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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

१२ गरीबदास जी की बानी
जम जोरा जा से डरे धर्मराय के दूत।
चौदह१ कोर न चंपहीं सुन सतगुरु की कूत२ ॥३३॥
जम जोरा जा से डरै धर्मराय धर धीर।
ऐसा सतगुरु एक है अद्ली अदल कबीर ॥३४॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के अंक।
कागज लीरैं३ दरगह दई चौदह कोर न चंप ॥३५॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के रेख।
अद्ली अदल कबीर है कुल के सतगुरु एक ॥३६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला पहुँचा बंक निदान।
नौका नाम चढ़ाय कर पार किये परवान ॥३७॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के माँह।
नौका नाम चढ़ाय कर ले राखे निज ठाँह ॥३८॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के बीच।
खेवट सब कूँ खेवता क्या उत्तम क्या नीच ॥३६॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं जीव।
ऐसा सतगुरु हम मिला ले परसाया पीव ॥४०॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं हंस।
ऐसा सतगुरु हम मिला अलख लखाया बंस ॥४१॥
माया का रस पीय कर फूट गये दोउ नैन।
ऐसा सतगुरु हम मिला बास दिया सुख चैन ॥४२॥
माया का रस पीय कर होगये डावाँडोल।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग दिया खोल ॥४३॥
माया का रस पीय कर होगये भूत खबीस।
ऐसा सतगुरु हम मिला भक्ति दई बकसीस ॥४४॥
(१) जम गिनती में १४ हैं। (२) बल। (३) धज्जियाँ—अर्थ यह है कि कर्म के
लेखे फट कर मालिक की दरगाह में दाखिल हो गये अब चौदह जम कोर नहीं
दबा सकते।