाहते है। किन्तु पूर्ण ब्रह्म का कभी भी 'इच्छा' (Will) कह कर वर्णन नहीं किया जा सकता, कारण, इच्छा जगत्प्रपञ्च के अन्तर्गत है और इसीलिये परिणामशील है, किन्तु ब्रह्म मे ('ग' के अर्थात् देश-काल-निमित्त के ऊपर) किसी प्रकार की गति नहीं है, किसी प्रकार का परिणाम नही है। इस (ग) के नीचे ही गति है—बाह्य और आभ्यन्तर सभी प्रकार की गति का आरम्भ इसके नीचे ही है और इसी आभ्यन्तरिक गति को ही चिन्ता कहते है। अतः (ग) के ऊपर किसी प्रकार की इच्छा नहीं रह सकती, अतएव 'इच्छा' जगत् का कारण नहीं हो सकती। और भी निकट आकर देखो; हमारे शरीर की सभी गतियाँ इच्छा से प्रेरित नही होतीं। मैं इस कुर्सी को उठाता हूँ। यहाँ पर इच्छा अवश्य ही उठाने का कारण है। यह इच्छा ही पेशियों की शक्ति के रूप में परिणत हो गई है। यह बात ठीक है। किन्तु जो शक्ति कुर्सी उठाने का कारण है-वही शक्ति

ब्रह्म और जगत् १४३

हृदय मे फेफड़ों को भी चला रही है किंन्तु ‘इच्छा’ के रूप में नहीं। इन दोनों शक्तियों को एक मान लेने पर भी जिस समय यह ज्ञान की भूमि मे आती है उसी समय ‘इच्छा’ कहलाती है, किन्तु इस भूमि मे आरोहण करने के पहले इसको ‘इच्छा’ नाम से पुकारना भूल होगी। इसी कारण से शोपेनहावर के दर्शन मे बड़ी गडबड़ी हो गई है। इसके बजाय यदि हम ‘प्रज्ञा’ और ‘संवित्’ दो शब्दों का प्रयोग करे तो अधिक उपयुक्त होगा। ये दो शब्द मन की सभी प्रकार की अवस्थाओं के सम्बन्ध मे व्यवहृत हो सकते है। प्रज्ञा और संवित् ठीक ठीक ज्ञान की अवस्था अथवा ज्ञान के पूर्व की अवस्था नहीं है, किन्तु इसे मानसिक परिणामसमूह का एक साधारण भाव कहा जा सकता है।

जो हो, इस समय हम यह विचार करेगे कि हम कोई प्रश्न क्यों करते हैं ? एक पत्थर गिरा और हमने प्रश्न किया, इसके गिरने का क्या कारण है ? इस प्रश्न का औचित्य अथवा सम्भावना इस अनुमान अथवा धारणा के ऊपर निर्भर करता है कि जो कुछ होता है उसके पहले ही और कुछ हुआ है या हो चुका है। मेरा अनुरोध है कि इस धारणा को आप अपने मन मे खूब स्पष्ट रखिये, कारण, जैसे ही हम प्रश्न करते हैं कि यह घटना क्यो हुई, वैसे ही हम मान लेते है कि सभी वस्तुओं का, सभी घटनाओं का एक ‘क्यों’ रहता ही है। अर्थात् उसके घटने के पहले और कुछ उसका पूर्ववर्ती रहेगा ही। इसी पूर्ववर्तिता और परवर्तिता को ही निमित्त अथवा ‘कार्यकारणभाव’ कहते हैं। और जो कुछ हम देखते, सुनते और अनुभव करते है, संक्षेप मे जगत् का सभी कुछ, एक बार कारण और एक बार कार्य बनता है। एक वस्तु अपने बाद आने वाली वस्तु का कारण बनती है