गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
मिश्रक व्यवहार एवं क्षेत्रगणित व्यवहार (Geometry of Polygons)
१७२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३११½-
अंशाप्तं व्येकं फलमाद्यन्यघ्नं गुणोनरूपहृतम् ॥ ३११½ ॥
अत्रोद्देशकः
दीनारार्धं पञ्चसु नगरेषु चयस्त्रिभागोऽभूत् । आदिस्त्र्यंशः पादो गुणोत्तरं सप्त भिन्नगुणचितिका ।
का भवति कथय शीघ्रं यदि तेऽस्ति परिश्रमो गणिते ॥ ३१३ ॥
अधिकहीनगुणसंकलितानयनसूत्रम्—
गुणचितिरन्यादिहृता विपदाधिकहीनसंगुणा भक्ता ।
व्येकगुणेनान्या फलरहिता हीनेऽधिके तु फलयुक्ता ॥ ३१४ ॥
गुणित करते हैं । इस क्रिया का फल दो स्थानों में लिखा जाता है । इस प्रकार प्राप्त, एक स्थान में रखे
हुए, फल के अंश को फल द्वारा ही भाजित करते हैं । तब उसमें से १ घटाया जाता है । परिणामी राशि
को श्रेढि के प्रथमपद द्वारा गुणित किया जाता है, और तब दूसरे स्थान में रखी हुई राशि द्वारा गुणित
किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त गुणनफल जब १ द्वारा हासित साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित किया
जाता है, तब श्रेढि का इष्ट योग उत्पन्न होता है ॥ ३११½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ नगरों के सम्बन्ध में, प्रथम पद १/२ दीनार है, और साधारण निष्पत्ति १/३ है । उन सबमें प्राप्त
दीनारों के योग को निकालो । प्रथमपद १/३ है, साधारण निष्पत्ति १/४ है और पदों की संख्या ७ है । यदि
तुमने गणना में परिश्रम किया हो, तो यहाँ गुणोत्तर भिन्नीय श्रेढि का योग बतलाओ ॥३१२½-३१३॥
गुणोत्तर श्रेढि का योग निकालने के लिये नियम, जहाँ किसी दी गई ज्ञात राशि द्वारा किसी
निर्दिष्ट रीति से पद या तो बढ़ाये या घटाये जाते हों—
जिसके सम्बन्ध में प्रथमपद, साधारण निष्पत्ति और पदों की संख्या दी गई है ऐसी शुद्ध गुणो-
त्तर श्रेढि के योग को दो स्थानों में लिखा जाता है । इनमें से एक को दिये गये प्रथमपद द्वारा भाजित
किया जाता है । इस परिणामी भजनफल में से पदों की दी गई संख्या को घटाया जाता है । परिणामी
शेष की प्रस्तावित श्रेढि के पदों में जोड़ी जानेवाली अथवा उनमें से घटाई जानेवाली दत्त राशि द्वारा
गुणित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि को १ द्वारा हासित साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित किया
जाता है । दूसरे स्थान में रखे हुए योग को इस अन्तिम परिणामी भजनफल राशि द्वारा हासित किया
जाता है, जब कि श्रेढि के पदों में से दी गई राशि घटाई जाती हो । पर, यदि वह जोड़ी जाती हो, तो
दूसरे स्थान में रखे हुए गुणोत्तर श्रेढि के योग को उक्त परिणामी भजनफल द्वारा बढ़ाया जाता है ।
प्रत्येक दशा में प्राप्तफल निर्दिष्ट श्रेढि का इष्ट योग होता है ॥ ३१४ ॥
( ३११½ ) इस नियम में, भिन्नीय साधारण निष्पत्ति का अंश हमेशा १ ले लिया जाता है ।
अध्याय २ की ९४ वीं गाथा तथा उसकी टिप्पणी द्रष्टव्य है ।
( ३१४ ) बीजीय रूप से, ± ( श/अ - न ) म ÷ ( र - १ ) + श; यह निम्नलिखित रूपवाली श्रेढि
का योग है—
अ, अर ± म, (अर ± म) र ± म, { (अर ± म) र ± म } र ± म, ..... इत्यादि ।
-६. ३१८ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७३
अत्रोद्देशकः
पञ्च गुणोत्तरमादिर्द्वौ त्रीण्यधिकं पदं हि चत्वारः ।
अधिकगुणोत्तरचितिका कथय विचिन्त्याशु गणिततत्त्वज्ञ ॥ ३१५ ॥
आदित्रीणि गुणोत्तरमष्टौ हीनं द्वयं च दश गच्छः ।
हीनगुणोत्तरचितिका का भवति विचिन्त्य कथय गणकाशु ॥ ३१६ ॥
आद्युत्तरगच्छधनमिश्राद्युत्तरगच्छानयनसूत्रम् —
मिश्रादुद्धृत्य पदं रूपोनेच्छाघनेन सैकेन । लब्धं प्रचयः शेषः सरूपपदभाजितः प्रभवः ॥३१७॥
अत्रोद्देशकः
आद्युत्तरपदमिश्रं पञ्चाशद्धनमिहैव संदृष्टम् । गणितज्ञाचक्ष्व त्वं प्रभवोत्तरपदधनान्याशु ॥३१८॥
संकलितगतिध्रुवगतिभ्यां समानकालानयनसूत्रम्—
ध्रुवगतिरादिविहीनश्चयदलभक्तः सरूपकः कालः ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
साधारण निष्पत्ति ५ है, प्रथमपद २ है, विभिन्न पदों में जोड़ी जानेवाली राशि ३ है, और पदों
की संख्या ४ है । हे गणित तत्त्वज्ञ, विचार कर शीघ्र ही (निर्दिष्ट रीति के अनुसार निर्दिष्ट राशि द्वारा
बढ़ाए जाते हैं पद जिसके ऐसी) गुणोत्तर श्रेढि के योग को बतलाओ ॥ ३१५ ॥
प्रथमपद ३ है, साधारण निष्पत्ति ८ है, पदों में से घटाई जानेवाली राशि २ है, और पदों की
संख्या १० है । ऐसी श्रेढि का, हे गणितज्ञ, योग निकालो ॥ ३१६ ॥
प्रथमपद, प्रचय, पदों की संख्या और किसी समान्तर श्रेढि के योग के मिश्रित योग में से प्रथम
पद, प्रचय और पदों की संख्या निकालने के लिये नियम —
श्रेढि के पदों की संख्या का निरूपण करनेवाली मन से चुनी हुई संख्या को दिये गये मिश्रित
योग में से घटाया जाता है । तब १ से आरम्भ होने वाली और एक कम पदों की (मन से चुनी
हुई) संख्यावाली प्राकृत संख्याओं का योग १ द्वारा बढ़ाया जाता है । इस परिणामी फल को भाजक
मान कर, ऊपर कथित मिश्रित योग से प्राप्त शेष को भाजित करते हैं । यह भजनफल इष्ट प्रचय होता
है, और इस भाजन की क्रिया में जो शेष बचता है उसे जब एक अधिक (मन से चुनी हुई) पदों की
संख्या द्वारा भाजित करते हैं, तो इष्ट प्रथमपद प्राप्त होता है ॥ ३१७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यह देखा जाता है कि किसी समान्तर श्रेढि का योग, प्रथमपद, प्रचय और पदों की संख्या में
मिलाये जाने पर, ५० होता है । हे गणक, शीघ्रही प्रथमपद, प्रचय, पदों की संख्या और श्रेढि के
योग को बतलाओ ॥ ३१८ ॥
सङ्कलित गति * तथा ध्रुव गति से गमन करने वाले दो व्यक्तियों (को एक साथ रवाना
होने पर एक जगह फिर से मिलने) के लिये समय की समान सीमा निकालने के लिये नियम —
अपरिवर्तनशील गति को समान्तर श्रेढि वाली गतियों के प्रथम पद द्वारा ह्रासित करते हैं, और
तब प्रचय की अर्द्ध राशि द्वारा भाजित करते हैं । इस परिणामी राशि में जब १ जोड़ते हैं, तब मिलने
( ३१७ ) अध्याय दो की गाथाएँ ८० – ८२ तथा उनके नोट देखिये ।
- समान्तर श्रेढि के पदों के रूप में प्ररूपित उत्तरोत्तर गतियों रूप गति ।
१७४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३१९-
द्विगुणो मार्गस्तद्गतियोगहृतो योगकालः स्यात् ॥ ३१९ ॥
अत्रोद्देशकः
कश्चिन्नरः प्रयाति त्रिभिरादा उत्तरैस्तथाष्टाभिः ।
नियतगतिरेकविंशतिरनयोः कः प्राप्तकालः स्यात् ॥ ३२० ॥
अपरार्धोदाहरणम् ।
षड् योजनानि कश्चित्पुरुषस्त्वपरः प्रयाति च त्रीणि ।
उभयोरभिमुखगत्योरष्टोत्तरशतकयोजनं गम्यम् ।
प्रत्येकं च तयोः स्यात्कालः किं गणक कथय मे शीघ्रम् ॥ ३२१½ ॥
संकलितसमागमकालयोजनानयनसूत्रम् —
उभयोराद्योः शेषश्चयशेषहृतो द्विसंगुणः सैकः ।
युगपत्प्रयाणयोः स्यान्मार्गे तु समागमः कालः ॥ ३२२½ ॥
का इष्ट समय प्राप्त होता है । ( जब दो मनुष्य निश्चित गति से विरुद्ध दिशाओं में चल रहे हों, तब
उनमें से किसी एक के द्वारा तय की गई औसत दूरी की दुगुनी राशि पूरी तय की जानेवाली यात्रा
होती है । जब यह उनकी गतियों के योग द्वारा भाजित की जाती है, तब उनके मिलने का समय प्राप्त
होता है । ) ॥ ३१९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई मनुष्य आरम्भ में ३ की गति से और उत्तरोत्तर ८ प्रचय द्वारा नियमित रूप से बढ़ाने
वाली गति से जाता है । दूसरे मनुष्य की निश्चित गति २१ है । यदि वे एक ही दिशा में, एक समय,
उसी स्थान से प्रस्थान करें, तो उनके मिलने का समय क्या होगा ? ॥ ३२० ॥
( ऊपर की गाथा के ) उत्तरार्द्ध के लिये उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य ६ योजन की गति से और दूसरा ३ योजन की गति से यात्रा करता है । उनमें से
किसी एक के द्वारा तय की गई औसत दूरी १०८ योजन है । हे गणक, उनके मिलने का समय
निकालो ॥ ३२१-३२१½ ॥
यदि दो व्यक्ति एक ही स्थान से, एक ही समय तथा विभिन्न संकलित गतियों से प्रस्थान करें,
तो उनके मिलने का समय और तय की गई दूरी निकालने के लिये नियम—
उक्त दो प्रथम पदों का अंतर जब उक्त दो प्रचयों के अंतर से भाजित होकर और तब २ से
गुणित होकर १ द्वारा बढ़ाया जाय, तो युगपत् यात्रा करने वाले व्यक्तियों के मिलने का समय उत्पन्न
होता है ॥ ३२२½ ॥
( ३१९ ) बीजीय रूप से, ( व - अ ) ÷ ब/२ + १ = स, जहाँ व निश्चल वेग है, ब प्रचय है,
और स समय है ।
( ३२१½ ) बीजीय रूप से, न = (अ ~ अ₁) / (ब - ब₁) × २ + १ .
-६. ३२६½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७५
अत्रोद्देशकः
चत्वार्याद्यष्टोत्तरमेको गच्छत्यथो द्वितीयो ना ।
द्वौ प्रचयश्च दशादिः समागमे कस्तयोः कालः ॥ ३२३½ ॥
वृद्ध्युत्तरहीनोत्तरयोः समागमकालानयनसूत्रम्—
शेषञ्चाद्योरुभयोश्चययुतदलभक्तरूपयुतः ।
युगपत्प्रयाणकृतयोर्मार्गे संयोगकालः स्यात् ॥ ३२४½ ॥
अत्रोद्देशकः ।
पञ्चाद्यष्टोत्तरतः प्रथमो नाथ द्वितीयनरः ।
आदिः पञ्चान्नव प्रचयो हीनोऽष्ट योगकालः कः ॥ ३२५½ ॥
शीघ्रगतिमन्दगत्योः समागमकालानयनसूत्रम्—
मन्दगतिशीघ्रगत्योरेकाशागमनमत्र गम्यं यत् ।
तद्गत्यन्तरभक्तं लब्धदिनैस्तैः प्रयाति शीघ्रोऽल्पम् ॥३२६½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक व्यक्ति ४ से आरम्भ होने वाली और उत्तरोत्तर प्रचय ८ द्वारा बढ़ने वाली गतियों से यात्रा
करता है । दूसरा व्यक्ति १० से आरम्भ होने वाली और उत्तरोत्तर २ प्रचय द्वारा बढ़ने वाली गतियों
से यात्रा करता है । उनके मिलने का समय क्या है ? ॥ ३२३½ ॥
एक ही स्थान से रवाना होने वाले और एक ही दिशा में समान्तर श्रेढि में बढ़नेवाली गतियों
से यात्रा करने वाले दो व्यक्तियों के मिलने का समय निकालने के लिए नियम, जब कि प्रथम दशा में
प्रचय धनात्मक है, और दूसरी दशा में ऋणात्मक है :—
उक्त दो प्रथम पदों के अंतर को उक्त दो दिये गये प्रचयों का प्ररूपण करनेवाली संख्याओं के
योग की अर्द्ध राशि द्वारा भाजित करने के पश्चात् प्राप्त फल में १ जोड़ा जाता है । यह उन दो
यात्रियों के मिलने का समय होता है ॥३२४½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम व्यक्ति ५ से आरम्भ होने वाली और उत्तरोत्तर प्रचय ८ द्वारा बढ़नेवाली गतियों से यात्रा
करता है । दूसरे व्यक्ति की आरम्भिक गति ४५ है और प्रचय ऋण ८ है । उनके मिलने का समय
क्या है ? ॥३२५½॥
भिन्न समयों पर रवाना होनेवाले और क्रमशः तीव्र और मंद गति से एक ही दिशा में चलनेवाले
दो मनुष्यों के मिलने का समय निकालने के लिए नियम—
मंदगति और तीव्रगति वाले दोनों एक ही दिशा में गमनशील हैं । तय की जानेवाली दूरी को
यहाँ उन दो गतियों के अंतर द्वारा भाजित किया जाता है । इस भजनफल द्वारा प्ररूपित दिनों में, तीव्र
गतिवाला मंदगति वाले की ओर जाता है ॥३२६½॥
( ३२४½ ) इसकी तुलना ३१२½ वीं गाथा में दिये गये नियम से करो ।
१७६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३२७½-
अत्रोद्देशकः
नवयोजनानि कश्चित्प्रयाति योजनशतं गतं तेन ।
प्रतिदूतो व्रजति पुनस्त्रयोदशाप्नोति कैर्दिवसैः ॥३२७½॥
विषमबाणैस्तूणीरबाणपरिधिकरणसूत्रम्—
परिणाहस्त्रिभिरधिको दलितो वर्गीकृतस्त्रिभिर्भक्तः ।
सैकः शरास्तु परिधेरानयने तत्र विपरीतम् ॥३२८½॥
अत्रोद्देशकः
नव परिधिस्तु शराणां संख्या न ज्ञायते पुनस्तेषाम् ।
त्र्युत्तरदशबाणास्तत्परिणाहशरांश्च कथय मे गणक ॥३२९½॥
श्रेढीबद्धे इष्टकानयनसूत्रम्—
तरवर्गो रूपोनस्त्रिभिर्विभक्तस्तरेण संगुणितः ।
तरसंकलिते स्वेष्टप्रताडिते मिश्रतः सारम् ॥३३०½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई व्यक्ति ९ योजन प्रतिदिन की गति से यात्रा करता है । उसके द्वारा १०० योजन की दूरी
पहिले ही तय की जा चुकी है । एक संदेशवाहक उसके पीछे १३ योजन प्रति दिन की गति से भेजा
गया । यह कितने दिनों में उससे जाकर मिलेगा ? ॥३२७½॥
तरकश में भरे हुए ज्ञात अयुग्म संख्या के शरों की सहायता से तरकश के शरों की परिध्यान-
संख्या निकालने के लिये ( तथा विलोम क्रमेण ) नियम—
परिध्यान शरों की संख्या को ३ द्वारा बढ़ाकर आधा किया जाता है। इसे वर्गित किया जाता है, और
तब ३ द्वारा भाजित किया जाता है । इस परिणामी राशि में १ जोड़ने पर तरकश के शरों की संख्या प्राप्त
होती है। जब परिध्यान शरों की संख्या निकालनी होती है, तो विपरीत क्रिया करनी पड़ती है ॥३२८½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शरों की परिध्यान संख्या ९ है । उनकी कुल संख्या अज्ञात है । वह कौन सी है ? तरकश में
कुल शरों की संख्या १३ है । हे गणितज्ञ, परिध्यान शरों की संख्या बतलाओ ॥३२९½॥
किसी भवन की श्रेणीबद्ध ( एक के ऊपर दूसरी ) इष्टकाओं ( ईंटों ) की संख्या निकालने के
लिये नियम—
सतहों की संख्या के वर्ग को १ द्वारा ह्रासित कर ३ द्वारा भाजित किया जाता है, और तब
सतहों की संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि में वह गुणनफल जोड़ते हैं, जो सबसे
ऊपर की सतह की ईंटों को प्ररूपित करनेवाली ( मन से चुनी हुई ) संख्या और एक से आरंभ होकर
दी गई सतहों की संख्या तक की प्राकृत संख्याओं के योग का गुणन करने से प्राप्त होता है । प्राप्तफल
इष्ट उत्तर होता है ॥३३०½॥
- ( ३३०½ ) बीजीय रूप से- $\frac{न^२ - १}{३} \times न + अ \times \frac{न (न + १)}{२}$, यह, बनावट की कुल ईंटों की
संख्या है; जहाँ ‘न’ सतहों की संख्या है, और ‘अ’ सर्वोच्च सतह में ईंटों की मन से चुनी हुई संख्या है ।
- ६. ३३३½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७७
अत्रोद्देशकः
पञ्चस्तरैकेनाग्रं व्यवघटिता गणितविन्मिश्रे । समचतुरश्रश्रेढी कतीष्टकाः स्युर्ममाचक्ष्व ॥३३१½॥
नन्द्यावर्ताकारं चतुस्तराः षष्टिसमघटिताः । सर्वेष्टकाः कति स्युः श्रेढीबद्धं ममाचक्ष्व ॥३३२½॥
छन्दः शास्त्रोक्तषट्प्रत्ययानां सूत्राणि—
समदलविषमखरूपं द्विगुणं वर्गीकृतं च पदसंख्या ।
संख्या विषमा सैका दलतो गुरुरेव समदलतः ॥३३३½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ सतहवाली एक वर्गाकार बनावट तैयार की गई है । सबसे ऊपर की सतह में केवल १ ईंट
है । हे प्रश्न की गणना जानने वाले मित्र, इस बनावट में कुल कितनी ईंटें हैं ? ॥३३१½॥ नन्द्यावर्त के
आकार की एक बनावट उत्तरोत्तर ईंटों की सतहों से तैयार की गई है । एक पंक्ति में सबसे ऊपर की
ईंटों का संख्यात्मक मान ६० है, जिसके द्वारा ४ सतहें सम्मितीय बनाई गई हैं । बतलाओ इसमें कुल
कितनी ईंटें लगाई गई हैं ? ॥३३२½॥
छन्द ( prosody ) शास्त्रोक्त छः प्रत्ययों को जानने के लिये नियम—
दिये गये शब्दांशिक छन्द में शब्दांशों ( अक्षरों ) अथवा पदों की युग्म और अयुग्म संख्या
को अलग स्तम्भ में क्रमशः ० और १ द्वारा चिन्हित किया जाता है । ( चिन्हित करने की विधि इसी
अध्याय के ३११½ वें सूत्र में देखिये ।) वह इस प्रकार है : युग्ममान को आधा किया जाता है, और
अयुग्म मान में से १ घटाया जाता है । इस विधि को तब तक जारी रखा जाता है, जब तक कि अंततो-
गत्वा शून्य प्राप्त नहीं होता । इस प्रकार प्राप्त अंकों की शृङ्खला में अंकों को दुगुना कर दिया जाता है,
और तब शृङ्खला की तली से शिखर तक की संतत गुणन क्रिया में, वे अंक, जिनके ऊपर शून्य आता
है, वर्गित कर दिये जाते हैं । इस संतत गुणन का परिणामी गुणनफल छन्द के विभिन्न सम्भव श्लोकों
की संख्या होता है ॥३३३½॥ इस प्रकार प्राप्त सभी प्रकार के श्लोकों में लघु और गुरु
किसी भी सतह की लम्बाई अथवा चौड़ाई पर ईंटो की संख्या, अग्रिम निम्न ( नीची ) सतह की ईंटों से
१ कम होती है ।
( ३३२½ ) गाथा में निर्दिष्ट नन्द्यावर्त आकृति यह है— 卐
( ३३३½-३३६½ ) गुरु और लघु शब्दांशों ( syllables ) के भिन्न-भिन्न विन्यास के संवादी
कई विभेद उत्पन्न होते हैं, क्योंकि श्लोक ( stanza ) के एक चौथाई भाग को बनानेवाले पद ( line )
में पाया जानेवाला प्रत्येक शब्दांश या तो लघु अथवा गुरु हो सकता है । इन विभेदों के विन्यासों के
लिये कोई निश्चित क्रम उपयोग में लाया जाता है । यहाँ दिये गये नियम हमें निम्नलिखित को निकालने
में सहायक होते हैं, ( १ ) निर्दिष्ट शब्दांशों की संख्या वाले छन्द में सम्भव विभेदों की संख्या, ( २ )
इन प्रकारों में शब्दांशों के विन्यास की विधि, ( ३ ) स्वक्रमसूचक स्थिति द्वारा निर्दिष्ट किसी विभेद में
शब्दांशों का विन्यास, ( ४ ) शब्दांशों के निर्दिष्ट विन्यास की क्रमसूचक स्थिति, ( ५ ) निर्दिष्ट संख्या •
के गुरु और लघु शब्दांशों वाले विभेदों की संख्या, और ( ६ ) किसी विशेष छन्द के विभेदों का प्रदर्शन
करने के लिये उदग्र ( लम्ब रूप ) जगह का परिमाण ।
ग० सा० सं०-२३
१७८ ] . गणितसारसंग्रहः [ ६. ३३४½-
स्याल्लघुरेवं क्रमशः प्रस्तारोऽयं विनिर्दिष्टः ।
नष्टाङ्कार्धे लघुरथ तस्सैकदले गुरुः पुनः पुनः स्थानम् ॥३३४½॥
अक्षरों ( syllables ) के विन्यास को इस प्रकार निकालते हैं—
१ से आरम्भ होनेवाली तथा दिये गये छन्दों में श्लोकों की महत्तम सम्भव संख्या के माप
में अंत होनेवाली प्राकृत संख्याएँ लिखी जाती हैं। प्रत्येक अयुग्म संख्या में १ जोड़ा जाता है, और तब
उसे आधा किया जाता है। जब यह क्रिया की जाती है, तब गुरु अक्षर (syllable) निश्चित पूर्वक सूचित
होता है। जहाँ संख्या युग्म होती है वह तत्काल ही आधी कर दी जाती है, जिससे वह लघु प्रत्यय
( syllable ) को सूचित करती है। इस प्रकार, दशा के अनुसार (उसी समय संवादी गुरु और लघु
श्लोक ३३७½ में दिये गये प्रश्नों को निम्नलिखित रूप में हल करने पर ये नियम स्पष्ट हो जावेंगे—
( १ ) छन्द में ३ शब्दांश होते हैं; अब हम इस प्रकार आगे बढ़ते हैं—
३ - १ १ दाहिने हाथ की श्रृंखला के अङ्कों को २ द्वारा गुणित करने पर हमें २
२।२ ० ० प्राप्त
१ - १ १ २
० होता है। अध्याय २ के ९४ वें श्लोक ( गाथा ) की टिप्पणी में समझाये
अनुसार गुणन और वर्ग करने की विधि द्वारा हमें ८ प्राप्त होता है। यही
विभेदों की संख्या है।
( २ ) प्रत्येक विभेद में शब्दांशों के विन्यास की विधि इस प्रकार प्राप्त होती है—
प्रथम प्रकार : १ अयुग्म होने के कारण गुरु शब्दांश है; इसलिये प्रथम शब्दांश गुरु है। इस १ में
( विभेद ) १ जोड़ो, और योग को २ द्वारा भाजित करो। भजनफल अयुग्म है, और दूसरे गुरु
शब्दांश को दर्शाता है। फिर से, इस भजनफल १ में १ जोड़ते हैं, और योग को २
द्वारा भाजित करते हैं; परिणाम फिर से अयुग्म होता है, और तीसरे गुरु शब्दांश
को दर्शाता है। इस प्रकार, प्रथम प्रकार में तीन गुरु शब्दांश होते हैं, जो इस प्रकार
दर्शाये जाते हैं ऽ ऽ ऽ
द्वितीय प्रकार : २ युग्म होने के कारण लघु शब्दांश सूचित करता है। जब इस २ को २ द्वारा
( विभेद ) भाजित करते हैं, तो भजनफल १ होता है जो अयुग्म होने के कारण गुरु शब्दांश को
सूचित करता है। इस १ में १ जोड़ो, और योग को २ द्वारा भाजित करो; भजनफल
अयुग्म होने के कारण गुरु शब्दांश को सूचित करता है। इस प्रकार, हमें यह
प्राप्त होता है । ऽ ऽ
इसी प्रकार अन्य विभेदों को प्राप्त करते हैं।
( ३ ) उदाहरण के लिये, पाँचवाँ प्रकार ( विभेद ) उपर की तरह प्राप्त किया जा सकता है।
( ४ ) उदाहरण के लिये, । ऽ । प्रकार ( विभेद ) की क्रमसूचक स्थिति निकालने के लिये हम
यह रीति अपनाते हैं—
। ऽ ।
१ २ ४
इन शब्दांशों के नीचे, जिसकी साधारण निष्पत्ति २ है और प्रथमपद १ है ऐसी गुणोत्तर श्रेढि
लिखो। लघु शब्दांशों के नीचे लिखे अंक ४ और १ जोड़ो, और योग को १ द्वारा बढ़ाओ। हमें ६ प्राप्त
[- ६. ३३६½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७९
रूपाद्द्विगुणोत्तरतस्तूद्दिष्टे लाङ्कसंयुतिः सैका ।
एकाद्येकोत्तरतः पदमूर्ध्वाधर्यतः क्रमोत्क्रमशः ॥३३५½॥
स्थाप्य प्रतिलोमघ्नं प्रतिलोमघ्नेन भाजितं सारम् ।
स्याल्लघुगुरुकियेयं संख्या द्विगुणैकवर्जिता साध्वा ॥३३६½॥
अक्षर देखते हुए ), १ जोड़ने अथवा नहीं जोड़ने के साथ आधी करने की क्रिया, नियमित रूप से, तब
तक जारी रखना चाहिये, जब तक कि, प्रत्येक दशा में छन्द के प्रत्ययों की यथार्थ संख्या प्राप्त नहीं
हो जाती ।
यदि स्वाभाविक क्रम में किसी प्रकार के पद का प्ररूपण करनेवाली संख्या, ( जहाँ अक्षरों का
विन्यास ज्ञात करना होता है ) युग्म हो तो वह आधी कर दी जाती है और लघु अक्षर को सूचित
करती है । यदि वह अयुग्म हो, तो उसमें १ जोड़ा जाता है और तब उसे आधा किया जाता है : और
यह गुरु अक्षर दर्शाती है । इस प्रकार गुरु और लघु अक्षरों को उनकी क्रमवार स्थितिमें बारबार रखना
पड़ता है जब तक कि पद में अक्षरों की महत्तम संख्या प्राप्त नहीं हो जाती । यह, श्लोक ( stanza )
के इष्ट प्रकार में, गुरु और लघु अक्षरों के विन्यास को देता है ॥३३४½॥
जहाँ किसी विशेष प्रकार का श्लोक दिया होने पर उसकी निर्दिष्ट स्थिति ( छन्द में सम्भव
प्रकारों के श्लोकों में से ) निकालना हो, वहाँ एक से आरम्भ होनेवाली और २ साधारण निष्पत्ति
वाली गुणोत्तर श्रेढि के पदों ( terms ) को लिख लिया जाता है, ( यहाँ श्रेढि के पदों की संख्या,
दिये गये छन्दों में अक्षरों की संख्या के तुल्य होती है ) । इन पदों ( terms ) के ऊपर संवादी गुरु
या लघु अक्षर लिख लिये जाते हैं । तब लघु अक्षरों के ठीक नीचे की स्थिति वाले सभी पद
( terms ) जोड़े जाते हैं । इस प्रकार प्राप्त योग एक द्वारा बढ़ाया जाता है । यह इष्ट निर्दिष्ट
क्रमसंख्या होती है ।
१ से आरम्भ होने वाली ( और छन्द में दिये गये अक्षरों की संख्या तक जाने वाली ) प्राकृत
संख्याएँ, नियमित क्रम और व्युत्क्रम में, दो पंक्तियों में, एक दूसरे के नीचे लिख ली जाती हैं । पंक्ति
की संख्याएँ १, २, ३ ( अथवा एक ही बार में इनसे अधिक ) द्वारा दाएँ से बाएँ ओर गुणित की
जाती हैं । इस प्रकार प्राप्त ऊपर की पंक्ति सम्बन्धी गुणनफल नीचे की पंक्ति सम्बन्धी संवादी गुणन-
फलों द्वारा भाजित किये जाते हैं । तब प्राप्त भजनफल, कविता ( verse ) में १, २, ३ या इनसे
अधिक, छोटे या बड़े अक्षरों वाले ( दिये गये छन्द में ) श्लोकों ( stanzas ) के प्रकारों की संख्या
की प्ररूपणा करता है । इसे ही निकालना इष्ट होता है ।
दिये गये छन्द ( metre ) में श्लोकों के विभेदों की सम्भव संख्या को दो द्वारा गुणित
कर एक द्वारा ह्रासित किया जाता है । यह फल अध्वान का माप देता है ।
यहाँ, छन्द के प्रत्येक दो उत्तरोत्तर विभेदों ( प्रकारों ) के बीच श्लोक ( stanzas ) के तुल्य
अंतराल ( interval ) का होना माना जाता है ॥३३५½-३३६½॥
होता है । इसलिये ऐसा कहते हैं कि त्रि-शब्दांशिक छन्द में यह छठवाँ प्रकार ( विभेद ) है ।
( ५ ) मानलो प्रश्न यह है : २ छोटे शब्दांशों वाले विभेद कितने हैं ?
प्राकृत संख्याओं को नियमित और विलोम क्रम में एक दूसरे के नीचे इस प्रकार रखो : $\begin{matrix} १ & २ & ३
३ & २ & १ \end{matrix}$
दाहिने ओर से बाईं ओर को, ऊपर से और नीचे से दो पद ( terms ) लेकर, हम पूर्ववर्ती गुणनफल
१८० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३३७½-
अत्रोद्देशकः
संख्यां प्रस्तारविधिं नष्टोद्दिष्टे लगक्रियाध्वानौ ।
षट्प्रत्ययांश्च शीघ्रं त्र्यक्षरवृत्तस्य मे कथय ॥३३७½॥
इति मिश्रकव्यवहारे श्रेढीबद्धसङ्कलितं समाप्तम् ।
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतो मिश्रकगणितं नाम पञ्चमव्यवहारः समाप्तः ॥
—-❖-—
उदाहरणार्थ प्रश्न
३ अक्षरों (syllables) वाले छन्द के सम्बन्ध में ६ प्रत्ययों को बतलाओ—.
(१) छन्द के सम्भव श्लोकों (stanzas) की महत्तम संख्या, (२) उन श्लोकों में
अक्षरों के विन्यास का क्रम, (३) किसी दिये गये प्रकार के श्लोकों में अक्षरों (शब्दांशों) का
विन्यास, जहाँ छन्द में सम्भव प्रकारों की क्रमसूचक स्थिति ज्ञात है, (४) दिये गये श्लोक की
क्रमसूचक स्थिति, (५) किसी दी गईं लघु या गुरु अक्षरों (शब्दांशों) की संख्यावाले दिये गये
छन्द (metre) में श्लोकों की संख्या, और (६) अध्वान नामक राशि ॥३३७½॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में श्रेढिबद्ध संकलित नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणितशास्त्र में मिश्रक नामक पञ्चम
व्यवहार समाप्त हुआ ।
—-❖-—
को उत्तरवर्ती गुणनफल द्वारा भाजित करते हैं । भजनफल ३ इष्ट उत्तर है ।
(६) ऐसा कहा गया है कि छन्द के किसी भी प्रकार के गुरु और लघु शब्दांशों के निरूपण
करनेवाले प्रतीक, एक अंगुल उदग्र (vertical) जगह ले लेते हैं, और कोई भी दो विभेदों के बीच
का अंतराल (जगह) भी एक अंगुल होना चाहिये । इसलिये, इस छन्द के ८ प्रकारों (विभेदों) के
लिये इष्ट उदग्र (vertical) जगह का परिमाण २ x ८ - १ अथवा १५ अंगुल होता है ।
—-❖-—
७. क्षेत्रगणित व्यवहारः
सिद्धेभ्यो निश्चितार्थेभ्यो वरिष्टेभ्यः कृतादरः । अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं नमस्कुर्वे पुनः पुनः ॥ १ ॥
इतः परं क्षेत्रगणितं नाम षष्ठगणितमुदाहरिष्यामः । तद्यथा--
क्षेत्रं जिनप्रणीतं फलाश्रयाद्व्यावहारिकं सूक्ष्ममिति ।
भेदाद् द्विधा विचिन्त्य व्यवहारं स्पष्टमेतदभिधास्ये ॥ २ ॥
त्रिभुजचतुर्भुजवृत्तक्षेत्राणि स्वस्वभेदभिन्नानि । गणितार्णवपारगतैराचार्यैः सम्यगुक्तानि ॥ ३ ॥
त्रिभुजं त्रिधा विभिन्नं चतुर्भुजं पञ्चधाष्टधा वृत्तम् । अवशेषक्षेत्राणि ह्येतेषां भेदभिन्नानि ॥ ४ ॥
त्रिभुजं तु समं द्विसमं विषमं चतुरश्रमपि समं भवति ।
द्विद्विसमं द्विसमं स्यात्त्रिसमं विषमं बुधाः प्राहुः ॥ ५ ॥
समवृत्तमर्धवृत्तं चायत्तवृत्तं च कम्बुकावृत्तम् । निम्नोन्नतं च वृत्तं बहिरन्तश्चक्रवालवृत्तं च ॥ ६ ॥
७. क्षेत्र-गणित व्यवहार ( क्षेत्रफल के माप सम्बन्धी गणना )
अपने इष्ट अर्थ की सिद्धि के लिये मैं मन, वचन, काय से कृतकृत्य और सर्वोत्कृष्ट सिद्धों को
वारंवार सादर नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
इसके पश्चात् हम क्षेत्र गणित नामक विषय की छः प्रकार की गणना की व्याख्या करेंगे जो
निम्नलिखित है—
जिन भगवान् ने क्षेत्रफल का दो प्रकार का माप प्रणीत किया है, जो फल के स्वभाव पर
आधारित है; अर्थात् एक वह जो व्यावहारिक प्रयोजनों के लिये अनुमानतः लिया जाता है, और दूसरा
वह जो सूक्ष्म रूप से शुद्ध होता है । इसे विचार में लेकर मैं इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाऊँगा
॥ २ ॥ गणित रूपी समुद्र के पारगामी आचार्यों ने सम्यक् ( ठीक ) रूप से विविध प्रकार के क्षेत्रफलों
के विषय में कहा है । उन क्षेत्रफलों में त्रिभुज, चतुर्भुज और वृत्त ( वक्ररेखीय ) क्षेत्रों को इन्हीं
क्रमवार प्रकारों में वर्णित किया है ॥ ३ ॥ त्रिभुज क्षेत्र को तीन प्रकार में, चतुर्भुज को पाँच प्रकार में,
और वृत्त को आठ प्रकार में विभाजित किया गया है । शेष प्रकार के क्षेत्र वास्तव में इन्हीं विभिन्न
प्रकारों के क्षेत्रों के विभिन्न भेद हैं ॥ ४ ॥ बुद्धिमान लोग कहते हैं कि त्रिभुज क्षेत्र, समत्रिभुज,
द्विसम त्रिभुज ( समद्विबाहु त्रिभुज ) और विषम त्रिभुज हो सकता है, और चतुर्भुज क्षेत्र भी सम-
चतुरश्र ( वर्ग ), द्विद्विसमचतुरश्र ( आयत ), द्विसमचतुरश्र ( समलम्ब चतुर्भुज जिसकी दो असमा-
नान्तर भुजायें बराबर नापकी हों ), त्रिसमचतुरश्र ( समलम्ब चतुर्भुज, जिसकी तीन भुजायें बराबर
नापकी हों ), विषम चतुरश्र ( साधारण चतुर्भुज क्षेत्र ) हो सकता है ॥ ५ ॥ वक्रसरल क्षेत्र, समवृत्त
( वृत्त ), अर्धवृत्त, आयतवृत्त ( ऊनेन्द्र अथवा अंडाकार क्षेत्र ), कम्बुकावृत्त ( शंखाकार क्षेत्र ),
निम्नावृत्त ( नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ), उन्नतावृत्त ( उन्नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ), बहिश्चक्रवाल वृत्त ( बाह्य
स्थित कङ्कण ), एवं अंतश्चक्रवाल वृत्त ( भीतर स्थित कङ्कण ) हो सकता है ॥ ६ ॥
(५-६) इन गाथाओं में कथित विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ अगले पृष्ठ पर दर्शाई गई हैं—
१८२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ७ -
व्यावहारिकगणितम्
त्रिभुजचतुर्भुजक्षेत्रफलानयनसूत्रम् —
त्रिभुजचतुर्भुजबाहुप्रतिबाहुसमासदलहृतं गणितम् ।
नेमेर्भुजयुत्यर्धं व्यासगुणं तत्फलार्धमिह बालेन्दोः ॥ ७ ॥
व्यावहारिक गणित ( अनुमानतः मापसम्बन्धी गणना )
त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्रफल ( अनुमानतः ) निकालने के लिये नियम —
सम्मुख भुजाओं के योगों की अर्द्धराशियों का गुणनफल, त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्र-
फल का माप होता है । कङ्कण सदृश आकृति के चक्र की किनार ( rim ) का क्षेत्रफल भीतर और
( १ ) ( २ ) ( ३ )
सम त्रिभुज द्विसम त्रिभुज विषम त्रिभुज
( ४ ) ( ५ ) ( ६ )
समचतुरश्र द्वि द्वि समचतुरश्र द्विसमचतुरश्र
( ७ ) ( ८ ) ( ९ )
त्रिसम चतुरश्र विषम चतुरश्र समवृत्त
( १० ) ( ११ ) ( १२ )
अर्द्धवृत्त आयत वृत्त ( ऊनेन्द्र )
कम्बुकावृत्त ( शंख के आकार की आकृति )
-७.८ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १८३
अत्रोद्देशकः
त्रिभुजक्षेत्रस्याष्टौ बाहुप्रतिबाहुभूमयो दण्डाः । तद्व्यावहारिकफलं गणयित्वाचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥८॥
बाहर की परिधियों के योग की अर्द्धराशि को कङ्कण की चौड़ाई से गुणित करने पर प्राप्त होता है।
इस फल का यहाँ बालचन्द्रमा सदृश आकृति का क्षेत्रफल होता है ॥ ७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
त्रिभुज के सम्बन्ध में, भुजा, सम्मुख भुजा, और आधार का माप ८ दंड है; मुझे शीघ्र ही
बतलाओ कि इसका व्यावहारिक क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ८ ॥ दो बराबर भुजाओं वाले त्रिभुज के सम्बन्ध
( १३ ) ( १४ )
निम्नवृत्त ( नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ) उन्नत वृत्त ( उन्नतोदर वृत्तीय क्षेत्र )
( १५ ) ( १६ )
बहिश्चक्रवाल वृत्त ( बाहर स्थिति कङ्कण )
अंतश्चक्रवालवृत्त ( भीतर स्थित कङ्कण )
चतुर्भुज क्षेत्रों के क्षेत्रफल और अन्य मापों के दिये गये नियमों पर विचार करने पर ज्ञात होगा
कि यहाँ कहे गये चतुर्भुज क्षेत्र चक्रीय ( वृत्त में अन्तर्लिखित ) हैं । इसलिये समचतुरश्र यहाँ वर्ग है,
द्वि-द्विसमचतुरश्र आयत है, और द्विसमचतुरश्र तथा त्रिसमचतुरश्र की ऊपरी भुजाएँ आधार के समा-
नान्तर हैं ।
( ७ ) यहाँ त्रिभुज को ऐसा चतुर्भुज माना गया है, जिसके आधार की सम्मुख भुजा इतनी
छोटी होती है कि वह उपेक्षणीय होती है । इस दशा में त्रिभुज की बाजू की दो भुजाएँ, सम्मुख भुजाएँ
बन जाती हैं, और ऊपरी भुजा मान में नहीं के बराबर ली जाती है । इसलिये नियम में त्रिभुजीय क्षेत्र
के सम्बन्ध में भी सम्मुख भुजाओं का उल्लेख किया गया है; त्रिभुज दो भुजाओं के योग की अर्द्ध-
राशि समस्त दशाओं में ऊँचाई से बड़ी होती है, इसलिये इस नियम के अनुसार प्राप्त क्षेत्रफल किसी भी
उदाहरण में सूक्ष्म रूप से ठीक नहीं हो सकता ।
चतुर्भुज क्षेत्रों के सम्बन्ध में इस नियम के अनुसार प्राप्त क्षेत्रफल वर्ग और आयत के विषय में
ठीक हो सकता है, परन्तु अन्य दशाओं में केवल स्थूलरूपेण शुद्ध होता है । जिनका एक ही केन्द्र होता
है, ऐसे दो वृत्तों की परिधियों के बीच का क्षेत्र नेमिक्षेत्र कहलाता है । यहाँ दिये गये नियम के अनुसार
नेमिक्षेत्र के व्यावहारिक क्षेत्रफल का माप शुद्ध माप होता है । बालेन्दु जैसी आकृति का इस नियमा-
नुसार प्राप्त क्षेत्रफल केवल अनुमानित ही होता है ।
१८४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७.९-
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रस्यायामः सप्तसप्ततिर्दण्डाः । विस्तारो द्वाविंशतिरथ हस्ताभ्यां च संमिश्राः ॥९॥
त्रिभुजक्षेत्रस्य भुजस्त्रयोदश प्रतिभुजस्य पञ्चदश ।
भूमिश्चतुर्दशास्य हि दण्डा विषमस्य किं गणितम् ॥ १० ॥
गजदन्तक्षेत्रस्य च पृष्ठेऽष्टाशीतिरत्र संदृष्टाः । द्वासप्ततिरुदरे तन्मूलेऽपि त्रिंशादिह१ दण्डाः ॥११॥
क्षेत्रस्य दण्डषष्टिर्बाहुप्रतिबाहुकस्य गणयित्वा । समचतुरश्रस्य त्वं कथय सखे गणितफलमाशु ॥१२॥
आयतचतुरश्रस्य व्यायामः सैकषष्टिर्हि दण्डाः । विस्तारो द्वात्रिंशद्व्यवहारं गणितमाचक्ष्व ॥१३॥
दण्डास्तु सप्तषष्टिर्द्विसमचतुर्बाहुकस्य चायामः । व्यासश्चाष्टत्रिंशत् क्षेत्रस्यास्य त्रयस्त्रिंशत् ॥१४॥
क्षेत्रस्याष्टोत्तरशतदण्डा बाहुत्रये मुखे चाष्टौ ।
हस्तैस्त्रिभिर्युतास्तत्त्रिसमचतुर्बाहुकस्य वद गणक ॥ १५ ॥
विषमक्षेत्रस्याष्टत्रिंशद्दण्डाः क्षितिर्मुखे द्वात्रिंशत् ।
पञ्चाशत्प्रति२बाहु षष्टित्वन्यः किमस्य चतुरश्रे ॥ १६ ॥
परिधोदरस्तु दण्डास्त्रिंशत्पृष्ठं शतत्रयं दृष्टम् ।
नवपञ्चगुणो व्यासो नेमिक्षेत्रस्य किं गणितम् ॥ १७ ॥
१. B और M दोनों में त्रिंशतिः पाठ है । छंदकी आवश्यकतानुसार इसे त्रिंशादिह रूप में शुद्ध
कर रखा गया है ।
२. B में “प्रति” के लिये “देक” पाठ है ।
में दो भुजाओं द्वारा प्ररूपित लम्बाई ७७ दंड है, और आधार द्वारा नापी गई चौड़ाई २२ दंड और
२ हस्त है; क्षेत्रफल निकालो ॥ ९ ॥ विषम त्रिभुज के सम्बन्ध में एक भुजा १३ दंड, सम्मुख भुजा
१५ दंड, और आधार १४ दंड है । इस आकृति के क्षेत्रफल का माप क्या है ? ॥ १० ॥ हाथी के दाँत
के मध्य से फाड़े हुए छेद ( section ) की आकृति के बाहरी वक्र की लम्बाई ८८ दंड है, भीतरी
वक्र की लम्बाई ७२ दंड है, और जड़ के पास की मुटाई ३० दंड है; क्षेत्रफल निकालो ॥ ११ ॥
समायत ( वर्ग ) के सम्बन्ध में, जिसकी भुजाओं में से प्रत्येक ६० दंड है, हे मित्र, शीघ्र ही क्षेत्रफल
का परिणामी नाप बतलाओ ॥ १२ ॥ आयत चतुरश्र क्षेत्र के सम्बन्ध में यहाँ लम्बाई ६१ दंड है
और चौड़ाई ३२ दंड है । व्यावहारिक क्षेत्रफल बतलाओ ॥ १३ ॥ दो समान बाहुओं वाले चतुर्भुजों
की प्रत्येक समान भुजा की लम्बाई ६७ दंड है, चौड़ाई ( आधार पर ) ३८ है और ( ऊपर ) ३३
दंड है । क्षेत्रफल का माप बतलाओ ॥ १४ ॥ तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की प्रत्येक
समान भुजा १०८ दंड की है, और शेष ( मुख अथवा ऊपरी ) भुजायें ८ दंड ३ हस्त हैं । हे
गणितज्ञ, इस क्षेत्र के क्षेत्रफल का माप बतलाओ ॥ १५ ॥ विषम चतुर्भुज का आधार ३८ दंड,
ऊपरी मुख-भुजा ३२ दंड, बाजू की एक भुजा ( प्रतिबाहु ) ५० दंड और दूसरी ६० दंड की है । इस
आकृति का क्षेत्रफल क्या है ? ॥ १६ ॥ किसी कंकण में भीतरी वृत्ताकार सीमा ३० दंड की है, बाहरी
वृत्ताकार सीमा ३०० दंड है और कङ्कण की चौड़ाई ४५ है । इस कङ्कण ( नेमि क्षेत्र ) का क्षेत्रफल
निकालो ॥ १७ ॥ बालचाँद सदृश एक आकृति की चौड़ाई २ हस्त है । बाहरी वक्र ६८ हस्त और
( ११ ) इस गाथा में कथित आकृति का आकार बाजू में दी गई आकृति के समान होता है ।
प्रयोजन यह है कि इसे त्रिभुजीय क्षेत्र के समान वर्ता जावे, और तब इसका क्षेत्रफल
त्रिभुजीय क्षेत्रों सम्बन्धी नियम द्वारा निकाला जाय ।
-७. २२ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १८५
हस्तौ द्वौ विष्कम्भः पृष्ठेऽष्टाषष्टिरिह च संदृष्टाः ।
उदरे तु द्वात्रिंशद्बालेन्दोः किं फलं कथय ॥ १८ ॥
वृत्तक्षेत्रफलानयनसूत्रम्—
त्रिगुणीकृतविष्कम्भः परिधिर्व्यासार्धवर्गराशिरयम् ।
त्रिगुणः फलं समेऽर्धे वृत्तेऽर्धं प्राहुराचार्याः ॥ १९ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश वृत्तस्य परिधिः कः फलं च किम् ।
व्यासोऽष्टादश वृत्तार्धे गणितं किं वदाशु मे ॥ २० ॥
आयतवृत्तक्षेत्रफलानयनसूत्रम्—
व्यासार्धयुतो द्विगुणित आयतवृत्तस्य परिधिरायामः ।
विष्कम्भचतुर्भागः परिवेषहतो भवेत्सारम् ॥ २१ ॥
अत्रोद्देशकः
क्षेत्रस्यायतवृत्तस्य विष्कम्भो द्वादशैव तु । आयामस्तत्र षट्त्रिंशत् परिधिः कः फलं च किम् ॥२२॥
भीतरी वक्र ३२ हस्त है । बतलाओ की परिणामी क्षेत्रफल क्या है ? ॥ १८ ॥
वृत्त का व्यावहारिक क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
व्यास को ३ द्वारा गुणित करने से परिधि प्राप्त होती है, और व्यास (विष्कम्भ) की अर्द्ध
राशि के वर्ग को ३ द्वारा गुणित करने से पूर्ण वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त होता है । आचार्य कहते हैं कि
अर्द्धवृत्त का क्षेत्रफल और परिधि का माप इनसे आधा होता है ॥ १९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वृत्त का व्यास १८ है । उसकी परिधि और परिणामी क्षेत्रफल क्या है ? अर्द्धवृत्त का व्यास
१८ है । शीघ्र कहो कि उसके क्षेत्रफल और परिधि क्या हैं ? ॥ २० ॥
आयत वृत्त (ऊनेन्द्र अथवा अंडाकार) आकृति का क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
बड़े व्यास को छोटे व्यास की अर्द्ध राशि द्वारा बढ़ाकर और तब २ द्वारा गुणित करने पर
आयतवृत्त (ऊनेन्द्र) की परिधि का आयाम (लम्बाई) प्राप्त होता है । छोटे व्यास की एक चौथाई
राशि को परिधि द्वारा गुणित करने पर क्षेत्रफल का माप प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ऊनेन्द्र आकृति (elliptical figure) के सम्बन्ध में छोटा व्यास १२ है और बड़ा व्यास
३६ है । परिधि और परिणामी क्षेत्रफल क्या हैं ? ॥ २२ ॥
(१९) परिधि और क्षेत्रफल का माप यहाँ (परिधि / व्यास = π) का मान ३ लेकर दिया गया है ।
(२१) ऊनेन्द्र (आयतवृत्त या अंडाकृति) की परिधि के लिये दिया गया सूत्र स्पष्ट रूप से
कोई भिन्न प्रकार का अनुमान है । ऊनेन्द्र का क्षेत्रफल (π. अ. ब.) होता है, जहाँ अ और ब इस
आयत वृत्त की क्रमशः बड़ी और छोटी अर्धाक्ष (semiaxes) हैं । यदि π का मान ३ लें तब
π. अ. ब = ३ अ. ब होता है । परन्तु इस गाथा में दिये गये सूत्र से क्षेत्रफल का माप
{ (२ अ + २ ब / २) २ } १/४ . २ ब = २ अब + ब² होता है ।
ग० सा० सं०-२४
१८४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. २३-
शङ्खाकारवृत्तस्य फलानयनसूत्रम्—
वदनाधोनो व्यासस्त्रिगुणः परिधिस्तु कम्बुकावृत्ते ।
वलयार्धकृतिर्यंशो मुखार्धवर्गत्विपाद्युतः ॥ २३ ॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश हस्ता मुखविस्तारोऽयमपि च चत्वारः ।
कः परिधिः किं गणितं कथय त्वं कम्बुकावृत्ते ॥ २४ ॥
निम्नोन्नतवृत्तयोः फलानयनसूत्रम्—
परिधेश्च चतुर्थांगो विष्कम्भगुणः स विद्धि गणितफलम् ।
चत्वाले कूर्मनिभे क्षेत्रे निम्नोन्नते तस्मात् ॥ २५ ॥
शंख के आकार की वक्ररेखीय आकृति का परिणामी क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
शंख के आकार के वक्ररेखीय ( curvilinear ) आकृति के सम्बन्ध में, सबसे बड़ी चौड़ाई
को मुख की अर्द्ध राशि द्वारा हासित और ३ द्वारा गुणित करने पर परिमिति ( परिधि ) प्राप्त होती है ।
इस परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग के एक तिहाई भाग को मुख की अर्द्धराशियों के वर्ग की तीन चौथाई
राशि द्वारा हासित करते हैं; इस प्रकार क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
उदाहरणार्थ एक प्रश्न
शंख (कम्बुकावृत्त) की आकृति के सम्बन्ध में चौड़ाई १८ हस्त और मुख ४ हस्त है । उसकी
परिमिति तथा क्षेत्रफल निकालो ॥ २४ ॥
नतोदर और उन्नतोदर वर्तुल तलों के क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
समझो कि परिधि की एक चौथाई राशि को व्यास द्वारा गुणित करने पर परिणामी क्षेत्रफल
प्राप्त होता है । इस प्रकार चत्वाल और कछुवे की पीठ जैसे नतोदर और उन्नतोदर क्षेत्रों का क्षेत्रफल
प्राप्त करना पड़ता है ॥ २५ ॥
( २३ ) यदि अ व्यास हो और म मुख का माप हो, तब ३ ( अ - १/२ म ) परिधि का माप होता
है और { ३ ( अ - १/२ म ) / २ }² × १/३ + ३/४ × ( म / २ )² क्षेत्रफल का माप होता है । दिये हुए वर्णन से
आकृति का आकार स्पष्ट नहीं है । परन्तु परिधि और क्षेत्रफल के लिये दिये गये मानों से वह एक ही
व्यास पर दो और भिन्न-भिन्न व्यास वाले वृत्तों को खींचकर प्राप्त हुई आकृति का आकार माना जा
सकता है, जो ६ वीं गाथा के नोट में १२ वीं आकृति में बतलाया गया है ।
( २५ ) यहाँ निर्दिष्ट क्षेत्रफल गोलीय खंड का ज्ञात होता है । प्रतीक रूप से यह क्षेत्रफल
( प/४ × व ) के बराबर है, जहाँ प छेदीय वृत्त ( किनार ) की परिधि है और व व्यास है । परन्तु इस
प्रकार के गोलीय खंड के तल का क्षेत्रफल ( २ × π × त्र × उ ) होता है, जहाँ π = परिधि / व्यास ,
त्र = केन्द्रीय वृत्त ( किनार ) की त्रिज्या, और उ गोलीय खंड की ऊँचाई है ।
-७. ३० ] क्षेत्रगणितगणव्यवहारः [ १८७
अत्रोद्देशकः
चत्वालक्षेत्रस्य व्यासस्तु भसंख्यकः परिधिः । षट्पञ्चाशद्दृष्टं गणितं तस्यैव किं भवति ॥२६॥
कूर्मनिभस्योन्नतवृत्तस्योदाहरणम् —
विष्कम्भः पञ्चदश दृष्टः परिधिश्च षट्त्रिंशत् ।
कूर्मनिभे क्षेत्रे किं तस्मिन् व्यवहारजं गणितम् ॥ २७ ॥
अन्तश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य बहिश्चक्रवालवृत्तक्षेत्रस्य च व्यवहारफलानयनसूत्रम्—
निर्गमसहितो व्यासस्त्रिगुणो निर्गमगुणो बहिर्गणितम् ।
रहिताधिगमव्यासादभ्यन्तरचक्रवालवृत्तस्य ॥ २८॥
अत्रोद्देशकः
व्यासोऽष्टादश हस्ताः पुनर्बहिर्निर्गतास्त्रयस्तत्र ।
व्यासोऽष्टादश हस्ताश्चान्तः पुनरधिगतास्त्रयः किं स्यात् ॥ २९ ॥
समवृत्तक्षेत्रस्य व्यावहारिकफलं च परिधिप्रमाणं च व्यासप्रमाणं च संयोज्य एतत्संयोग-
संख्यामेव स्वीकृत्य तत्संयोगप्रमाण राशेः सकाशात् पृथक् परिधिव्यासफलानां संख्यानयनसूत्रम्—
गणिते द्वादशगुणिते मिश्रप्रक्षेपकं चतुःषष्टिः । तस्य च मूलं कृत्वा परिधिः प्रक्षेपकप दोनः ॥ ३० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चत्वाल (होम वेदी का अग्निकुण्ड) क्षेत्र के क्षेत्रफल के सम्बन्ध में व्यास २७ है और परिधि
५६ है । इस कुण्ड का क्षेत्रफल निकालो ॥ २६ ॥
- कछुवे की पीठ की तरह उन्नतोदर वर्तुलतल के लिये उदाहरणार्थ प्रश्न
व्यास १५ है और परिधि ३६ है । कछुवे की पीठ की भाँति इस क्षेत्र का व्यावहारिक
क्षेत्रफल निकालो ॥ २७ ॥
भीतरी कङ्कण और बाहरी कङ्कण के क्षेत्रफल का व्यावहारिक मान निकालने के लिये नियम—
भीतरी व्यास को कङ्कणक्षेत्र की चौड़ाई द्वारा बढ़ाकर जब ३ द्वारा गुणित किया जाता है, और
कङ्कणक्षेत्र की चौड़ाई द्वारा गुणित किया जाता है, तब बाहरी कङ्कण का क्षेत्रफल उत्पन्न होता है । इसी
प्रकार भीतरी कङ्कण के क्षेत्रफल को कङ्कण की चौड़ाई द्वारा हासित व्यास द्वारा गुणित करने से
प्राप्त करते हैं ॥ २८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
व्यास १८ हस्त है, और बाहरी कङ्कण क्षेत्र की चौड़ाई ३ है; व्यास १८ हस्त है, और फिर से
भीतरी कङ्कण की चौड़ाई ३ हस्त है । प्रत्येक दशा में कङ्कण का क्षेत्रफल निकालो ॥ २९ ॥
वृत्त आकृति की परिधि, व्यास और क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम, जबकि क्षेत्रफल, परिधि
और व्यास का योग दिया गया हो—
१२ द्वारा गुणित उक्त तीन राशियों के मिश्रित योग में प्रक्षेपित ६४ जोड़ते हैं, और इस योग का
वर्गमूल निकालते हैं । तदुपरांत इस वर्गमूल राशि को प्रक्षेपित ६४ के वर्गमूल द्वारा हासित करने से
परिधि का माप प्राप्त होता है ॥ ३० ॥
(२८) अन्तश्चक्रवाल वृत्तक्षेत्र और बहिश्चक्रवाल वृत्तक्षेत्र के आकार ७ वीं गाथा के नोट में
कथित ने मिक्षेत्र के आकार के समान हैं । इसलिये वह नियम जो इन सब आकृतियों के क्षेत्रफल निकालने
के लिये है, व्यवहार में समान साधित होता है ।
(३०) यह नियम निम्नलिखित बीजीय निरूपण से स्पष्ट हो जावेगा —
१८८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ३१-
अत्रोद्देशकः
परिधिव्यासफलानां मिश्रं षोडशशतं सहस्रयुतं ।
कः परिधिः किं गणितं व्यासः को वा ममाचक्ष्व ॥ ३१ ॥
यवाकारमर्दलाकारपणवाकारवज्राकाराणां क्षेत्राणां व्यावहारिकफलानयनसूत्रम्—
यवमुरजपणवशक्रायुधसंस्थानप्रतिष्ठितानां तु ।
मुखमध्यसमासार्धं त्वायामगुणं फलं भवति ॥ ३२ ॥
अत्रोद्देशकः
यवसंस्थानक्षेत्रस्यायामोऽशीतिरस्य विष्कम्भः । मध्यश्चत्वारिंशत्फलं भवेत्किं ममाचक्ष्व ॥३३॥
आयामोऽशीतिरयं दण्डा मुखमस्य विंशतिर्मध्ये । चत्वारिंशत्क्षेत्रे मृदङ्गसंस्थानके ब्रूहि ॥ ३४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी वृत्त की परिधि, व्यास और क्षेत्रफल का योग १११६ है, उस वृत्त की परिधि, गणना
किया हुआ क्षेत्रफल और व्यास के मापों को प्राप्त करो ॥ ३१ ॥
लम्बाई की ओर से फाड़ने से प्राप्त ( अन्वायाम छेद के ) (१) यवधान्य (२) मर्दल (३) पणव
और (४) वज्र आकार की वस्तुओं के व्यावहारिक क्षेत्रफल निकालने के लिये नियम—
यवधान्य, मुरज, पणव और वज्र के आकार के क्षेत्रफलों के सम्बन्ध में इष्ट माप वह है जो अंत
और मध्य माप के योग की अर्द्धराशि को लम्बाई द्वारा गुणित करने पर प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मृदंग के आकार के क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालो जो लम्बाई में ८० दंड और अंत ( मुख )
में २० तथा मध्य में ४० दंड हो ॥ ३४ ॥ किसी क्षेत्र के सम्बन्ध में जिसका आकार पणव समान
मानलो प वृत्त की परिधि है । चूँकि π का मान ३ लिया गया है, इसलिये व्यास = प / ३
और ३ · (प² / ३६) वृत्त का क्षेत्रफल है । यदि परिधि, व्यास और वृत्त के क्षेत्रफल, इन तीनों, का मिश्रित
योग म हो, तो नियम में दिये गया सूत्र प = √(१२ म + ६४) - √६४ को समीकरण
प + प / ३ + ३ · (प² / ३६) = म द्वारा सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं ।
( ३२ ) मुरज का अर्थ मर्दल तथा मृदंग भी होता है । गाथा में कथित विभिन्न आकृतियों के
आकार निम्नलिखित हैं—
यवाकार क्षेत्र मुरजाकार क्षेत्र पणवाकार क्षेत्र वज्राकार क्षेत्र
समस्त आकृतियों के क्षेत्रफल के माप इस गाथा में दिये गये नियमानुसार अनुमानतः ठीक हैं,
क्योंकि नियम इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक सीमावर्ती वक्ररेखा उन सरल रेखाओं के योग के
बराबर है, जो वक्रों के सिरों ( छोरों अथवा अन्तों ) को मध्य बिन्दु के मिलाने से प्राप्त होती हैं ।
-७. ३९ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १८९
पणवाकारक्षेत्रस्यायामः सप्तसप्ततिर्दण्डाः । मुखयोर्विस्तारोऽष्टौ मध्ये दण्डास्तु चत्वारः ॥ ३५ ॥
वज्राकृतेस्तथास्य क्षेत्रस्य षडप्रनवतियायामः ।
मध्ये सूचिर्मुखयोस्त्रयोदश त्र्यंशसंयुता दण्डाः ॥ ३६ ॥
उभयनिषेधादिक्षेत्रफलानयनसूत्रम्—
व्यासात्स्वायामगुणाद्विष्कम्भार्धघ्नदीर्घमुत्सृज्य ।
त्वं वद निषेधमुभयोस्तदर्धपरिहीणमेकस्य ॥ ३७ ॥
अत्रोद्देशकः
आयामः षट्त्रिंशद्विस्तारोऽष्टादशैव दण्डास्तु ।
उभयनिषेधे किं फलमेकनिषेधे च किं गणितम् ॥ ३८ ॥
बहुविधवज्राकाराणां क्षेत्राणां व्यावहारिकफलानयनसूत्रम् –
रज्ज्वर्धकृतिस्त्र्यंशो बाहुविभक्तो निरेकबाहुगुणः ।
सर्वेषामश्रवतां फलं हि बिम्बान्तरे चतुर्थांशः ॥ ३९ ॥
है, लम्बाई ७७ दंड, दोनों मुखों में प्रत्येक का माप ८ दंड और मध्य का माप ४ दंड है । इसके क्षेत्र-
फल का माप बतलाओ ॥ ३५ ॥ इसी प्रकार, किसी वज्राकार क्षेत्र की लम्बाई ९६ दंड, मध्य में केवल
मध्य बिन्दु है; और मुखों में से प्रत्येक का माप १३⅓ दंड है । इसका क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ३६ ॥
उभयनिषेध क्षेत्र के क्षेत्रफल को निकालने के लिये नियम —
लम्बाई और चौड़ाई के गुणनफल में से लम्बाई और आधी चौड़ाई के गुणनफल को घटाने
पर उभयनिषेध क्षेत्रफल प्राप्त होता है । जो लम्बाई और आधी चौड़ाई के गुणनफल में से उसी घटाई
जाने वाली राशि की अर्द्धराशि घटाई जाने पर प्राप्त होता है, वह एकनिषेध आकृति का क्षेत्रफल
होता है ॥ ३७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
लम्बाई ३६ है, चौड़ाई केवल १८ दंड है । उभयनिषेध तथा एक निषेध क्षेत्र के क्षेत्रफलों
को अलग अलग निकालो ॥ ३८ ॥
बहुविधवज्र के आकार की रूपरेखा वाले क्षेत्रों के व्यावहारिक क्षेत्रफल के माप को निकालने
के लिये नियम —
परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग की एक तिहाई राशि को भुजाओं की संख्या द्वारा भाजित कर,
और तब एक कम भुजाओं की संख्या द्वारा गुणित करने पर, भुजाओं से बने हुए समस्त क्षेत्रों के
( वज्राकार ) क्षेत्रफल का माप प्राप्त होता है । इस फल का चतुर्थांश संस्पर्शी ( एक दूसरे को स्पर्श
करने वाले ) वृत्तों द्वारा घिरे हुए क्षेत्र का क्षेत्रफल होता है ॥ ३९ ॥
( ३७ ) इस गाथा में कथित आकृतियाँ नीचे दी गई हैं—
ये आकृतियाँ किसी चतुर्भुजक्षेत्र को उसके
दो विकर्णों द्वारा चार त्रिभुजों में बाँट देने पर प्राप्त
हुई दिखाई देती हैं। उभयनिषेध आकृति, इस
चतुर्भुज के दो सम्मुख त्रिभुजों को हटाने पर प्राप्त
होती है, और एकनिषेध आकृति ऐसे केवल एक
त्रिभुज को हटाने पर प्राप्त होती है ।
( ३९ ) इस गाथा में कथित नियम कोई भी संख्या की भुजाओं से बनी हुई आकृतियों का
१९० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. ४०-
अत्रोद्देशकः
षड्बाहुकस्य बाहोर्विष्कम्भः पञ्च चान्यस्य ।
व्यासस्त्रयो भुजस्य त्वं षोडशबाहुकस्य वद ॥ ४० ॥
त्रिभुजक्षेत्रस्य भुजः पञ्च प्रतिबाहुरपि च सप्त धरा षट् ।
अन्यस्य षडश्रस्य ह्येकादिषडन्तविस्तारः ॥ ४१ ॥
मण्डलचतुष्टयस्य हि नवविष्कम्भस्य मध्यफलम् ।
षट्पञ्चचतुर्व्यासा वृत्तत्रितयस्य मध्यफलम् ॥ ४२ ॥
धनुराकारक्षेत्रस्य व्यावहारिकफलानयनसूत्रम्—
कृतवेषुगुणसमासं बाणार्धगुणं शरासने गणितम् ।
शरवर्गात्पञ्चगुणाज्ज्यावर्गयुतात्पदं काष्ठम् ॥ ४३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
छः भुजाओं वाली आकृति की एक भुजा ५ है, और १६ भुजाओं वाली आकृति की एक भुजा
३ है । प्रत्येक दशा में क्षेत्रफल बताओ ॥ ४० ॥ त्रिभुज के सम्बन्ध में एक भुजा ५ है, सम्मुख
( दूसरी ) भुजा ७ है, और आधार ६ है । दूसरी छः भुजाकार आकृति में भुजाएँ क्रमवार १ से ६
तक हैं । प्रत्येक दशा में क्षेत्रफल क्या है ? ॥ ४१ ॥ जिनमें से प्रत्येक का व्यास ९ है, ऐसे
चार समान एक दूसरे को स्पर्श करने वाले वृत्तों द्वारा घिरे हुए क्षेत्र का क्षेत्रफल क्या है ? तीन एक
दूसरे को स्पर्श करने वाले क्रमशः ६, ५ और ४ माप के व्यासवाले वृत्तों के द्वारा घिरे हुए क्षेत्र का
क्षेत्रफल भी बतलाओ ॥ ४२ ॥
धनुष के आकार की रूपरेखा है जिसकी ऐसे आकार वाली आकृति का व्यावहारिक क्षेत्रफल
निकालने के लिये नियम—
बाण और ज्या ( ताँत या डोरी ) के मापों को जोड़कर योगफल को बाण के माप की अर्द्ध राशि
द्वारा गुणित करने से, धनुषाकार क्षेत्र का क्षेत्रफल प्राप्त होता है । बाण के माप के वर्ग को ५ द्वारा
गुणित कर, और तब उसमें ताँत ( डोरी ) के वर्ग को मिलाने से प्राप्त राशि का वर्गमूल धनुष की
धनुषाकार काष्ठ की लम्बाई होती है ॥ ४३ ॥
क्षेत्रफल देता है । यदि भुजाओं के मापों के योग की आधी राशि य हो, और भुजाओं की संख्या न हो,
तो क्षेत्रफल = य² / ३ × (न - १) / न होता है । यह सूत्र त्रिभुज, चतुर्भुज, षट्भुज,
और वृत्त को अनन्त भुजाओं की आकृति मानकर, उनके सम्बन्ध में
व्यावहारिक क्षेत्रफल का मान देता है । नियम का दूसरा भाग एक
दूसरे को स्पर्श करने वाले वृत्तों के द्वारा घिरे क्षेत्र के विषय में है ।
इस नियमानुसार प्राप्त क्षेत्रफल भी आनुमानिक होता है । पार्श्व
में दिया गया चित्र, चार संस्पर्शी वृत्तों द्वारा सीमित क्षेत्र है ।
( ४३ ) धनुषाकार क्षेत्र रूपरेखा में, वास्तव में, वृत्त की
अवधा ( खण्ड ) जैसा होता है । यहाँ धनुष चाप है, धनुष की डोरी ( ज्या ) चापकर्ण है, और बाण
चाप तथा डोरी के बीच की महत्तम लम्ब रूप दूरी होती है । यदि च, क और ल इन तीनों रेखाओं
की लम्बाईयों को निरूपित करते हों, तो गाथा ४३ और ४५ में दिये नियमों के अनुसार यहाँ
-७. ४६ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ १९१
अत्रोद्देशकः
ज्या षड्िंवशतिरेषा त्रयोदशेषुश्च कार्मुकं दृष्टम्।
किं गणितमस्य काष्ठं किं वाचक्ष्वाशु मे गणक ॥ ४४ ॥
बाणगुणप्रमाणानयनसूत्रम्—
गुणचापकृतिविशेषात् पञ्चहृतात्पदमिरिषुः समुद्दिष्टः।
शरवर्गात्पञ्चगुणादूना धनुषः कृतिः पदं जीवा ॥ ४५ ॥
अत्रोद्देशकः
अस्य धनुःक्षेत्रस्य शरोऽत्र न ज्ञायते परस्यापि।
न ज्ञायते च मौर्वी तद्द्वयमाचक्ष्व गणितज्ञ ॥ ४६ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक धनुषाकार क्षेत्र की डोरी २६ है एवं बाण १३ है । हे गणक, शीघ्रही मुझे इसके क्षेत्रफल
और झुके हुए काष्ठ का माप बतलाओ ॥ ४४ ॥
धनुषाकार क्षेत्र के सम्बन्ध में बाणमाप और गुण ( डोरी ) प्रमाण निकालने के लिये नियम—
डोरी और झुके हुए धनुष के वर्गों के अन्तर को ५ द्वारा भाजित करते हैं । परिणामी भजन
फल का वर्गमूल बाण का इष्ट माप होता है । बाण के वर्ग को ५ द्वारा गुणित कर, प्राप्त गुणनफल को
धनुष के चाप के वर्ग में से घटाते हैं । इस परिणामी राशि का वर्गमूल डोरी के संवादी माप को
देता है ॥ ४५ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
धनुषाकार क्षेत्र के बाण का माप अज्ञात है, और दूसरे ऐसे ही क्षेत्र की डोरी का माप अज्ञात
है । हे गणितज्ञ, इन दोनों मापों को निकालो ॥ ४६ ॥
धनुष क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने के लिये दिया गया सूत्र, चीन की सम्भवतः पुस्तकों को २१३ ईस्वी
पूर्व में जलाये जाने की घटना से पूर्व की पुस्तक च्यु—चांग सुआन—चु ( नवाध्यायी अंकगणित ) में
भी इसी रूप में दृष्टिगत होता है ।
क्षेत्रफल = ( क + ल ) × ल / २ यहाँ च = चाप,
धनुष की लम्बाई = √ ५ल² + क² क = चापकर्ण,
ल = लम्ब है ।
बाण की लम्बाई = {√ च² - क² } १/५ सूक्ष्म मानों के लिये इस अध्याय की ७३½ और
७४½ वीं गाथाओं को देखिये ।
पुनः धनुष की डोरी की लम्बाई = √ च² - ५ ल²
जम्बू द्वीप प्रज्ञप्ति ( ६/९ ) में तथा त्रिलोक प्रज्ञप्ति.( ४/२५९८ ) में यह मान क्रमशः इस प्रकार
दिया गया है—
जीवा = √( (व्यास - बाण) ४ बाण कूलिज के अनुसार पायथेगोरस के साध्य पर आधारित
इस सूत्र का उद्गम बाबुल में प्रायः २६०० ईस्वी पूर्व
व्यास = [ ४ (बाण)² + (जीवा)² ] / ४ बाण स्फानलिपि ग्रंथों में दृष्टि गत हुआ है । इस सम्बन्ध
में तिलोय पण्णत्तिका गणित द्रष्टव्य है ।