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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

-९. २० ] छायाव्यवहारः [ २७३
इष्टनाडिकानां छायानयनसूत्रम्—
द्विगुणितदिनभागहृता शङ्कुमितिः शङ्कुमानोना ।
यद्दलच्छ्छायायुक्ता छाया तत्स्वेष्टकालिका भवति ॥ १८ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वादशाङ्गुलशङ्कोर्यद्दलच्छायाऽङ्गुलद्वयी ।
दशानां घटिकानां भा का छिन्नादिकं दिनम् ॥ १९ ॥ '
पादच्छायालक्षणे पुरुषस्य पादप्रमाणस्य परिभाषासूत्रम्—
पुरुषोन्नतिसप्तांशस्तत्पुरुषाङ्घ्रेस्तु दैर्घ्यं स्यात् ।
यद्येवं चेत्पुरुषः स भाग्यवानङ्घ्रिभा स्पष्टा ॥ २० ॥
आरूढच्छायायाः संख्यानयनसूत्रम्—


घटियों में दिए गये दिन के समय की संवादी छाया का माप निकालने के नियम—
शंकु ( style ) का माप दिन के दिये गये भाग के माप की दुगुनी राशि द्वारा भाजित किया
जाता है । परिणामी भजनफल में से शंकु का माप घटाया जाता है, और उसमें विषुवच्छाया ( दोपहर
के समय की ऐसे स्थान की छाया, जहाँ दिन रात तुल्य होते हैं ) का माप जोड़ दिया जाता है । यह
दिन के इष्ट समय पर छाया का माप उत्पन्न करता है ॥ १८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि, किसी १२ अंगुल वाले शंकु के संबंध में, द्युदलच्छाया ( विषुवच्छाया ) २ अंगुल हो, तो
जब १० घटी दिन बीत चुका हो अथवा बीतने वाला हो उस समय शंकु की छाया का माप क्या है ?
दिन का मान ३० घटियाँ होता है ॥ १९ ॥
छाया के पाद प्रमाण माप के द्वारा लिए गये मापों संबंधी मनुष्य के पाद माप की परिभाषा—
किसी मनुष्य की ऊँचाई के १/७ भाग के तुल्य उसके पाद की लंबाई होती है । यदि ऐसा
हो, तो वह मनुष्य भाग्यशाली होगा । इस प्रकार पाद प्रमाण से नापी गई छाया का माप
स्पष्ट है ॥ २० ॥
ऊर्ध्वाधर दीवाल पर आरूढ़ छाया का संख्यात्मक माप निकालने के लिये नियम—

है, जहाँ 'व' शंकु की विषुवच्छाया की लंबाई है । यह सूत्र ऊपर की गाथा ८½ में दिये गये सूत्र की पाद
टिप्पणी पर आधारित है ।
( १८ ) बीजीय रूप से,
छ = उ / २घ - उ + व, जहाँ घ, दिन के समय का माप घटी में दिया गया है । यह सूत्र श्लोक°
१५½ वें की पाद टिप्पणी में दिये गये सूत्र से प्राप्त होता है ।
ग० सा० सं०-३५

२७४ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. २१-
नृच्छायाहतशङ्कुर्भित्तिस्तम्भान्तरोनितो भक्तः ।
नृच्छाययैव लब्धं शङ्कोर्भित्त्याश्रितच्छाया ॥ २१ ॥
अत्रोद्देशकः
विंशतिहस्तः स्तम्भो भित्तिस्तम्भान्तरं करा अष्टौ ।
पुरुषच्छाया द्विघ्ना भित्तिगता स्तम्भभा किं स्यात् ॥ २२ ॥
स्तम्भप्रमाणं च भित्त्यारूढस्तम्भच्छायासंख्यां च ज्ञात्वा भित्तिस्तम्भान्तरसंख्यानयन-
सूत्रम्—
पुरुषच्छायानिघ्नं स्तम्भारूढान्तरं तयोर्मध्यम् ।
स्तम्भारूढान्तरहृततदन्तरं पौरुषी छाया ॥ २३ ॥
शंकु की ऊँचाई ( मनुष्य की ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मनुष्य की छाया द्वारा गुणित की
जाती है । परिणामी गुणनफल दीवाल और शंकु के बीच की दूरी के माप द्वारा हासित किया जाता
है । इस प्रकार प्राप्त अंतर मनुष्य की उपर्युक्त छाया के माप द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार
प्राप्त भजनफल शंकु की छाया के उस भाग का माप होता है जो दीवाल पर आरूढ़ है ॥ २१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई स्तंभ २० हस्त ऊँचा है । इस स्तंभ और दीवाल के बीच की दूरी ( जो छाया रेखानुसार
नापी जाती है ) ८ हस्त है । उस समय मनुष्य की छाया मनुष्य की ऊँचाई से दुगुनी है । स्तंभ की
छाया का वह कौन-सा भाग है जो दीवाल पर आरूढ़ है ? ॥ २२ ॥
जब दीवाल पर आरूढ़ ( पड़ी हुई ) छाया का संख्यात्मक मान तथा स्तंभ की ऊँचाई, दोनों
ज्ञात हों, तब दीवाल और स्तंभ के अंतर ( बीच की दूरी ) के माप के संख्यात्मक मान को निकालने
के लिये नियम—
स्तंभ की ऊँचाई और दीवाल पर आरूढ़ ( पड़ी हुई ) छाया के माप का अंतर ( मनुष्य की
ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) पुरुष की छाया के माप द्वारा गुणित होकर, उक्त स्तंभ और दीवाल के अंतर
की माप को उत्पन्न करता है । इस अंतर का मान, स्तंभ की ऊँचाई और दीवाल पर आरूढ़ (पड़ी हुई)
छायांश माप के अंतर द्वारा भाजित किया जाने पर, ( मनुष्य की ऊँचाई के पदों में व्यक्त) मानवी छाया
का माप उत्पन्न करता है ॥ २३ ॥
( २१ ) बीजीय रूप से,
अ = (उ × ब - स) / ब , जहाँ उ शंकु की ऊँचाई है,
अ दीवाल पर आरूढ़ छाया की ऊँचाई के पदों में व्यक्त
मनुष्य की छाया का माप है, और स स्तंभ ( शंकु ) और
दीवाल के बीच की दूरी है । नियम का स्पष्टीकरण पार्श्व में
दिये गये चित्र द्वारा हो जाता है । यह बात ध्यान में रखने

  • योग्य है कि यहाँ स्तंभ और दीवाल के बीच की दूरी छाया रेखा पर ही नापी जाना चाहिए ।
    ( २३ और २६ ) इस नियम तथा २६ वीं गाथा के नियम में २१ वीं गाथा में दिये गये उदाहरणों
    की विलोम दशा का उल्लेख है ।

-९. २७ ] छायाव्यवहारः २७५
अत्रोद्देशकः
विंशतिहस्तः स्तम्भः षोडश भित्त्याश्रितच्छाया ।
द्विगुणा पुरुषच्छाया भित्तिस्तम्भान्तरं किं स्यात् ॥ २४ ॥
अपरार्धस्योदाहरणम्
विंशतिहस्तः स्तम्भः षोडश भित्त्याश्रितच्छाया ।
कियती पुरुषच्छाया भित्तिस्तम्भान्तरं चाष्टौ ॥ २५ ॥
आरूढच्छायायाः संख्यां च भित्तिस्तम्भान्तरभूमिसंख्यां च पुरुषच्छायायाः संख्यां
च ज्ञात्वा स्तम्भप्रमाणसंख्यानयनसूत्रम्—
नृच्छायाघ्नारूढा भित्तिस्तम्भान्तरेण संयुक्ता ।
पौरुषभाहृतलब्धं विदुः प्रमाणं बुधाः स्तम्भे ॥ २६ ॥
अत्रोद्देशकः
षोडश भित्त्यारूढच्छाया द्विगुणैव पौरुषी छाया ।
स्तम्भोत्सेधः कः स्याद्भित्तिस्तम्भान्तरं चाष्टौ ॥ २७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक स्तंभ २० हस्त ऊँचा है, और दीवाल पर पड़ने वाली छाया के अंश का माप (ऊँचाई)
१६ हस्त है। उस समय पुरुष की छाया पौरुषी ऊँचाई से दुगुनी है। स्तंभ और दीवाल के अंतर
का माप क्या हो सकता है ? ॥ २४ ॥
नियम के उत्तरार्द्ध भाग के लिए उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई स्तंभ ऊँचाई में २० हस्त है, और दीवाल पर पड़ने वाली उसकी छाया की ऊँचाई १६
है । दीवाल और स्तंभ का अंतर ८ हस्त है । पौरुषी ऊँचाई के प्रमाण द्वारा व्यक्त मानवी छाया का
माप क्या है ? ॥ २५ ॥
जब दीवाल पर पड़ने वाली छाया के भाग की ऊँचाई का संख्यात्मक मान, उस स्तंभ तथा
दीवाल का अंतर, और मानुषी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानुषी छाया का माप भी ज्ञात हो, तब स्तंभ
की ऊँचाई का संख्यात्मक मान निकालने के लिये नियम—
दीवाल पर पड़ने वाली छाया के भाग का माप, मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानवी छाया
के माप द्वारा गुणित किया जाता है । इस गुणनफल में स्तंभ और दीवाल के अंतर (बीच की दूरी)
का माप जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग को मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानवी छाया के
माप द्वारा भाजित करने से जो भजनफल प्राप्त होता है वह बुद्धिमानों के द्वारा स्तंभ की ऊँचाई का
माप कहा जाता है ॥ २६ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दीवाल पर स्तंभ की छाया पड़ने वाला भाग १६ हस्त है । उस समय मानवी छाया का मान
मानवी ऊँचाई से दुगुना है । दीवाल और स्तंभ का अंतर ८ हस्त है। स्तंभ की ऊँचाई क्या है ? ॥२७॥

२७६ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. २८-
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रविभक्तसूत्रम्—
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रं तु सैकपौरुष्या ।
भक्तं शङ्कुमितिः स्याच्छङ्कुच्छाया तदूनमिश्रं हि ॥ २८ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रं तु पञ्चाशत् ।
शङ्कूतसेधः कः स्याच्चतुर्गुणा पौरुषी छाया ॥ २९ ॥
शङ्कुच्छायापुरुषच्छायामिश्रविभक्तसूत्रम्—
शङ्कुन्नरच्छायायुतिर्विभाजिता शङ्कुसैकमानेन ।
लब्धं पुरुषच्छाया शङ्कुच्छाया तदूनमिश्रं स्यात् ॥ ३० ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कोरूत्सेधो दश नृच्छायाशङ्कुभामिश्रम् ।
पञ्चोत्तरपञ्चाशन्नृच्छाया भवति कियती च ॥ ३१ ॥
शंकु की ऊँचाई तथा शंकु की छाया की लंबाई के मापों के दत्त मिश्रित योग में से उन्हें
अलग-अलग निकालने के लिए नियम—
शंकु के माप और उसकी छाया के माप के मिश्रित योग को जब १ द्वारा बढ़ाये गये ( मानवी
ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया के माप द्वारा भाजित करते हैं, तब शंकु की ऊँचाई का माप
प्राप्त होता है । दिये गये योग को शंकु के इस माप द्वारा हासित करने पर शंकु की छाया का माप
प्राप्त होता है ॥ २८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु के ऊँचाई माप और उसकी छाया के लंबाई माप का योग ५० है । शंकु की ऊँचाई क्या
होगी, जबकि मानवी छाया उस समय मानवी ऊँचाई की चौगुनी है ? ॥ २९ ॥
शंकु की छाया की लम्बाई के माप और ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया के
मापके मिश्रित योग में से उन्हें अलग-अलग प्राप्त करने के लिए नियम—
शंकु की छाया तथा मनुष्य की छाया के मापों के मिश्रित योग को एक द्वारा बढ़ाई गई शंकु
की ज्ञात ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । इस प्रकार प्राप्त भजनफल ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त )
मानवी छाया का माप होता है । उपर्युक्त मिश्रित योग जब मानवी छाया के इस माप द्वारा हासित
किया जाता है, तब शंकु की छाया की लंबाई का माप उत्पन्न होता है ॥ ३० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी शंकु की ऊँचाई १० है । ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया और शंकु
की छाया के मापों का योग ५५ है । मानवी छाया तथा शंकु की छाया की लंबाई क्या-क्या हैं ? ॥ ३१॥
(२८ और ३०) यहाँ दिये गये नियम गाथा १२½ के उत्तरार्द्ध में कथित नियम पर आधारित हैं ।

  • ९. ३४ ] छायाव्यवहारः [ २७७
    स्तम्भस्य अवनतिसंख्यानयनसूत्रम्—
    छायावर्गोच्छोध्या नरभाकृतिगुणितशङ्कुकृतिः ।
    सैकनरच्छायाकृतिगुणिता छायाकृतेः शोध्या ॥ ३२ ॥
    तन्मूलं छायायां शोध्यं नरभानवर्गरूपेण¹ ।
    भागं हृत्वा लब्धं स्तम्भस्यावनतिरेव स्यात् ॥ ३३ ॥
    अत्रोद्देशकः
    द्विगुणा पुरुषच्छाया त्र्युत्तरदशहस्तशङ्कोर्भा ।
    एकोनत्रिंशत्सा स्तम्भावनतिश्च का तत्र ॥ ३४ ॥
    १. हस्तलिपि में नरभान के लिए नृभावर्ग पाठ है; परन्तु वह छंद की दृष्टि से अशुद्ध है ।
    किसी स्तंभ अथवा ऊर्ध्वाधर शंकु की अवनति (झुकाव) के माप को निकालने के लिए नियम—
    मानवी छाया के वर्ग और शंकु की ऊँचाई के वर्ग के गुणनफल को दी गई छाया के वर्ग में
    घटाया जाता है । यह शेष, मानवी छाया की वर्ग राशि में एक जोड़ने से प्राप्त योगफल द्वारा गुणित
    किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि दी गई छाया के वर्ग में से घटायी जाती है । परिणामी शेष
    के वर्गमूल को छाया के दिये गये माप में से घटाया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि को जब मानवी
    छाया की वर्ग राशि में एक जोड़ने से प्राप्त योगफल द्वारा भाजित किया जाता है, तब स्तंभ की शुद्ध
    अवनति ( झुकाव ) का माप प्राप्त होता है ॥ ३२-३३ ॥
    उदाहरणार्थ प्रश्न
    इस समय मानवी छाया मानवी ऊँचाई से दुगुनी है । स्तंभ की छाया २९ हस्त है, और
    स्तंभ की ऊँचाई १३ हस्त है । यहाँ स्तंभ की अवनति का माप क्या है ? ॥ ३४ ॥ प्रासाद के भीतर
    ( ३२-३३ ) मानलो अवनत ( झुके हुए ) स्तंभ की
    स्थिति अ ब द्वारा निरूपित है । मानलो वही स्तंभ ऊर्ध्वाधर ( लंब-
    रूप ) स्थिति में अ द द्वारा निरूपित है । क्रमशः अ स तथा अ इ
    उनकी छाया हैं । तब उस समय मानव की छाया और उसकी
    ऊँचाई का अनुपात अ इ / अ द होगी । मानलो यह अनुपात र के बराबर
    है । ब से अद पर गिराया गया लंब ब ग अवनत स्तंभ अ ब की
    अवनति निरूपित करता है । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता है कि
    √( (अ ब)² - (ब ग)² ) / (अ स - ब ग) = अ द / अ इ = १ / र । इससे यह देखा जा सकता है कि
    ब ग = [ अ स - √( (अ स)² - { (अ स)² - (अ ब)² × र² } ( र² + १ ) ) ] / ( र² + १ ) ।
    यहाँ दिया गया नियम इसी सूत्र के रूप में प्ररूपित होता है ।

२७८ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. ३५-
कश्चिद्राजकुमारः प्रासादाभ्यन्तरस्थःसन् ।
पूर्वाह्ने जिज्ञासुर्दिनगतकालं नरच्छायाम् ॥ ३५ ॥
द्वात्रिंशद्धस्तोर्ध्वे जाले प्राग्भित्तिमध्य आयाता ।
रविभा पश्चाद्भित्तौ व्यकत्रिंशत्करोर्ध्वदेशस्था ॥ ३६ ॥
तद्भित्तिद्वयमध्यं चतुरुत्तरविंशतिः करास्तस्मिन् ।
काले दिनगतकालं नृच्छायां गणक विगणय्य ।
कथयच्छायागणिते यद्यस्ति परिश्रमस्तव चेत् ॥ ३७½ ॥
समचतुरश्रायां दशहस्तघनायां नरच्छाया ।
पुरुषोत्सेधद्विगुणा पूर्वाह्ने प्राक्तटच्छाया ॥ ३८½ ॥
तस्मिन् काले पश्चात्तटाश्रिता का भवेद्गणक ।
आरूढच्छायाया आनयनं वेत्सि चेत्कथय ॥ ३९½ ॥
शङ्कोर्दीपच्छायानयनसूत्रम्—
शङ्कूनितदीपोन्नतिराप्ता शङ्कुप्रमाणेन ।
तल्लब्धहृतं शङ्कोः प्रदीपशङ्क्वन्तरं छाया ॥ ४०½ ॥
ठहरा हुआ कोई राजकुमार पूर्वाह्न दिन में बीते हुए समय को ज्ञात करने का, तथा (मानवी ऊँचाई के
पदों में व्यक्त) मानवी छाया के माप को ज्ञात करने का इच्छुक था । तब सूर्य की रश्मि पूर्व की
ओर की दीवाल के मध्य में ३२ हस्त ऊँचाई पर स्थित खिड़की में से आकर, पश्चिम ओर की दीवाल
पर २९ हस्त की ऊँचाई तक पड़ी । उन दो दीवालों का अंतर २४ हस्त है । हे छाया प्रश्नों से भिज्ञ
गणितज्ञ, यदि तुमने छाया-प्रश्नों (से परिचित होने) में परिश्रम किया हो, तो (उस दिन) बीते
हुए दिन के समय का माप और उस समय (मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त) मानवी छाया का
माप बतलाओ ॥ ३५-३७½ ॥
पूर्वाह्न समय मानवी छाया मानवी ऊँचाई से दुगुनी है । प्रत्येक विमिति में (dimension)
१० हस्त वाले वर्गाकार छेद के ऊर्ध्वाधर खात के संबंध में पूर्वी दीवाल से उत्पन्न, पश्चिमी दीवाल
पर पड़ने वाली की ऊँचाई क्या होगी ? हे गणितज्ञ, यदि जानते हो, तो बतलाओ की लंबरूप दीवाल
पर आरूढ छाया छाया का माप कितना होगा ? ॥ ३८½-३९½ ॥
किसी दीवाल के प्रकाश के कारण उत्पन्न होनेवाली शंकु की छाया को निकालने के लिये नियम:—
शंकु की ऊँचाई द्वारा हासित दीपक की ऊँचाई को शंकु की ऊँचाई द्वारा भाजित करना
चाहिये । यदि इस प्रकार प्राप्त भजनफल के द्वारा दीपक और शंकु के बीच की क्षैतिज दूरी को भाजित
किया जाय तो शंकु की छाया का माप उत्पन्न होता है ॥ ४०½ ॥
(३५-३७½) यह प्रश्न श्लोकों ८½ और २३ में दिये गये नियमों के विषय में है ।
(३८½-३९½) यह प्रश्न श्लोक २१ में दिये गये नियमानुसार हल किया जाता है ।
(४०½) बीजीय रूप से कथित नियम यह है:—छ = स ÷ (ब - अ)/अ , जहाँ 'छ' शंकु की छाया का

-९. ४४ ] छायाव्यवहारः [ २७९
अत्रोद्देशकः
शङ्कुप्रदीपयोर्मध्यं षण्णवत्यङ्गुलानि हि ।
द्वादशाङ्गुलशङ्कोस्तु दीपच्छायां वदाशु मे षष्टिर्दीपशिखोत्सेधो गणितार्णवपारग ॥ ४२ ॥
दीपशङ्क्वन्तरानयनसूत्रम्—
शङ्कुनितदीपोन्नतिराप्ता शङ्कुप्रमाणेन ।
तल्लब्धहता शङ्कुच्छाया शङ्कुप्रदीपमध्यं स्यात् ॥ ४३ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुच्छायाङ्गुलान्यष्टौ षष्टिर्दीपशिखोदयः ।
शङ्कुदीपान्तरं ब्रूहि गणितार्णवपारग ॥ ४४ ॥
दीपोन्नतिसंख्यानयनसूत्रम्—
————————————————————————————————————————————————
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी शंकु और दीपक की क्षैतिज दूरी वास्तव में ९६ अंगुल है । दीपक की लौ की ऊँचाई
जमीन से ६० अंगुल है । हे गणितार्णव (गणित समुद्र) के पारगामी, मुझे शीघ्र ही १२ अंगुल
ऊँचे शंकु के संबंध में दीपक की लौ के कारण उत्पन्न होने वाली छाया का माप बतलाओ ॥ ४१½-४२ ॥
दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर को प्राप्त करने के लिए नियम—
(जमीन से) दीपक की ऊँचाई को शंकु की ऊँचाई द्वारा ह्रासित किया जाता है । परिणामी
राशि को शंकु की ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । शंकु की छाया के माप को, इस प्रकार प्राप्त भजनफल
द्वारा गुणित करने पर, दीपक और शंकु का क्षैतिज अंतर प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु की छाया की लंबाई ८ अंगुल है । दीप शिखा (दीपक की लौ) की (जमीन से)
ऊँचाई ६० अंगुल है । हे गणितार्णव के पारगामी, दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर के माप को
बतलाओ ॥ ४४ ॥
दीपक की (जमीन से ऊपर की) ऊँचाई के संख्यात्मक माप को प्राप्त करने के लिये नियम--
————————————————————————————————————————————————
माप है, 'अ' शंकु की ऊँचाई का माप है, ब' दीपक की ऊँचाई का माप है,
और 'स' दीपक तथा शंकु के बीच का क्षैतिज अंतर है ।
यह सूत्र पार्श्व में दी गई आकृति से स्पष्ट रूप से सिद्ध किया जा
सकता है ।
(४३) पिछली टिप्पणी में उपयोग में लाये गये प्रतीकों को ही उप-
योग में लाकर, इस नियमानुसार स = छ × (ब - अ) / अ होता है ।
(४४) अगले ४६-४७ वें श्लोकों के अनुसार शंकु की ऊँचाई का दिया गया माप १२
अंगुल है ।

२८० ] गणितसारसंग्रहः [ ९. ४५-
शङ्कुच्छायाभक्तं प्रदीपशङ्क्वन्तरं सैकम् ।
शङ्कुप्रमाणगुणितं लब्धं दीपोन्नतिर्भवति ॥ ४५ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुच्छाया द्विनिघ्नैव द्विशतं शङ्कुदीपयोः ।
अन्तरं ह्यङ्गुलान्यत्र का दीपस्य समुन्नतिः ॥ ४६ ॥
शंकुप्रमाणमत्रापि द्वादशाङ्गुलकं गते ।
ज्ञात्वोदाहरणे सम्यग्विद्यात्सूत्रार्थपद्धतिम् ॥ ४७ ॥
पुरुषस्य पादच्छायां च तत्पादप्रमाणेन वृक्षच्छायां च ज्ञात्वा वृक्षोन्नतेः संख्यानयनस्य
च, वृक्षोन्नतिसंख्यां च पुरुषस्य पादच्छायायाः सङ्ख्यानयनस्य च सूत्रम्—
स्वच्छायया भक्तनिजेष्टवृक्षच्छाया पुनस्सप्तभिराहता सा ।
वृक्षोन्नतिः साद्रिहृता स्वपादच्छायाहता स्याद्द्रुमभैव नूनम् ॥ ४८ ॥
दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर के माप को, शंकु की छाया द्वारा भाजित किया जाता है ।
तब इस परिणामी भजनफल में एक जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि जब शंकु की ऊँचाई के
माप द्वारा गुणित की जाती है, तब दीपक की ( जमीन से ऊपर की ) ऊँचाई का माप उत्पन्न
होता है ॥ ४५ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु की छाया की लंबाई उसकी ऊँचाई से दुगुनी है । दीपक और शंकु की क्षैतिज दूरी का
माप २०० अंगुल है । इस दशा में दीपक की जमीन से ऊँचाई कितनी है ? इसी तथा गत प्रश्न में
शंकु की ऊँचाई १२ अंगुल लेकर नियम के साधन का अर्थ भलीभाँति सीख लेना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥
जब मनुष्य की ( पाद प्रमाण में दी गई ) छाया की लंबाई का माप तथा ( उसी पाद प्रमाण
में दी गई ) वृक्ष की छाया की लंबाई का माप ज्ञात हों, तब उस वृक्ष की ऊँचाई का संख्यात्मक
माप निकालने के लिए नियम; साथ ही जब ( उसी पाद प्रमाण में ) वृक्ष की ऊँचाई का संख्यात्मक
माप तथा मनुष्य की छाया की लंबाई का संख्यात्मक माप ज्ञात हो, तब ( उसी पाद प्रमाण में ) वृक्ष
की छाया की लंबाई का संख्यात्मक माप निकालने के लिये नियम—
किसी व्यक्ति द्वारा चुने गये वृक्ष की छाया की लंबाई के माप को निज पाद प्रमाण में नापी
गई उसकी निज की छाया के माप द्वारा भाजित किया जाता है । इससे वृक्ष की ऊँचाई प्राप्त होती है ।
यह वृक्ष की ऊँचाई ७ द्वारा भाजित होकर और निज पाद प्रमाण में नापी गई निज की छाया द्वारा
गुणित होकर, निःसन्देह, वृक्ष की छाया की शुद्ध लंबाई के माप को उत्पन्न करती है ॥ ४८ ॥
( ४५ ) इसी प्रकार, ब = ( स/छ + १ ) अ
( ४८ ) यह नियम उपर्युक्त १२½ वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में दिये गये नियम की विलोम दशा है ।
यहाँ दिये गये नियम में मनुष्य की ऊँचाई और उसके पाद माप के बीच का संबंध उपयोग में लाया
गया है ।

-९. ५२ ½ ] छायाव्यवहारः [ २८१
अत्रोद्देशकः
आत्मच्छाया चतुःपादा वृक्षच्छाया शतं पदाम् ।
वृक्षोच्छ्रायः को भवेत्स्वपादमानेन तं वद ॥ ४९ ॥
वृक्षच्छायायाः संख्यानयनोदाहरणम्—
आत्मच्छाया चतुःपादा पञ्चसप्ततिभिर्युतम् ।
शतं वृक्षोन्नतिर्वृक्षच्छाया स्यात्कियती तदा ॥ ५० ॥
पुरतो योजनान्यष्टौ गत्वा शैलो दशोदयः ।
स्थितः पुरे च गत्वान्यो योजनाशीतितस्ततः ॥ ५१ ॥
तदग्रस्थाः प्रदृश्यन्ते दीपा रात्रौ पुरे स्थितैः ।
पुरमध्यस्थशैलस्यच्छाया पूर्वांगमूलयुक् ।
अस्य शैलस्य वेधः को गणकाशु प्रकथ्यताम् ॥ ५२ ½ ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ छायाव्यवहारो नाम अष्टमः समाप्तः ॥
॥ समाप्तोऽयं सारसंग्रहः ॥
उदाहरणार्थ एक प्रश्न
पाद माप में निज की छाया की लम्बाई ४ है । ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की छाया की
लम्बाई १०० है । बतलाओ कि ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की ऊँचाई क्या है ? ॥ ४९ ॥
किसी वृक्ष की छाया के संख्यात्मक माप को निकालने के संबंध में उदाहरण—
किसी समय निज की छाया की लम्बाई का माप निज के पाद से चौगुना है । किसी वृक्ष की
ऊँचाई ( ऐसे पाद-माप में ) १७५ है । उस वृक्ष की छाया का माप क्या है ? ॥ ५० ॥ किसी नगर के पूर्व
की ओर ८ योजन (दूरी) चल चुकने के पश्चाव, १० योजन ऊँचा शैल (पर्वत) मिलता है । नगर में भी
१० योजन ऊँचाई का पर्वत है । पूर्वी पर्वत से पश्चिम की ओर ८० योजन चल चुकने के पश्चात् , एक
और दूसरा पर्वत मिलता है । इस अंतिम पर्वत के शिखर पर रखे हुए दीप नगर निवासियों को दिखाई
देते हैं । नगर के मध्य में स्थित पर्वत की छाया पूर्वी पर्वत के मूल को स्पर्श करती है । हे गणक, इस
( पश्चिमी ) पर्वत की ऊँचाई क्या है ? शीघ्र बतलाओ ॥ ५१-५२ ½ ॥
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सार संग्रहनामक गणित शास्त्र में छाया नामक अष्टम व्यवहार
समाप्त हुआ ।
इस प्रकार यह सारसंग्रह समाप्त हुआ ।
( ५१-५२ ½ ) यह उदाहरण उपर्युक्त ४५ वें श्लोक में दिये गये नियम को निर्देशित करने
के लिये है ।

परिशिष्ट १

संख्याओं का अभिधान करनेवाले सामान्य और संख्यात्मक अर्थबोधक संस्कृत शब्द

शब्दसामान्य अर्थसंख्या अभिधानउद्गम
अक्षिआँख The eye२मनुष्य की दो आँखें होती हैं ।
अग्निआग Fire३होमाग्नियों की संख्या ३ है, अर्थात् , गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण ।
अङ्कसंख्या Number९शून्य को छोड़कर केवल ९ अङ्क होते हैं ।
अङ्गविज्ञान का एक विभाग<br>An auxiliary division or department of science६वेदों के अध्ययन के संबंध में ६ विभाग होते हैं, अर्थात् , शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दस्, ज्योतिष ।
अचलपर्वत A mountain७पौराणिक भूगोल में माने गये ७ मुख्य पर्वत जो कुलाचल कहलाते हैं; अर्थात् , महेन्द्र, मलय, सह्य, शक्तिमत्, ऋक्ष, विंध्य, पारियात्र ।
अद्रिपर्वत A mountain७अचल देखिए ।
अनन्तआकाश The sky०आकाश को शून्य समझा जाता है ।
अनलआग Fire३अग्नि देखिए ।
अनीकसेना An army८संस्कृत में ८ प्रकार की सेनाओं का उल्लेख है, अर्थात् पत्ति, सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू, अनीकिनी । ( जिनागम में गण की जगह अक्षौहिणी का उल्लेख है ।)
अन्तरिक्षआकाश The sky०अनन्त देखिए ।
अब्धिमहासागर The ocean४चार महासागर माने जाते हैं, अर्थात्, पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी ।
अम्बकआंख The eye२अक्षि देखिए ।
अम्बरआकाश The sky०अनन्त देखिए ।

२ गणितसारसंग्रह

शब्दसामान्य अर्थसंख्या अभिधानउद्गम
अम्बुधिमहासागर The ocean४अब्धि देखिए ।
अम्भोधिमहासागर The ocean४अब्धि देखिए ।
अश्वघोड़ा A horse७सूर्य के रथ में ७ घोड़े माने जाते हैं ।
अश्विन्घोड़े सहित Consi-७अश्व देखिए ।
ting of horse
आकाशआकाश The sky०अनन्त देखिए ।
इनसूर्य The sun१२वर्ष के बारह माहों के संवादी सूर्यों की संख्या १२ होती
है; अर्थात् , धातृ, मित्र, अर्यमन्, रुद्र, वरुण, सूर्य, भग,
विवस्वत्, पूषन्, सवितृ, त्वष्टृ और विष्णु । ये बारह
आदित्य कहलाते हैं ।
इन्दुचन्द्रमा The moon१पृथ्वी के लिये केवल एक चन्द्रमा है ।
इन्द्रइन्द्र देवता The god१४चौदह मन्वन्तरों में से प्रत्येक के लिये १ इन्द्र की दर से
Indraचौदह इन्द्र होते हैं ।
इन्द्रियइन्द्रिय An organ५इन्द्रियां पांच प्रकार की होती हैं, आँख, नाक, जीभ, कान
of senseऔर शरीर ( स्पर्शन ) ।
इभहाथी An elephant८संसार की आठ दिशा विदिशाओं की रक्षा आठ हाथी करते
हुए कहे जाते हैं । वे ऐरावत, पुण्डरीक, वामन, कुमुद,
अञ्जन, पुष्पदन्त, सार्वभौम और सुप्रतीक हैं ।
इषुधनुष An arrow५मन्मथ के पाँच बाण माने जाते हैं, अर्थात्, अरविन्द, अशोक,
चूत, नवमल्लिका और नीलोत्पल ।
ईक्षणआँख The eye२अक्षि देखिए ।
उदधिमहासागर४अब्धि देखिए ।
The ocean
उपेन्द्रभगवान् विष्णु९विष्णु के ९ अवतार माने जाते हैं ।
God Viṣṇu
ऋतुऋतु A season६संस्कृत साहित्य के अनुसार वर्षा में ६ ऋतुएँ होती हैं,
अर्थात् , वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर ।
करहाथ The hand२मानव के दो हाथ होते हैं ।
करणीयजो किये जाते हैं, व्रत५जैन धर्म के अनुसार पाँच प्रकार के व्रत होते हैं, अर्थात् ,
That which hasअहिंसा, अनृत, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ।
to be done : an
act of devotion
or austerity

गणितसारसंग्रह ३

शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम

करिन् | हाथी An elephant | ८ | इभ देखिए ।
कर्मन् | कर्म अथवा कार्य करने | ८ | जैन धर्म के अनुसार आठ प्रकार के कर्म ( प्रकृतिबंध )
| का प्रभाव Action : | | होते हैं, अर्थात्, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय,
| the effect of | | अन्तराय, वेदनीय, नामिक, गोत्रिक और आयूष्क ।
| action as its | |
| karma | |
कलाधर | चन्द्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए ।
कषाय | संसारी वस्तुओं में आसक्ति | ४ | जैन धर्म के अनुसार कर्मों के आस्रव का एक भेद कषाय
| Attachment to | | है, जिसके चार प्रकार हैं, अर्थात्, क्रोध, मान, माया
| worldly objects | | और लोभ ।
कुमारवदन | कुमार अथवा हिंदू युद्ध- | ६ | यह युद्धदेव छः मुखोंवाला माना जाता है ।
| देव के मुख The | | षण्मुख देखिये ।
| faces or Kumāra | |
| of the Hindu | |
| war-god | |
केशव | विष्णु का एक नाम A | ९ | उपेन्द्र देखिए ।
| name of Viṣṇu | |
क्षपाकर | चन्द्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए ।
ख | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए ।
खर | | ६ |
गगनं | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए ।
गज | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
गति | पुनर्जन्म का मार्ग | ४ | जैन धर्म के अनुसार संसारी जीव चार गतियों में जन्म लेते
| Passage into | | हैं, अर्थात्, देव, तिर्यञ्च, मनुष्य, नरक । पिथेगोरस का
| rebirth | | Tetractys इससे तुलनीय है ।
गिरि | पर्वत Mountain | ७ | अचल देखिए ।
गुण | गुण Quality | ३ | आदि पदार्थ में तीन गुण माने जाते हैं, अर्थात्, सत्त्व,
| | | रजस्, तमस् ।
ग्रह | ग्रह A planet | ९ | हिन्दू ज्योतिष में ९ प्रकार के ग्रह माने जाते हैं, अर्थात्,
| | | मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, सूर्य और
| | | चन्द्रमा ।
चक्षुस् | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।

४ गणितसारसंग्रह

शब्दसामान्य अर्थसंख्या अभिधानउद्गम
चन्द्रचन्द्रमा The moon१इन्दु देखिए ।
चन्द्रमस्चन्द्रमा The moon१इन्दु देखिए ।
जलधर पथआकाश Sky०अनन्त देखिए ।
जलधिमहासागर Ocean४अब्धि देखिए ।
जलनिधिमहासागर Ocean४अब्धि देखिए ।
जिनवह नाम जिसमें अरिहंत२४जिन आगम के अनुसार भरत कर्मक्षेत्र में अवसर्पिणी काल
सिद्ध, आचार्य, उपाध्यायमें २४ तीर्थंकर होते हैं; प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और
और सर्व साधुओं काअंतिम तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर माने जाते हैं।
नाम गर्भित रहता है।
The name which
implies Arhat,
Siddhas, Achryas,
Upadhyayas &
all Saints.
ज्वलनआग Fire३अग्नि देखिए ।
तत्वतत्व७जैन धर्म में सात तत्वों की मान्यता इस प्रकार है : जीव
Elementary Pri-(चेतन), अजीव (अचेतन), आस्रव (कर्मों के आने
nciples.के द्वार), बंध (कर्मों का आत्मा के साथ सम्बन्ध),
संवर (आस्रव का निरोध), निर्जरा (कर्मों का एक देश
नाश) और मोक्ष (आत्मा का पूर्ण रूप से कर्मों से छूटना)।
तनुकाय Body८शिव का तनु आठ वस्तुओं से बना हुआ माना जाता है :
पृथ्वी, अप्, तेजस्, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, यजमान ।
तर्कEvidence६तर्क के छः प्रकार हैं : प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द,
अर्थापत्ति और अनुपलब्धि ।
तार्क्ष्यध्वजविष्णु Viṣṇu९उपेन्द्र देखिए ।
तीर्थंकTirthankar or२४जिन देखिए ।
Jina.
दन्तिन्हाथी An elephant८इभ देखिए ।
दुरितसांसारिक कर्म८कर्मन् देखिए ।
Worldly action

गणितसारसंग्रह ५

शब्दसामान्य अर्थसंख्या अभिधानउद्गम
दुर्गापार्वती का अवतार<br>Name of Manifestation of Parvati or Durga.९दुर्गा के ९ अवतार माने जाते हैं ।
दिक्दिशा बिन्दु Quarter or a cardinal point of the universe.८लोक में आठ दिशाबिन्दु माने जाते हैं ।
दिक्दिशाएँ Directions१०दस दिशाओं की मान्यता इस प्रकार है कि चार दिशाएँ, चार विदिशाएँ तथा अधो और ऊर्ध्व दिशाएँ मिलकर दस दिशाएँ होती हैं ।
दिक्आकाश Sky०अनन्त देखिए ।
दृक्आँख The eye२अक्षि देखिए ।
दृष्टि” ” ””” ”
द्रव्यद्रव्य का लक्षण सत् है और जो उत्पत्ति, विनाश और ध्रौव्यता सहित है वह सत् है । Elementary substance whose characteristic is existence implying manifestation , disappearance & permanence.६जिनागम के अनुसार ६ द्रव्य हैं: जीव, धर्म, अधर्म, पुद्गल, काल और आकाश ।
द्विपहाथी<br>An Elephant८इभ देखिए ।
द्विरद”””
द्वीपपृथ्वी में स्थित पौराणिक द्वीप विभाग<br>A puranic insular division of the terrestrial world.७इनके सात विभाग हैं : जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौञ्च, शाक, पुष्कर ।

६ गणितसारसंग्रह

शब्द | सामान्य अर्थ | संख्याभिधान | उद्गम

धातु | शरीर के सरंचक | ७ | सप्त धातुएँ ये हैं—रस ( Chyle ), रक्त, मांस,
| अवयव Constituent | | चर्बी, अस्थि, मज्जा, वीर्य ।
| principles of | |
| the body. | |
धृति | छंद के एक विभेद | १८ | इस छंद में श्लोक के प्रत्येक पद में १८ अक्षर
| का नाम Name of | | रहते हैं ।
| a kind of metre. | |
नग | पर्वत | ७ | अचल देखिए ।
| Mountain | |
नन्द | राजाओं के वंश का नाम | ९ | कहा जाता है कि मगध में ९ नन्द राजाओं ने राज्य
| Name of a dyna- | | किया ।
| sty of kings | |
नभस् | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिये ।
नय | वस्तु के एक अंश ग्रहण | २ | जिनागम में मुख्यतः दो नयों का निरूपण है : द्रव्यार्थिक
| करने वाला ज्ञान | | नय और पर्यायार्थिक नय ।
| Method of | |
| Comprehending | |
| things from | |
| particular stand- | |
| points. | |
नयन | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।
नाग | हाथी An elephant | ८ | इभ देखिए ।
निधि | खजाना Treasure | ९ | कुबेर के पास नव प्रसिद्ध निधियाँ मानी जाती हैं :
| | | पद्म, महापद्म, शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द,
| | | नील, खर्व । जिनागम में चक्रवर्ती के भी इनसे भिन्न नव-
| | | निधियों का उल्लेख है ।
नेत्र | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।
पदार्थ | वस्तुओं के विभेद | ९ | जिनागम में सात तत्व तथा पुण्य और पाप ये दो
| Category of | | मिलकर नव पदार्थ होते हैं । तत्व देखिए ।
| things | |

गणितसारसंग्रह ७
शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम
पन्नग | सर्प The serpent | ७ | हिन्दू पुराणों में कभी कभी आठ और कभी कभी
| | | सात प्रकार के सर्पों का वर्णन मिलता है ।
पयोधि | समुद्र Ocean | ४ | अब्धि देखिए ।
पयोनिधि | " " | " | " "
पावक | अग्नि Fire | ३ | अग्नि देखिए ।
पुर | नगर City | ३ | हिन्दू पुराणों के अनुसार तीन असुरों के प्ररूपक तीन
| | | पुरों ने देवों के प्रति अत्याचार किया और शिव ने उन्हें
| | | विनष्ट किया । त्रिपुरान्तक से तुलना करिए ।
पुष्करिन् | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
प्रालेयांशु | चंद्रमा The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
बन्ध | कर्म बंध Karmic | ४ | जिनागम में बंध के मुख्यतः चार भेद बतलाए गये
| bondage | | हैं : प्रकृति बंध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध और प्रदेश बंध ।
बाण | बाण Arrow | ५ | इषु देखिए ।
भ | नक्षत्र | २७ | हिन्दू ज्योतिष में सूर्य पथ पर मुख्यतः २७ नक्षत्रों
| A constellation | | की गणना की गई है ।
भय | डर Fear | ७ |
भाव | तत्व Elements | ५ | पांच तत्व या पंच भूत ये हैं : पृथ्वी, अप्, तेजस्,
| | | वायु, आकाश ।
भास्कर | सूर्य The Sun | १२ | इन देखिए ।
भुवन | लोक The World | ३ | ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक, और अधोलोक, की मान्यता है ।
भूत | तत्व Element | ५ | भाव देखिए ।
भूभ्र | पर्वत Mountain | ७ | अचल देखिए ।
मद | घमण्ड Pride | ८ | अष्ट मद के भेद इस प्रकार है : ज्ञान, रूप, कुल,
| | | जाति, बल, ऋद्धि, तप, शरीर का मद ।
महीभ्र | पर्वत Mountain | ७ | अचल देखिए ।
मातृका | देवी A goddess | ७ | साधारणतः सात प्रकार की देवियाँ मानी जाती हैं ।
मुनि | साधु Sage | ७ | मुख्यतः सात प्रकार के ऋषियों का उल्लेख मिलता
| | | है : कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि,
| | | वसिष्ठ ।
मृगाङ्क | चंद्रमा The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
रुद्र | शिव या रुद्र का नाम | ११ | रुद्रों की संख्या ११ मानी गई है ।
| A name of Śiva | |
| or Rudra | |

८ गणितसारसंग्रह
शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम
यति | मुनि Sage | ७ | मुनि देखिए ।
रजनीकर | चंद्रमा The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
रत्न | त्रयनिधि Trinity | ३ | जिनागम में मोक्ष का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान,
| | | और सम्यक्चारित्र का एक होना बतलाया गया है, जिन्हें
| | | तीन रत्न भी निरूपित किया गया है ।
रत्न | मूल्यवान पत्थर A pre- | ९ | नव प्रकार के रत्न माने गये हैं : वज्र, वैडूर्य, गोमेद,
| cious gem | | पुष्पराग, पद्मराग, मरकत, नील, मुक्ता, प्रवाल ।
रन्ध्र | छिद्र Opening | ९ | मानव शरीर में नव मुख्य रन्ध्र होते हैं ।
रस | स्वाद Taste | ६ | मुख्य रस छः हैं : मधुर, अम्ल, लवण, कटुक,
| | | तिक्त, कषाय ।
रुद्र | शिव का नाम Name | ११ | मृड देखिए ।
| of a Deity | |
रूप | आकार Form or | १ | प्रत्येक वस्तु का केवल एक रूप होता है ।
| shape | |
लब्ध | नव शक्तियों की प्राप्ति | ९ | नव लब्धियाँ निम्नलिखित हैं : अनन्त दर्शन, अनन्त-
| Attainment of | | ज्ञान, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, क्षायिक दान,
| nine powers | | क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक
| | | वीर्य । ये कर्मों के क्षय से क्षायिक भाव के रूप प्राप्त
| | | होते हैं ।
लब्धि | Attainment | ९ | लब्ध देखिए ।
लेख्य | | ६ |
लोक | World | ३ | भुवन देखिए ।
लोचन | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।
वर्ण | | ६ | जिनागम में वर्ण के पांच प्रकार हैं : कृष्ण, नील, पीत,
| | | रक्त और श्वेत ।
वसु | वैदिक देवताओं की एक | ८ | ये देवता संख्या में आठ होते हैं ।
| जाति A class of | |
| Vedic deities | |
वह्नि | अग्नि Fire | ३ | अग्नि देखिए ।
वारण | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
वार्धि | समुद्र Ocean | ४ | अब्धि देखिए ।
विधु | चंद्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए ।
विषधि | समुद्र Ocean - | ४ | अब्धि देखिए ।
विषनिधि | " | " | "

गणितसारसंग्रह ९

शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम

विषय | इंद्रियों के विषय Ob- | ५ | पंचेन्द्रियों के विषय पांच हैं : गन्ध, रस, रूप; स्पर्श,
| ject of sense | | शब्द ।
वियत् | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए ।
विश्व | वैदिक देवताओं का | १३ | इस समूह में १३ सदस्य होते हैं।
| एक समूह A group | |
| of Vedic deities | |
विष्णुपद | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए ।
वेद | The Vedas | ४ | चार वेद ये हैं : ऋक्, यजुस्, साम, अथर्व ।
वैश्वानर | अग्नि Fire | ३ | अग्नि देखिए ।
व्यसन | बुरी आदत An | ७ | जिनागम में जीव का अहित करने वाले सप्त व्यसन
| unwholesome | | निम्नलिखित रूप में उल्लिखित हैं : द्यूत, मांस भक्षण,
| addiction | | मदिरापान, वेश्यागमन, परस्त्री सेवन, अस्तेय, आखेट ।
व्योम | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए ।
व्रत | अणु व्रत या महाव्रत | ५ | जिनागम में अणु व्रत और महाव्रत ५ हैं। हिंसा,
| Partial or whole | | झूठ, कुशील, परिग्रह और स्तेय (चोरी) नामक पंच
| act of devotion | | पापों से एक देश विरक्त होना अणुव्रत है। हिंसादि पांच
| or austerity | | पापों का सर्वथा त्याग करना महाव्रत है। करणीय भी
| | | देखिए ।
शङ्कर | रुद्र का नाम Name | ११ | मृड देखिए ।
| of Rudra | |
शर | बाण Arrow | ५ | इषु देखिए ।
शशधर | चंद्र The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
शशलाञ्छन | ” ” | ” | ” ”
शशाङ्क | ” ” | ” | ” ”
शशिन् | ” ” | ” | ” ”
शस्त्र | बाण Arrow | ५ | इषु देखिए ।
शिखिन् | अग्नि Fire | ३ | अग्नि देखिए ।
शिलीमुखपद | षट्पद The legs | ६ | मधुमक्खी या भौंरे के छः पैर माने जाते हैं।
| of a bee | |
शैल | पर्वत Mountain | ७ | अचल देखिए ।
श्वेत | | १ |
सलिलाकर | समुद्र Ocean | ४ | अब्धि देखिए ।
सागर | ; ” | ” | ” ”

१० गणितसारसंग्रह
शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम
सायक | बाण Arrow | ५ | इषु देखिए ।
सिन्धुर | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
सूर्य | The Sun | १२ | इन देखिए ।
सोम | चंद्र The moon | ४ | इन्दु देखिए ।
स्तम्बेरम | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
स्वर | संगीत का स्वर A | ७ | सात शब्द स्वर हैं : षडज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पञ्चम,
| note of the | | धैवत, विषाद । संगीत के प्रारम्भ में इन्हीं सप्त स्वरों के
| musical scale | | आदि अक्षरों को ग्रहण कर स, रि, ग, म, प, ध, नि का
| | | ज्ञान कराया जाता है ।
हय | घोड़ा Horse | ७ | अश्व देखिए ।
हर | रुद्र का नाम Name | ११ | मृड देखिए ।
| of Rudra | |
हर नेत्र | Siva’s eyes | ३ | शिव की दो आँखों के सिवाय एक और आंख मस्तक के
| | | मध्य में रहती है ।
हुतवह | अग्नि Fire | ३ | अग्नि देखिए ।
हुताशन | ” ” | ” | ” ”
हिमकर | चंद्रमा The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
हिमगु | ” ” | ” | ” ”
हिमांशु | ” ” | ” | ” ”

परिशिष्ट २
अनुवाद में अवतरित संस्कृत शब्दों का स्पष्टीकरण
आबाधा Segment of a straight line forming the base of a
Ābādhā triangle or a quadrilateral.
आढक A measure of grain.
Āḍhak परिशिष्ट-४ की सारिणी ३ देखिए ।
अध्वान The vertical space required for presenting the long
Adhvān and short syllables of all the possible varieties of
metre with any given number of syllables, the space
required for the symbol of a short or a long syllable
being one aguṅla and the intervening space between
each variety being also an aṅgula.
अध्याय ६—३३३½ से ३३६½ का टिप्पण देखिए ।
आदिधन Each term of a series in arithmetical progression is
Ādidhana conceived to consist of the sum of the first term
and a multiple of the common difference. The sum
of all the first terms is called the Ādidhan.
अध्याय २—६३ और ६४ का टिप्पण देखिए ।
आदिमिश्रधन The sum of a series in arithmetical progression
Ādimiśradhana combined with the first term thereof.
अध्याय २—८० से ८२ का टिप्पण देखिए ।
अगरु A kind of fragrant wood;
Agaru Amyris agallocha.
अम्ल वेतस A kind of sorrel; Rumex vesicarius.
Amla-vētasa
अमोघवर्ष Name of a king; lit : one who showers down truly
Amōghvarṣa useful rain.
अंश A measure of weight in relation to metals.
Aṁśa परिशिष्ट ४ की सारिणी ६ देखिए ।
अंशमूल 'Square root of a fractional part.
Aṁśamūla अध्याय ४-३ का टिप्पण देखिए ।