सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 186 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

गुरुदेव के अंग ११
ऐसा सतगुरु हम मिला मालिक मुरसिद पीर।
मारा भलका¹ भेद से लगे ज्ञान के तीर ॥२२॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तेज पुँज के अंग।
झिलमिल नूर जहूर है रूप रेख नहिं रंग ॥२३॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तेज पुंज की लोय²।
तन मन अरपों सीस हू होनी होय सो होय ॥२४॥
ऐसा सतगुरु हम मिला खोले बज्र किवार।
अगम दीप कूँ ले गया जहाँ ब्रह्म दरबार ॥२५॥
ऐसा सतगुरु हम मिला खोले बज्र कपाट।
अगम भूमि कूँ गम करी उतरे औघट घाट ॥२६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला मारी गाँसी सैन।
रोम रोम में सालती पलक नहीं है चैन ॥२७॥
सतगुरु भलका खैंच कर लाया बान जो एक।
साँस उभारे सालता पड़ा कलेजे छेक ॥२८॥
सतगुरु मारा बान कस कैबर³ गाँसी खैंच।
भरम करम सब जरि गये लई कुबुधि सब ऐंच ॥२६॥
सतगुरु आये दया कर ऐसे दीन-दयाल।
बंदि छोड़ाई बिरद⁴ सुनि जठर अगिन प्रतिपाल ॥३०॥
जठर अगिन से राखिया प्याया अमृत छीर।
जुगन जुगन सतसंग है समझ कुटिल बेपीर ॥३१॥
जोनी संकट मेटि हैं ऊरध मुख नहि आय।
ऐसा सतगुरु सेइये जम से लेत छुड़ाय ॥३२॥
पर उनके हिन्दू शिष्य चाहते थे कि शरीर को दाह करें और मुसलमान चाहते थे कि गाड़
दें परन्तु शरीर गुप्त हो गया और इस तरह आपस का झगड़ा निबट गया।
(१) कमान । (२) लौ । (३) काँटेदार गाँसी जो घुसने पर निकलती नहीं । (४) स्तुति
( चेतावनी की पहिली साखी का नोट देखो ) ।