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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 781

इस भांति कर्कश समय । भोगता है जो स्वानंदराज्य ।
आज जो है यहां भाग्योदय । नहीं अन्यत्र ॥ २६ ॥
संजय कहता है कुरु-श्रेष्ठ । शत्रुके गुणसे होता संतुष्ट ।
यहां वह गुरु भी बना श्रेष्ठ । आत्मसुखकर ॥ २७ ॥
यदि यह प्रश्न नहीं करता । श्रीहरि ऐसे क्यों गांठ खोलता ।
तथा कैसे हमें ज्ञान मिलता । परमार्थका ॥ २८ ॥
अज्ञानके अंधेरेमें होते । जन्म मृत्युकी राह चलते ।
यहां आकर कैसे पहुंचते । आत्म प्रकाश सदनमें ॥ २९ ॥
हमें तुम्हें किया अपार । इसने यह उपकार ।
तभी हैं व्यास-सहोदर । गुरुत्वमें यह ॥ ४३० ॥
संजय कहता मनही मन । बढ गया मेरा यह कथन ।
खटकेगा धृतराष्ट्रको जान । कितना बोला मैं ॥ ३१ ॥
ऐसे अर्जुन गुण-वर्णन । छोडकर वैसे ही अपूर्ण ।
कहता पूछता क्या अर्जुन । श्रीहरिसे तब ॥ ३२ ॥
छोडकर अर्जुनका गुण-वर्णन । संजय कहता श्रीकृष्णका व्याख्यान ।
वैसेही मैं भी करूंगा सुनो व्याख्यान । ज्ञानदेव निवृत्तिका ॥ ३३ ।
गीता श्लोक २८
ओवी ४३३
ॐ
७०९ श्रद्धा-निरूपण-योग