गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरुदेव के अंग ६
नंगा आया जगत में नंगा ही तू जाय।
बिच कर ख्वाबी ख्याल है मन माया भरमाय ॥६४॥
फूँक फाँक फारिग किया कहीं न पाया खोज।
चेत सकै तो चेतिये ये माया के चोज१ ॥६५॥
नैना निरमल नूर के बैना बानी सार।
आरत अंजन कीजिये डारो सिर से भार ॥६६॥
गुरुदेव के अंग
पुर पट्टन पर लोक है अदली सतगुरु सार।
भगित हेत से उतरे पाया हम दीदार ॥ १ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला अललपच्छ२ की जात।
काया माया ना वहाँ नहीं पिंड नहि नात ॥ २ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला उजल हिरंबर आद।
भलका ज्ञान कमान का घालत है सर साध ॥ ३ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुन्न बिदेसी आप।
रोम रोम परकास है दे हीं अजपा जाप ॥ ४ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला मगन किये मुस्ताक।
प्याला प्रेम पिलाइया गगन मँडल गरगाप३ ॥ ५ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु की सैन।
उर अंतर परकासिया अजब सुनाये बैन ॥ ६ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु की सैल।
बजर पौरि पट खोल कर ले गया झीनी गैल ॥ ७ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के तीर।
सब संतन सिरताज है सतगुरु अदल कबीर ॥ ८ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के माँह।
सब्द सरूपी अंग है पिंड प्रान नहि छाँह ॥ ६ ॥
(१) बिलास। (२) एक आकाशी चिड़िया जो आकाश ही में अंडा देती है और अंडे
के पृथ्वी पर पहुँचने के पहले बच्चा निकल कर ऊपर को उड़ जाता है। (३) मतवाला।