सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 777, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 777

जिस सत्तांका रूप संतत । रहता है स्थल-कालातीत ।
तथा होता है जो अखंडित । अपने आपमें ॥ ८१ ॥
जितना जो है यह दीखता । असत् यह वह नहीं होता ।
रूप जो यह जानता पाता । उसका आश्रय ॥ ८२ ॥
इससे वह् प्रशस्त कर्म । हुवा है जो सर्वात्मक ब्रह्म ।
कर देखना उससे सम । ऐक्य बोधसे ॥ ८३ ॥
ओंकार तथा जो तत्कार । दिखाता कर्म ब्रह्माकार ।
होना उसे निगलकर । केवल ब्रह्म ॥ ८४ ॥
ऐसा यह अंतरंग । सत् शब्दका विनियोग ।
कहता यह श्रीरंग । मैं नहीं कहता ॥ ८५ ॥
यदि कहता मैं, मैं यह कहता । श्रीरंगमें द्वैतकी आती हीनता ।
इसीलिये यह वचन है कहता । श्रीहरिका ही ॥ ८६ ॥
सत् शब्दका और एक अर्थ—
अब और ही एक प्रकार । सत् शब्दका सुन तू धनुर्धर ।
करता सात्विक कर्म पर । उपकार जो ॥ ८७ ॥
सत्कर्म चलते हैं सुंदर । अपने अधिकारानुसार ।
जब कोई अंग धनुर्धर । होता हीन कस ॥ ८८ ॥
एक अवयवकी दुर्बलता । शरीर व्यापारको ही रोकता ।
या किसी अंगसे है रुक जाता । रथका वेग ॥ ८९ ॥
वैसे ही एक गुणके बिन । संतमें आता असंतपन ।
तब सत्कर्म बनाता है जान । असत्कर्म ॥ ३९० ॥
तब ओंकार तथा तत्कार । करते हैं कर्मको सुंदर ।
वैसे ही उसका जीर्णोद्धार । करता सत् शब्द ॥ ९१ ॥
कर्मके असत्‌को यह मिटाता । उसमें सद्भाव रूढ करता ।
निज सत्त्वकी प्रौढ़ता बढ़ाता । यह सत् शब्द ॥ ९२ ॥
दिव्यौषधिसे रोगीको जैसे । असहायको सहायतासे ।
कर्म-व्यंगमें सत् शब्द वैसे । करता पूर्ण ॥ ९३ ॥
(84) ७०५ श्रद्धा-निरूपण-योग