गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरुदेव के अंग १३
माया का रस पीय कर फूट गये पट चार ।
ऐसा सतगुरु हम मिला लिये निसंक उधार ॥४५॥
माया का रस पीय कर डूब गये दुहुँ१ दीन ।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग परबीन ॥४६॥
माया का रस पीय कर भये सठ२ गारत गोर३ ।
ऐसा सतगुरु हम मिला परघट लिये बहोर ॥४७॥
सतगुरु कूँ क्या दीजिये देवे को कछु नाँय ।
सम्मन५ को साका४ किया सेऊ५ भेट चढ़ाय ॥४८॥
सिर साँटे६ की भगति है और कछू नहिं बात ।
सिर के साँटे पाइये अविगत अलख अनाद ॥४६॥
(१) हिंदू और मुसलमान । (२) शठ = दुष्ट । (३) सत्यानास । (४) साका = शोहरत
नाम । (५) सम्मन एक भक्त थे उनकी स्त्री जिसका नाम नेकी था और पुत्र जिसका नाम
सेऊ था यह दोनों भी पक्के भक्त थे । एक समय कबीर साहब अपने चेलों कमाल और
फ़रीद के साथ उनके स्थान पर पधारे । इन भक्तों के घर में न एक कौड़ी थी और न
अन्न । बेचारे घबराये कि किस तरह ऐसे महात्माओं का सम्मान करें । इधर उधर
माँगने गये कुछ नहीं मिला तब सेऊ की माँ ने अपने पति और पुत्र से कहा कि जाकर
कहीं अन्न की चोरी करो, पर दोनों पहिले तो रुके आखिर माता के समझाने से सेऊ
तैयार हो गया और बाप भी साथ हो लिया । सेऊ एक बनिये के घर में सेंध मार कर
घुसा और कुछ अन्न चुरा कर लाया । बाप ने जो बाहर खड़ा था अन्न को देख कर
कहा कि चोरी भी की तो इतना अन्न न लाये कि जिससे पूरा पड़े । इस पर सेऊ फिर
बनिये के घर में घुसा । बनिया जाग पड़ा और सेऊ को पकड़ लिया । सेऊ ने बिनती की
कि मेरा पिता बाहर खड़ा है मेरा पाँव बाँध कर डोरी अपने हाथ में रक्खो और मेरा
सिर सेंध के छेद से बाहर निकाल दो जिसमें मैं अपने पिता से दो बात कर लूँ क्योंकि
सबेरे तो मारा ही जाऊँगा । इस बात को बनिये ने मंजूर किया । सेऊ ने बाहर सिर
निकाल कर पिता से कहा कि तुरन्त मेरा सिर काट लो नहीं तो सबेरे जब पहिचाने
जायेंगे तो घर भर पकड़ा जायगा और साध सेवा में बिघ्न पड़ेगा । पिता ने ऐसा ही
किया और बेटे के सिर को काट कर घर में एक आले पर छिपा कर रख दिया और जो
अन्न चोरी का मिला था उससे सम्मन और नेकी ने भोजन बना कर कबीर साहब और
उनके दोनों चेलों के सामने धरा । कबीर साहब ने पूछा कि सेऊ कहाँ है वह भी आवे तो
हम भोग लगावें । सम्मन और नेकी जवाब देने में हिचकिचाये परन्तु अन्तरजामी कबीर
साहब ने सेऊ के सिर को मँगा कर अपना अमी रूपी प्रसाद उसके मुख में डाल कर
जिला दिया । (६) बदले ।
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