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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

गुरुदेव के अंग ६
नंगा आया जगत में नंगा ही तू जाय।
बिच कर ख्वाबी ख्याल है मन माया भरमाय ॥६४॥
फूँक फाँक फारिग किया कहीं न पाया खोज।
चेत सकै तो चेतिये ये माया के चोज१ ॥६५॥
नैना निरमल नूर के बैना बानी सार।
आरत अंजन कीजिये डारो सिर से भार ॥६६॥
गुरुदेव के अंग
पुर पट्टन पर लोक है अदली सतगुरु सार।
भगित हेत से उतरे पाया हम दीदार ॥ १ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला अललपच्छ२ की जात।
काया माया ना वहाँ नहीं पिंड नहि नात ॥ २ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला उजल हिरंबर आद।
भलका ज्ञान कमान का घालत है सर साध ॥ ३ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुन्न बिदेसी आप।
रोम रोम परकास है दे हीं अजपा जाप ॥ ४ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला मगन किये मुस्ताक।
प्याला प्रेम पिलाइया गगन मँडल गरगाप३ ॥ ५ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु की सैन।
उर अंतर परकासिया अजब सुनाये बैन ॥ ६ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु की सैल।
बजर पौरि पट खोल कर ले गया झीनी गैल ॥ ७ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के तीर।
सब संतन सिरताज है सतगुरु अदल कबीर ॥ ८ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के माँह।
सब्द सरूपी अंग है पिंड प्रान नहि छाँह ॥ ६ ॥
(१) बिलास। (२) एक आकाशी चिड़िया जो आकाश ही में अंडा देती है और अंडे
के पृथ्वी पर पहुँचने के पहले बच्चा निकल कर ऊपर को उड़ जाता है। (३) मतवाला।

१० गरीबदास जी की बानी
ऐसा सतगुरु हम मिला गलताना१ गुलजार ।
वार पार की मत नहीं नाहिं हलका नाह भार ॥१०॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के मंझ ।
अण्डों आनंद पोख ही बैन सुनाये कुंज२ ॥११॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के नाल ।
पीतम्बर ताखी३ धरयो बानी सब्द रसाल४ ॥१२॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के नाल ।
गमन किया परलोक से अललपच्छ की चाल ॥१३॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के नाल ।
ज्ञान जोग औ भगति सब दीन्हीं नजर निहाल ॥१४॥
ऐसा सतगुरु हम मिला बेपरवाह अबंध ।
परम हंस पूरन पुरुष रोम रोम रबि चंद ॥१५॥
ऐसा सतगुरु हम मिला है जिंदा जगदीस ।
सुन्न बिदेसी मिल गया छत्र मुकुट है सीस ॥१६॥
सतगुरु के लच्छन कहूँ मधुरे बैन विनोद ।
चार बेद षट सास्तर कहा अठारह बोध ॥१७॥
सतगुरु के लच्छन कहूँ अचल बिहंगम चाल ।
हम अमरापुर ले गया ज्ञान सब्द के नाल ॥१८॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तुरिया के रे तीर ।
सब विद्या वानी कहै छानै नीर अरु छीर ॥१९॥
जिंदा जोगी जगत-गुरु मालिक मुरसिद पीव ।
काल कर्म लागै नहीं संका नाह सींव५ ॥२०॥
जिंदा जोगी जगत गुरु मालिकै मुरसिद पीर ।
दुहूँ दीन झगड़ा मचा पाया नहीं सरीर६ ॥२१॥
(१) मतवाला। (२) कुंज चिड़िया अपने अंडे को बैठकर नहीं सेती बल्कि सुरत
से। (३) टोपी। (४) रसीला। (५) हद। (६) कहते हैं कि कबीर साहब के चोला छोड़ने

गुरुदेव के अंग ११
ऐसा सतगुरु हम मिला मालिक मुरसिद पीर।
मारा भलका¹ भेद से लगे ज्ञान के तीर ॥२२॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तेज पुँज के अंग।
झिलमिल नूर जहूर है रूप रेख नहिं रंग ॥२३॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तेज पुंज की लोय²।
तन मन अरपों सीस हू होनी होय सो होय ॥२४॥
ऐसा सतगुरु हम मिला खोले बज्र किवार।
अगम दीप कूँ ले गया जहाँ ब्रह्म दरबार ॥२५॥
ऐसा सतगुरु हम मिला खोले बज्र कपाट।
अगम भूमि कूँ गम करी उतरे औघट घाट ॥२६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला मारी गाँसी सैन।
रोम रोम में सालती पलक नहीं है चैन ॥२७॥
सतगुरु भलका खैंच कर लाया बान जो एक।
साँस उभारे सालता पड़ा कलेजे छेक ॥२८॥
सतगुरु मारा बान कस कैबर³ गाँसी खैंच।
भरम करम सब जरि गये लई कुबुधि सब ऐंच ॥२६॥
सतगुरु आये दया कर ऐसे दीन-दयाल।
बंदि छोड़ाई बिरद⁴ सुनि जठर अगिन प्रतिपाल ॥३०॥
जठर अगिन से राखिया प्याया अमृत छीर।
जुगन जुगन सतसंग है समझ कुटिल बेपीर ॥३१॥
जोनी संकट मेटि हैं ऊरध मुख नहि आय।
ऐसा सतगुरु सेइये जम से लेत छुड़ाय ॥३२॥
पर उनके हिन्दू शिष्य चाहते थे कि शरीर को दाह करें और मुसलमान चाहते थे कि गाड़
दें परन्तु शरीर गुप्त हो गया और इस तरह आपस का झगड़ा निबट गया।
(१) कमान । (२) लौ । (३) काँटेदार गाँसी जो घुसने पर निकलती नहीं । (४) स्तुति
( चेतावनी की पहिली साखी का नोट देखो ) ।

१२ गरीबदास जी की बानी
जम जोरा जा से डरै धर्मराय के दूत।
चौदह१ कोर न चंपहीं सुन सतगुरु की कूत२ ॥३३॥
जम जोरा जा से डरै धर्मराय धर धीर।
ऐसा सतगुरु एक है अदली अदल कबीर ॥३४॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के अंक।
कागज लीरैं३ दरगह दईं चौदह कोर न चंप ॥३५॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के रेख।
अदली अदल कबीर है कुल के सतगुरु एक ॥३६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला पहुँचा बंक निदान।
नौका नाम चढ़ाय कर पार किये परवान ॥३७॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के माँह।
नौका नाम चढ़ाय कर ले राखे निज ठाँह ॥३८॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के बीच।
खेवट सब कूँ खेवता क्या उत्तम क्या नीच ॥३६॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं जीव।
ऐसा सतगुरु हम मिला ले परसाया पीव ॥४०॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं हंस।
ऐसा सतगुरु हम मिला अलख लखाया बंस ॥४१॥
माया का रस पीय कर फूट गये दोउ नैन।
ऐसा सतगुरु हम मिला बास दिया सुख चैन ॥४२॥
माया का रस पीय कर होगये डावाँडोल।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग दिया खोल ॥४३॥
माया का रस पीय कर होगये भूत खबीस।
ऐसा सतगुरु हम मिला भक्ति दई बकसीस ॥४४॥
(१) जम गिनती में १४ हैं। (२) बल। (३) धज्जियाँ—अर्थ यह है कि कर्म के
लेखे फट कर मालिक की दरगाह में दाखिल हो गये अब चौदह जम कोर नहीं
दबा सकते ।

गुरुदेव के अंग १३
माया का रस पीय कर फूट गये पट चार ।
ऐसा सतगुरु हम मिला लिये निसंक उधार ॥४५॥
माया का रस पीय कर डूब गये दुहुँ१ दीन ।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग परबीन ॥४६॥
माया का रस पीय कर भये सठ२ गारत गोर३ ।
ऐसा सतगुरु हम मिला परघट लिये बहोर ॥४७॥
सतगुरु कूँ क्या दीजिये देवे को कछु नाँय ।
सम्मन५ को साका४ किया सेऊ५ भेट चढ़ाय ॥४८॥
सिर साँटे६ की भगति है और कछू नहिं बात ।
सिर के साँटे पाइये अविगत अलख अनाद ॥४६॥
(१) हिंदू और मुसलमान । (२) शठ = दुष्ट । (३) सत्यानास । (४) साका = शोहरत
नाम । (५) सम्मन एक भक्त थे उनकी स्त्री जिसका नाम नेकी था और पुत्र जिसका नाम
सेऊ था यह दोनों भी पक्के भक्त थे । एक समय कबीर साहब अपने चेलों कमाल और
फ़रीद के साथ उनके स्थान पर पधारे । इन भक्तों के घर में न एक कौड़ी थी और न
अन्न । बेचारे घबराये कि किस तरह ऐसे महात्माओं का सम्मान करें । इधर उधर
माँगने गये कुछ नहीं मिला तब सेऊ की माँ ने अपने पति और पुत्र से कहा कि जाकर
कहीं अन्न की चोरी करो, पर दोनों पहिले तो रुके आखिर माता के समझाने से सेऊ
तैयार हो गया और बाप भी साथ हो लिया । सेऊ एक बनिये के घर में सेंध मार कर
घुसा और कुछ अन्न चुरा कर लाया । बाप ने जो बाहर खड़ा था अन्न को देख कर
कहा कि चोरी भी की तो इतना अन्न न लाये कि जिससे पूरा पड़े । इस पर सेऊ फिर
बनिये के घर में घुसा । बनिया जाग पड़ा और सेऊ को पकड़ लिया । सेऊ ने बिनती की
कि मेरा पिता बाहर खड़ा है मेरा पाँव बाँध कर डोरी अपने हाथ में रक्खो और मेरा
सिर सेंध के छेद से बाहर निकाल दो जिसमें मैं अपने पिता से दो बात कर लूँ क्योंकि
सबेरे तो मारा ही जाऊँगा । इस बात को बनिये ने मंजूर किया । सेऊ ने बाहर सिर
निकाल कर पिता से कहा कि तुरन्त मेरा सिर काट लो नहीं तो सबेरे जब पहिचाने
जायेंगे तो घर भर पकड़ा जायगा और साध सेवा में बिघ्न पड़ेगा । पिता ने ऐसा ही
किया और बेटे के सिर को काट कर घर में एक आले पर छिपा कर रख दिया और जो
अन्न चोरी का मिला था उससे सम्मन और नेकी ने भोजन बना कर कबीर साहब और
उनके दोनों चेलों के सामने धरा । कबीर साहब ने पूछा कि सेऊ कहाँ है वह भी आवे तो
हम भोग लगावें । सम्मन और नेकी जवाब देने में हिचकिचाये परन्तु अन्तरजामी कबीर
साहब ने सेऊ के सिर को मँगा कर अपना अमी रूपी प्रसाद उसके मुख में डाल कर
जिला दिया । (६) बदले ।
३

१२ गरीबदास जी की बानी
जम जोरा जा से डरे धर्मराय के दूत।
चौदह१ कोर न चंपहीं सुन सतगुरु की कूत२ ॥३३॥
जम जोरा जा से डरै धर्मराय धर धीर।
ऐसा सतगुरु एक है अद्ली अदल कबीर ॥३४॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के अंक।
कागज लीरैं३ दरगह दई चौदह कोर न चंप ॥३५॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के रेख।
अद्ली अदल कबीर है कुल के सतगुरु एक ॥३६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला पहुँचा बंक निदान।
नौका नाम चढ़ाय कर पार किये परवान ॥३७॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के माँह।
नौका नाम चढ़ाय कर ले राखे निज ठाँह ॥३८॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के बीच।
खेवट सब कूँ खेवता क्या उत्तम क्या नीच ॥३६॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं जीव।
ऐसा सतगुरु हम मिला ले परसाया पीव ॥४०॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं हंस।
ऐसा सतगुरु हम मिला अलख लखाया बंस ॥४१॥
माया का रस पीय कर फूट गये दोउ नैन।
ऐसा सतगुरु हम मिला बास दिया सुख चैन ॥४२॥
माया का रस पीय कर होगये डावाँडोल।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग दिया खोल ॥४३॥
माया का रस पीय कर होगये भूत खबीस।
ऐसा सतगुरु हम मिला भक्ति दई बकसीस ॥४४॥
(१) जम गिनती में १४ हैं। (२) बल। (३) धज्जियाँ—अर्थ यह है कि कर्म के
लेखे फट कर मालिक की दरगाह में दाखिल हो गये अब चौदह जम कोर नहीं
दबा सकते।

प्रथम खण्ड: मंगलाचरण, गुरु-महिमा एवं अमर नाम विचार

माया का रस पीय कर फूट गये पट चार ।
ऐसा सतगुरु हम मिला लिये निसंक उधार ॥४५॥
माया का रस पीय कर डूब गये दुहुँ¹ दीन ।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग परबीन ॥४६॥
माया का रस पीय कर भये सठ² गारत गोर³ ।
ऐसा सतगुरु हम मिला परघट लिये बहोर ॥४७॥
सतगुरु कूँ क्या दीजिये देवे को कछु नाँय ।
सम्मन⁵ को साका⁴ किया सेऊ⁵ भेट चढ़ाय ॥४८॥
सिर साँटे⁶ की भगति है और कछू नहिं बात ।
सिर के साँटे पाइये अविगत अलख अनाद ॥४६॥
(१) हिंदू और मुसलमान । (२) शठ = दुष्ट । (३) सत्यानास । (४) साका = शोहरत
नाम । (५) समन एक भक्त थे उनकी स्त्री जिसका नाम नेकी था और पुत्र जिसका नाम
सेऊ था यह दोनों भी पक्के भक्त थे । एक समय कबीर साहब अपने चेलों कमाल और
फ़रीद के साथ उनके स्थान पर पधारे । इन भक्तों के घर में न एक कौड़ी थी और न
अन्न । बेचारे घबराये कि किस तरह ऐसे महात्माओं का सम्मान करें । इधर उधर
माँगने गये कुछ नहीं मिला तब सेऊ की माँ ने अपने पति और पुत्र से कहा कि जाकर
कहीं अन्न की चोरी करो, पर दोनों पहिले तो रुके आखिर माता के समझाने से सेऊ
तैयार हो गया और बाप भी साथ हो लिया । सेऊ एक बनिये के घर में सेंध मार कर
घुसा और कुछ अन्न चुरा कर लाया । बाप ने जो बाहर खड़ा था अन्न को देख कर
कहा कि चोरी भी की तो इतना अन्न न लाये कि जिससे पूरा पड़े । इस पर सेऊ फिर
बनिये के घर में घुसा । बनिया जाग पड़ा और सेऊ को पकड़ लिया । सेऊ ने बिनती की
कि मेरा पिता बाहर खड़ा है मेरा पाँव बाँध कर डोरी अपने हाथ में रक्खो और मेरा
सिर सेंध के छेद से बाहर निकाल दो जिसमें मैं अपने पिता से दो बात कर लूँ क्योंकि
सबेरे तो मारा ही जाऊँगा । इस बात को बनिये ने मंजूर किया । सेऊ ने बाहर सिर
निकाल कर पिता से कहा कि तुरन्त मेरा सिर काट लो नहीं तो सबेरे जब पहिचाने
जायेंगे तो घर भर पकड़ा जायगा और साध सेवा में बिघ्न पड़ेगा । पिता ने ऐसा ही
किया और बेटे के सिर को काट कर घर में एक आले पर छिपा कर रख दिया और जो
अन्न चोरी का मिला था उससे समन और नेकी ने भोजन बना कर कबीर साहब और
उनके दोनों चेलों के सामने धरा । कबीर साहब ने पूछा कि सेऊ कहाँ है वह भी आवे तो
हम भोग लगावें । समन और नेकी जवाब देने में हिचकिचाये परन्तु अन्तरजामी कबीर
साहब ने सेऊ के सिर को मँगा कर अपना अमी रूपी प्रसाद उसके मुख में डाल कर
जिला दिया । (६) बदले ।
३

१४ गरीबदास जी की बानी
सीस तुम्हारा जायगा कर सतगुरु कूँ दान।
मेरा मेरी छाँड़ दे यही गुप्त है दान ॥५०॥
सीस तुम्हारा जायगा कर सतगुरु की भेंट।
नाम निरंतर लीजिये जम की लगै न फेट ॥५१॥
साहब से सतगुरु भये सतगुरु से भये साध।
ये तीनों अँग एक हैं गति कछु अगम अगाध ॥५२॥
साहब से सतगुरु भये सतगुरु से भये संत।
धर धर भेष बिलास अँग खेलैं आद अरु अंत ॥५३॥
ऐसा सतगुरु सेइये वेग उतारे पार।
चौरासी भ्रम मेटई आवागमन निवार ॥५४॥
अँधे गूँगे गुरु घने लँगड़े लोभी लाख।
साहब से परचै नहीं काब्य बनावैं साख१ ॥५५॥
ऐसा सतगुरु सेइये सब्द समाना होय।
भवसागर में डूबते पार लगावै सोय ॥५६॥
ऐसा सतगुरु सेइये सोहं सिंधु मिलाप।
तुरिया मध आसन करै मेटै तीनों ताप ॥५७॥
तुरिया पर पुरिया२ महल पार ब्रह्म का देस।
ऐसा सतगुरु सेइये सब्द-बिज्ञाना नेस३ ॥५८॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का धाम।
ऐसा सतगुरु सेइये हंस करै निःकाम ॥५६॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का लोक।
ऐसा सतगुरु सेइये हंस पठावै मोख४ ॥६०॥
तुरिया पर पुरिया महल पार ब्रह्म का दीप।
ऐसा सतगुरु सेइये राखै संग समीप ॥६१॥
गगन मँडल गादी जहाँ पार ब्रह्म का धाम।
सुन्न सिखर के महल में हंस करै बिस्राम ॥६२॥
(१) कबित् और साखी। (२) बनाया। (३) नेष्ठावान। (४) मोक्ष।

गुरुदेव.कौ.अंग १५
सतगुरु पूरन ब्रह्म है सतगुरु आप अलेख।
सतगुरु रमता राम है या में मीन न मेष ॥६३॥
सतगुरु आदि अनादि है सतगुरु मध अरु मूल।
सतगुरु कूँ सिजदा करूँ एक पलक नहिं भूल ॥६४॥
पट्टन घाट लखाइया अगम भूमि का भेद।
ऐसा सतगुरु हम मिला अष्ट कमल दल छेद ॥६५॥
पट्टन घाट लखाइया अगम भूम का भेव।
ऐसा सतगुरु हम मिला अष्ट कमल दल सेव ॥६६॥
पुर पट्टन की पैंठ में सतगुरु लेगया मोय।
सिर साँटे सौदा हुआ अगली पिछली खोय ॥६७॥
पुर पट्टन की पैंठ में सतगुरु लेगया साथ।
जहँ होरे मानिक बिकैं पारस लागा हाथ ॥६८॥
पुर पट्टन की पैंठ में है सतगुरु की हाट।
जहँ हीरे मानिक बिकैं सौदा मरनों साँट ॥६६॥
पुर पट्टन की पैंठ में सौदा है निज सार।
हम कूँ सतगुरु ले गया औघट घाट उतार ॥७०॥
पुर पट्टन की पैंठ में प्रेम पियाले खूब।
जहँ हम सतगुरु ले गया मतवाला महबूब ॥७१॥
पुर पट्टन की पैंठ में मतवाला मस्तान।
हम कूँ सतगुरु लेगया अमरापुर अस्थान ॥७२॥
बंकनाल के अंतरे तिरबेनी के तीर।
मानसरोवर हंस है बानी कोकिल कीर१ ॥७३॥
बंकनाल के अंतरे तिरबेनी के तीर।
जहँ हम सतगुरु लेगया चवै२ अमी रस छीर ॥७४॥
बंकनाल के अंतरे तिरबेनी के तीर।
जहँ हम सतगुरु लेगया बंदीछोर कबीर ॥७५॥
(१) तोता । (२) टपकता है।

१६ गरीबदास जी की बानी
भँवर गुफा में बैठ कर अमी महा रस जोख ।
ऐसा सतगुरु मिल गया सौदा रोकम रोक१ ॥७६॥
भँवर गुफा में बैठ कर अमी महा रस तोल ।
ऐसा सतगुरु मिल गया बजर पौरि दइ खोल ॥७७॥
भँवर गुफा में बैठ कर अमी महा रस जोख ।
ऐसा सतगुरु मिल गया लेगया हम परलोक ॥७८॥
पिंड ब्रह्मांड से अगम है न्यारी सिंधु समाध ।
ऐसा सतगुरु मिल गया देखा अगम अगाध ॥७९॥
पिंड ब्रह्मांड से अगम है न्यारी सिधु समाध ।
ऐसा सतगुरु मिल गया दिया अच्छय परसाद ॥८०॥
औघट घाटी ऊतरे सतगुरु के उपदेस ।
पूरन पद परकासिया ज्ञान जोग परबेस ॥८१॥
सुन्न सरोवर हंस मन न्हाये सतगुरु भेद ।
सुरत निरत परचा भया अष्ट कमल दल छेद ॥८२॥
सुन बेसुन से अगम है पिंड ब्रह्मांड से न्यार ।
सब्द समाना सब्द में अवगत वार न पार ॥८३॥
सतगुरु कूँ कुरबान जाँ अजब लखाया देस ।
पारब्रह्म परवान है निरालंब निज बेस ॥८४॥
सतगुरु सोहं नाम दे गुफ़२ बीज बिस्तार ।
बिन सोहं सीझे३ नहीं मूल मंत्र निज सार ॥८५॥
सोहं सोहं धुन लगे दरद मंद दिल माहिं ।
सतगुरु परदा खोलहीं परा लोक ले जाहिं ॥८६॥
सोहं जाप अजाप है बिन रसना है धुन्न ।
चढ़ै महल सुख सेज पर जहाँ पाप नहिं पुन्न ॥८७॥
(१) नकदा नकदी । (२) गुप्त । (३) पैवस्त न हो ।

गुरुदेव के अंग १७
सोहं जाप अजाप है बिन रसना है धुन्न ।
सतगुरु दीप समीप है नहिं बस्ती नहिं सुन्न ॥८८॥
सुन्न बस्ती से रहित है मूल मंत्र मन माहँ ।
जहँ हम सतगुरु ले गया अगम भूमि सत ठाँह ॥८९॥
मूल मंत्र निज नाम है सुरत सिंधु के तीर ।
गैबी बानी अरस¹ में सुर नर धरै न धीर ॥९०॥
अजब नगर में ले गया हम कूँ सतगुरु आन ।
झलकै बिंब अगाध गत सूतै चादर तान ॥९१॥
अगम अनाहद दीप है अगम अनाहद लोक ।
अगम अनाहद गमन है अगम अनाहद मोख ॥९२॥
सतगुरु पारस रूप है हमरी लोहा जात ।
पलक बीच कंचन करै पलटै पिंडा गात ॥९३॥
हम तो लोहा कठिन हैं सतगुरु बने लोहार ।
जुगन जुगन के मोरचे तोड़ गढ़े घन सार ॥९४॥
हम पसुआ-जन² जीव हैं सतगुरु जाति भिरंग ।
मुरदे से जिन्दा करें पलट धरत हैं अंग³ ॥९५॥
सतगुरु सिकलीगर बने यह तन तेगा देह ।
जुगन जुगन के मोरचे खोवैं भरम सँदेह ॥९६॥
सतगुरु कंद कपूर हैं हमरी तिनका देह ।
स्वाँति सीप का मेल है चंद चकोरा नेह ॥९७॥
ऐसा सतगुरु सेइये बेग उधारै हंस ।
भवसागर आवै नहीं जोरा काल बिधंस ॥९८॥
पट्टन नगरी घर करै गगन मंडल गहनार ।
अललपंख ज्यों संचरै सतगुरु अधम उधार ॥९९॥
(१) मुसलमानों में नवें यानी सब से ऊँचे स्वर्ग का नाम । (२) नरपशु । (३) जैसे
भृङ्गी (लखोहारी) झींगुर वगैरह को मारकर अपने खौंता में उस पर बैठ कर अपने
चोंकार शब्द से जिला कर उसको अपना ऐसा रूप वाला बना लेती है ।

१८ गरीबदास जी की बानी
अललपंख अनुराग है सुन्न मँडल रह थीर।
दास गरीब उधारिया सतगुरु मिले कबीर ॥१००॥
सुमिरन का अंग
ऐसा अविगत राम है आदि अंत नहिं कोय।
वार पार की मत नहीं अचल निरंतर सोय ॥ १ ॥
ऐसा अविगत राम है अगम अगोचर नूर।
सुन्न सनेही आदि है सकल लोक भरपूर ॥ २ ॥
ऐसा अविगत राम है गुन इन्द्री से न्यार।
सुन्न सनेही रम रहा दिल अंदर दीदार ॥ ३ ॥
ऐसा अविगत राम है अपरंपार अलाह।
कादिर कूँ कुरबान है वार पार नहि थाह ॥ ४ ॥
ऐसा अविगत राम है कादिर आप करीम।
मेरा मालिक मेहरवाँ रमता राम रहीम ॥ ५ ॥
अल्लह अविगत राम है बेचगून१ चित माहिं।
सब्द अतीत अगाध है निरगुन सरगुन नाहिं ॥ ६ ॥
अल्लह अविगत राम है बेचगून निरवान।
मोरा मालिक है सही महल मढ़ी नहिं थान ॥ ७ ॥
अल्लह अविगत राम है निराधार आधार।
नाम निरंतर लीजिये रोम रोम की लार ॥ ८ ॥
अल्लह अविगत राम है निरबानी निरखंद।
नाम निरंतर लीजिये ध्यान चकोरा चंद ॥ ९ ॥
अल्लह अविगत राम है कीमत कही न जाय।
नाम निरंतर लीजिये मुख से कहि न सुनाय ॥१०॥
अल्लह अविगत राम है निरबानी निरखंद।
नाम निरंतर लीजिये हिलमिल मीन समुँद ॥११॥
(१) बेचून।

सुमिरन का अंग १६
दुहूँ दीन मध ऐब है अलह अलख पहिचान।
नाम निरंतर लीजिये भगत हेत उत्पान ॥१२॥
अष्ट कमल दल राम है बाहर भीतर राम।
पिंड हाड़ में राम है सकल ठौर सब ठाम ॥१३॥
सकल बियापी सुरत में मन पवना गहि राख।
रोम रोम धुन होत है सतगुरु बोले साख ॥१४॥
मूल कमल में राम है स्वाद चक्र में राम।
नाभि कमल में राम है हृदय कमल बिस्राम ॥१५॥
कंठ कमल में राम है त्रिकुटि कमल में राम।
सहस कमल दल राम है सुन बस्ती सब ठाम ॥१६॥
अचल अभंगी राम है गलताना दम लीन१।
सुरत निरत के अंतरै बाजे अनहद बीन ॥१७॥
राम कहा तो क्या हुआ उर में नहीं यकीन।
चोर मुसै घर लूटहीं पाँच पचीसो तीन ॥१८॥
राम कहंते राम है जिन के दिल हैं एक।
बाहर भीतर रमि रहा पूरन ब्रह्म अलेख ॥१६॥
राम नाम निज सार है मूल मंत्र मन माहिं।
पिंड ब्रह्मांड से रहित है जननी जाया नाहिं ॥२०॥
राम रटत नहिं ढील कर हर दम नाम उचार।
अमी महा रस पीजिये बहुतक बारंबार ॥२१॥
कोट गऊ जे दान दे कोट जज्ञ जेवनार।
कोट कूप तीरथ खनै२ मिटै नहीं जम मार ॥२२॥
कोटिन तीरथ व्रत करै कोटिन गज कर दान।
कोटि अस्व बिप्रों दिये मिटै न खैंचा तान ॥२३॥
(१) महव। (२) खोदें।

२० गरीबदास जी की बानी
पारवती के उर धरा अमर भई छिन माँहँ ।
सुक की चौरासी मिटी निरालंब निज नाम१ ॥२४॥
अगम अनाहद भूमि है जहाँ नाम का दीप ।
एक पलक बिछुरै नहीं रहता नैनों बीच ॥२५॥
साहब साहब क्या करै साहब है परतीत ।
भैंस सींग साहब भया पाँड़े गावैं गीत२ ॥२६॥
राम सरीखा राम है संत सरीखे संत ।
नाम सरीखा नाम है नहीं आदि नहि अंत ॥२७॥
मांहमा सुन निज नाम की गहे द्रोपदी चीर ।
दुस्सासन से पचि रहे अंत न पाया बीर३ ॥२८॥
सेत बँधा पाहन तिरे४ गज पकड़े थे ग्राह५ ।
गनिका चढ़ी बिमान में६ निरगुन नाम मल्लाह ॥२६॥
(१) देखो नोट साखी नंबर २-४ “साध महिमा का अंग” [आगे] ।
(२) एक पाँड़े किसी महात्मा के पास उपदेश लेने गये । महात्मा ने पूछा तुम किसको
सब से अधिक प्यार करते हो । पाँड़े बोले एक भैंस को जिसे हमने पाला है । महात्मा ने
कहा कि उसी का ध्यान किया करो । पाँड़ेजी गुरु के कथन अनुसार अपनी भैंस के
ध्यान में लीन हो गये । यहाँ तक कि उनको ध्यान में भैंस नजर आने लगी । एक दिन
महात्मा ने उनको ध्यान के समय बुलाया, पाँड़े आँख मूँदे हुए बोले कि महाराज मैं घोंची
भैंस की सींग में फँस गया हूँ किस तरह बाहर निकलूँ । महात्मा ने ऐसी दृढ़ता ध्यान
की देख कर दया से पाँड़े से भैंस का ध्यान छुड़ा कर मालिक के ध्यान में लगा दिया
जिससे मालिक का मेला हो गया ।
(३) युधिष्ठिर पांडव, कौरवों के साथ जुआ खेलने में अपनी स्त्री द्रोपदी को हार गये
तब दुस्सासन नामी कौरव ने द्रोपदी को सभा में नंगी करने के लिये उसकी साड़ी खींची ।
ऐसे गाढ़ के अवसर पर द्रोपदी ने दीन होकर अपने इष्ट श्रीकृष्ण का स्मरण किया जिनके
प्रताप से साड़ी इतनी बढ़ती गई कि दुस्सासन खींचते खींचते हार गया पर उसका
अंत न पाया ।
(४) लङ्का और हिंदुस्तान के बीच में समुद्र पर पुल बाँधने के लिये बन्दर लोग राम
नाम लिख कर समुद्र में पत्थर फेंकते थे जो नाम के प्रभाव से तैरते थे और इस तरह
पुल तैयार होगया ।
(५) किसी नदी में एक हाथी को जो नहाने उतरा था मगर पकड़ कर खींचे लिये जाता
था, हाथी ने भगवान को टेरा तब उन्होंने प्रगट होकर उसको उबारा ।
(६) एक बेश्या को मरते समय जमदूत सता रहे थे कि एक साधू आ गये । बेश्या ने

सुमिरन का अंग २१
बरदी ढरी कबीर के भगित हेत के काज१।
सेऊ कूँ तो सिर दिया बेच बन्दगी नाज२ ॥३०॥
कहँ गोरख कहँ दत्त थे कहँ सुकदे कहँ ब्यास ।
भगित हेत से जानिये तीन लोक परकास ॥३१॥
कहँ पीपा कहँ नामदेव कहाँ धना बाजीद ।
कहँ रैदास कमाल थे कहँ थे फकर फरीद ॥३२॥
कहँ नानक दादू हुते कहँ ज्ञानी हरिदास ।
कहँ गोपीचंद भरथरी ये सब सतगुरु पास ॥३३॥
कहँ जंगी चरकट हुते कहाँ अधम सुलतान ।
भगति हेत परगट भये सतगुरु के परवान ॥३४॥
कहँ नारद प्रहलाद थे कहँ अंगद कहँ सेस ।
कहाँ बिभीखन ध्रुव हुते भगति हिरंबर पेस ॥३५॥
कहँ जयदेव थे कपिल मुनि कहँ रामानंद साध ।
कहँ दुरबासा कुस्न थे भगती आद अनाद ॥३६॥
कहँ ब्रह्मा अरु बेद थे कहँ सनकादिक चार ।
कहँ संभू अरु बिस्नु थे भगति हेत दीदार ॥३७॥
ऐसा निरमल नाम है निरमल करै सरीर ।
और ज्ञान मंडलीक३ हैं चकवै४ ज्ञान कबीर ॥३८॥
राम नाम सदनै पिया बकरे के उपदेस५ ।
अति बिलाप कर उनसे रक्षा माँगी। साधूजी ने उसे मंत्र उपदेश का अधिकारी न समझ
कर कहा कि वह नाम लो जो तोते को पढ़ाते हैं। वेश्या ने राम नाम लिया और उसके
उच्चारन करते ही बिमान आया जिस पर चढ़ कर वह बैकुंठ को सिधारी।
(१) देखो नोट साखी नंबर १० "भक्ति का अंग" (आगे)। (२) देखो नोट सफहा
१३। (३) छोटे छोटे मंडल के राजा। (४) चक्रवर्ती राजा। (५) सदन जाति के कसाई
एक भारी भक्त हुए हैं। कहते हैं कि एक बार उनके घर ऐसे समय पाहुन आया जब घर
में माँस न था। सदन ने चाहा कि एक बकरे का छोटा अंग काट के काम चला लिया
जाय इस पर बकरा बोला कि हमारे तुम्हारे सिर काटे का बैर चुकना है सो काट लो
४

२२ गरीबदास जी की बानी
अजामील से उद्धरे भगति बंदगी पेस१ ॥३९॥
नाम जलंधर२ ने लिया पारा रिष परवान ।
धन सतगुरु दाता धनी दई बंदगी दान ॥४०॥
गगन मंडल में रहत है अविनासी आलेख ।
जुगन जुगन सतसंग है धर धर खेलै भेख ॥४१॥
काया माया खंड है खंड राज अरु पाट ।
अमर नाम निज बंदगी सतगुरु से भई साँट ॥४२॥
अमर अनाहद नाम है निरभय अपरंपार ।
रहता रमता राम है सतगुरु चरन जुहार ॥४३॥
अविनासी निःचल सदा करता कूँ कुरबान ।
जाप अजपा जपत है गगन मंडल धर ध्यान ॥४४॥
बिन रसना है बंदगी बिन चस्में दीदार ।
बिन सरवन बानी सुनै निर्मल तत्त निहार ॥४५॥
मैं सौदागर नाम का टाँड़े पड़ा बहीर३ ।
लदते लदते लादिये बहुर न फेरा४ बीर ॥४६॥
और अंग नहीं काट सकते, यह सुन कर सदन को ज्ञान आया और तब से आप
जीव नहीं मारते थे बाजार से माँस मोल लेकर बेचते थे और एक सालिग्राम की बटिया
से जो जितना मांगे तौल देते थे । कथा है कि एक दिन एक ब्राह्मन सालिग्राम की
बटिया की ऐसी दुर्दशा देख कर सदन से माँग कर अपने घर लाया और प्रान
प्रतिष्ठा करके उसको सिंहासन पर पधारा । रात को सालिग्राम ने सपना दिया कि
हमको हमारे भक्त के पास जहाँ से लाया है पहुँचा दे हम वहीं प्रसन्न हैं ।
(१) अजामिल जाति का ब्राह्मण था पर अति कुकर्मी । एक दिन भाग से उसे साध
सेवा मिली और उसने दीनता करी जिस पर साध महात्मा ने बर दिया कि तुझको बेटा
होगा उसका नाम नारायण रखना इससे तेरा कल्याण हो जायगा । कुछ दिन पीछे बेटा
हुआ और उससे अजामिल को ऐसी प्रीति हुई कि एक दम सामने से न हटाता था और
मरते समय उसी का नाम नारायण रटता हुआ प्राण छोड़े और इस नाम के प्रताप से
स्वर्ग में बासा पाया ।
(२) जलंधर एक राक्षस था जिसे श्रीकृष्ण ने छल कर मारा और उनके प्रताप से
उसको ऊँचा स्थान मिला ।
(३) साज सामान । (४) आवागमन ।

सुमिरन का अंग २३
नाम बिना क्या होत है जप तप संजम ध्यान ।
बाहर भरमै मानवी अभि अंतर में जान ॥४७॥
उजल हिरंबर भग्ति है उजल हिरंबर सेव ।
उजल हिरंबर नाम है उजल हिरंबर देव ॥४८॥
नाम बिना निपजै नहीं जप तप करिहैं कोट ।
लख चौरासी त्यार है मूड़ मुड़ाया घोंट ॥४६॥
नाम सरोवर सार है सोहं सुरत लगाय ।
ज्ञान गलोचे बैठ कैर सुन्न सरोवर न्हाय ॥५०॥
मान सरोवर न्हायिये परमहंस का मेल ।
बिना चुँच मोती चुँगै अगम अगोचर खेल ॥५१॥
गगन मँडल में रमि रहा गलताना महबूब ।
वार पार नहिं छेव¹ है अबिचल मूरत खूब ॥५२॥
ऐसा सतगुरु सेइये जो नाम दृढ़ावे ।
भरमी गुरुवा मत मिलो जो मूल गँवावे ॥५३॥
सोहं सुरत लगाय ले गुन इंद्री से बंच ।
नाम लिया तब जानिये मिटे सकल परपंच ॥५४॥
नामै निःचल निरमला अनँत लोक में गाज ।
निरगुन सरगुन क्या कहै प्रगटा संतों काज ॥५५॥
अबिनासी के नाम में कौन नाम निज मूल ।
सुरत निरत से खोज ले बास बड़ी अक² फूल ॥५६॥
फूल सही सरगुन कहा निरगुन गंध सुगंध ।
मन माली के बाग में भँवर रहा कहँ बंध ॥५७॥
भँवर बिलंबा³ केतकी सहस कमलदल माहिं ।
जहाँ नाम निज नूर है मन माया तहँ नाहिं ॥५८॥
पंडित कोटि अनंत हैं ज्ञानी कोटि अनंत ।
स्रोता कोटि अनंत हैं बिरले साधू संत ॥५६॥
(१) आकार, खंड। (२) कि, या। (३) विलम रहा।

२४ गरीबदास जी की बानी
जिन्ह मिलते सुख उपजै मेटैं कोटि उपाध ।
भवन चतुरदस ढूँढ़िये परम सनेही साध ॥६०॥
राम सरीखे साध हैं साध सरीखे राम ।
सतगुरु को सिजदा करूँ जिन्ह दीन्हा निज नाम ॥६१॥
भगित बन्दगी जोग सब ज्ञान ध्यान परतीत ।
सुन्न सिखरगढ़ में रहै सतगुरु सब्द अतीत ॥६२॥
ऐसा सतगुरु सेइये पार उतारै हंस ।
भगित मुक्ति को देत है मिलि है सोहं बंस ॥६३॥
सोहं बंस बखानिये बिन दम देही जाप ।
सुरत निरत से अगम है लै समाध गरगाप ॥६४॥
सुरत निरत मन पवन पर सोहं साहं होय ।
सिव मंतर गौरी कहा अमर भई है सोय ॥६५॥
ररंकार तो धुन लगै सोहं सुरत समाय ।
हद बेहद पर बास है बहुरि न आवै जाय ॥६६॥
गुझ१ गायत्री नाम है बिन रसना धुन ध्याय ।
महिमा सनकादिक लही सिवसंकर बल जाय ॥६७॥
अजब महल बारीक है अजब सुरत बारीक ।
अजब निरत बारीक है महल धसे बिन बीक२ ॥६८॥
ऐसा राम अगाध है अबिनासी गंभीर ।
हद जीवों से दूर है बेहदियों के तीर ॥६६॥
ऐसा राम अगाध है बेकीमत करतार ।
सेस सहस फन रटत है अजहुँ न पाया पार ॥७०॥
ऐसा राम अगाध है अपरंपार अथाह ।
उर में कृत्रिम ख्याल है मौला अलख अलाह ॥७१॥
ऐसा राम अगाध है निरभय निःचल पीर ।
अनहद नाद अखंड धुन तन मन हीन सरीर ॥७२॥
(१) गुप्त । (२) डर ।

सुमिरन का अंग २५
ऐसा राम अगाध है बाजीगर भगवंत ।
निरसँध निरमल देखिया वार पार नहिं अंत ॥७३॥
पारब्रह्म बिन परख है कीमत मोल न तोल ।
बिना वजन अरु राग है बहुरंगी अनबोल ॥७४॥
महिमा अविगत नाम की जानत बिरले संत ।
आठ बखत सुबिधान१ है मुनि जन रटैं अनंत ॥७५॥
चंद सूर पानी पवन धरनी पोल अकास ।
पाँच तत्त हाजिर खड़े खिजमतदार खवास ॥७६॥
काल करम करे बंदगी महाकाल अरदास२ ।
मन माया अरु धरमराय सब सिर नाम उपास ॥७७॥
काल डरै करतार से मन माया का नास ।
चंदन अँग पलटै सबै खाली रह गया बाँस३ ॥७८॥
सजन सलोना राम है अब मत अंतहि जाय ।
बाहर भीतर एक है सब घट रहा समाय ॥७६॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी एक ।
आदि अंत जा के नहीं ज्यों का त्योंहीं देख ॥८०॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी ऐन ।
महिमा कही न जात है बोलै मधुरे बैन ॥८१॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आद ।
सतगुरु महरम तासु का साख भरत सब साध ॥८२॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी पीर ।
चरन कमल हंसा रहै हम हैं दामनगीर ॥८३॥
सजन सलोना राम है अचल अभंगी आप ।
हद बेहद से अगम है जपते अजपा जाप ॥८४॥
(१) कमाई किये जाने लायक़ । (२) अर्जदाश्त । (३) मलयाचल में पर्वत में चन्दन
की सुगंध से सब वृक्ष चन्दन सरीखे हो जाते हैं पर बाँस का वृक्ष सुगंधित नहीं होता है ।

३६ गरीबदास जी की बानी
ऐसा भगली जोगिया जानत है सब खेल ।
बीन बजावै मोहनी जोग जंत्र सब मेल ॥८५॥
ब्रह्मादिक से मोहिया मोहे सेस गनेस ।
संकर की तारी लगी अडिग समाध हमेस ॥८६॥
गन गँधरप ज्ञानी गुनी अजब नवेला नेह ।
क्या महिमा कहूँ नाम की मिट गये सकल सँदेह ॥८७॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे नैनों मंझ ।
अलख पलक में खलक में सतगुरु सब्द समंझ ॥८८॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे हिरदे माहिं ।
चंद सूर ऊगै नहीं निस बासर जहँ नाहिं ॥८९॥
सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे त्रिकुटी तीर ।
संख परम छबि चाँदनी बानी कोकिल कीर१ ॥६०॥
सुन्न बिदेसी बस रहा सहस कमल दल बाग ।
सोहं ध्यान समाध धुन और तीब्र बैराग ॥६१॥
सुमिरन तब ही जानिये जब रोम रोम धुनि होय ।
कुंज कमल में बैठ कर माला फेरे सोय ॥६२॥
सुरत सुमिरनी हाथ ले निरत मिले निरवान ।
ररंकार रमता लखै असल बंदगी ध्यान ॥६३॥
अष्ट कमल दल सुन्न है बाहर भीतर सुन्न ।
रोम रोम में सुन्न है जहाँ काल की धुन्न ॥६४॥
तुम्हीं सोहं सुरत हौ तुमही मन अरु पौन ।
इसमें दूसर कौन है आवै जाय सो कौन ॥६५॥
इसमें दूसर कर्म है बँधी अबिद्या गाँठ ।
पाँच पचीसो ले गई अपने अपने बाट ॥६६॥
नाम बिना सूना नगर पड़ा सकल में सोर ।
लूट न लूटी बंदगी हो गया हंसा भोर ॥६७॥
(१) तोता ।