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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 421 में से

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पृष्ठ 335

-९. ५२ ½ ] छायाव्यवहारः [ २८१
अत्रोद्देशकः
आत्मच्छाया चतुःपादा वृक्षच्छाया शतं पदाम् ।
वृक्षोच्छ्रायः को भवेत्स्वपादमानेन तं वद ॥ ४९ ॥
वृक्षच्छायायाः संख्यानयनोदाहरणम्—
आत्मच्छाया चतुःपादा पञ्चसप्ततिभिर्युतम् ।
शतं वृक्षोन्नतिर्वृक्षच्छाया स्यात्कियती तदा ॥ ५० ॥
पुरतो योजनान्यष्टौ गत्वा शैलो दशोदयः ।
स्थितः पुरे च गत्वान्यो योजनाशीतितस्ततः ॥ ५१ ॥
तदग्रस्थाः प्रदृश्यन्ते दीपा रात्रौ पुरे स्थितैः ।
पुरमध्यस्थशैलस्यच्छाया पूर्वांगमूलयुक् ।
अस्य शैलस्य वेधः को गणकाशु प्रकथ्यताम् ॥ ५२ ½ ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ छायाव्यवहारो नाम अष्टमः समाप्तः ॥
॥ समाप्तोऽयं सारसंग्रहः ॥
उदाहरणार्थ एक प्रश्न
पाद माप में निज की छाया की लम्बाई ४ है । ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की छाया की
लम्बाई १०० है । बतलाओ कि ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की ऊँचाई क्या है ? ॥ ४९ ॥
किसी वृक्ष की छाया के संख्यात्मक माप को निकालने के संबंध में उदाहरण—
किसी समय निज की छाया की लम्बाई का माप निज के पाद से चौगुना है । किसी वृक्ष की
ऊँचाई ( ऐसे पाद-माप में ) १७५ है । उस वृक्ष की छाया का माप क्या है ? ॥ ५० ॥ किसी नगर के पूर्व
की ओर ८ योजन (दूरी) चल चुकने के पश्चाव, १० योजन ऊँचा शैल (पर्वत) मिलता है । नगर में भी
१० योजन ऊँचाई का पर्वत है । पूर्वी पर्वत से पश्चिम की ओर ८० योजन चल चुकने के पश्चात् , एक
और दूसरा पर्वत मिलता है । इस अंतिम पर्वत के शिखर पर रखे हुए दीप नगर निवासियों को दिखाई
देते हैं । नगर के मध्य में स्थित पर्वत की छाया पूर्वी पर्वत के मूल को स्पर्श करती है । हे गणक, इस
( पश्चिमी ) पर्वत की ऊँचाई क्या है ? शीघ्र बतलाओ ॥ ५१-५२ ½ ॥
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सार संग्रहनामक गणित शास्त्र में छाया नामक अष्टम व्यवहार
समाप्त हुआ ।
इस प्रकार यह सारसंग्रह समाप्त हुआ ।
( ५१-५२ ½ ) यह उदाहरण उपर्युक्त ४५ वें श्लोक में दिये गये नियम को निर्देशित करने
के लिये है ।