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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 787

तथा मैने भी यह तजकर । नहीं किया है ग्रंथका बिस्तार ।
यहांपे भी कहता सविस्तर । निरूपणमें एक ॥ ५९ ॥
जहां सत्रहका अध्याय । कहते अंतके समय ।
कहता देव साभिप्राय । इस प्रकार ॥ ६० ॥
ब्रह्म नाममें श्रद्धा रखकर । किये जाते जितने व्यवहार ।
होते वह सब व्यर्थ आखर । निश्चित जान ॥ ६१ ॥
सुनकर यह श्रीहरिका बोल । डुलता है मनमें पार्थ निर्मल ।
कहता कर्म-निष्ठोंका है सकल । बना निम्न रूप ॥ ६२ ॥
अज्ञानसे अंध जो कर्म-जड़ । ईशको न देख सकता मूढ़ ।
उसके नाम श्रद्धादि जो गूढ़ । जानेगा कैसे ॥ ६३ ॥
तथा रज और तमोगुण । नहीं तजता अंतःकरण ।
तब होती है जो श्रद्धा क्षीण । जुडती कैसे ब्रह्मसे ॥ ६४ ॥
फिर शस्त्र-नोकसे गले लगना । तथा खडी डोरीपे दौड़ते जाना ।
अथवा मानो नागिनसे खेलना । होंगे कम धातुक ॥ ६५ ॥
कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ? अठारहवेका सूत्र—
ऐसे कर्म अति कठिन । देते हैं पुनः पुनः जनन ।
इस भांति कुयोग-पूर्ण । होते हैं जो ॥ ६६ ॥
होता यदि कर्म सांग संपूर्ण । बनता है ज्ञानके ही समान ।
नहीं तो देता नरक महान । यही कर्म ॥ ६७ ॥
कर्ममें हैं इस प्रकार । आते हैं दोष बार बार ।
तब कहां मोक्षका द्वार । खुलेगा कर्मठको ॥ ६८ ॥
मिटाना है यदि कर्म-संग । करके उसका पूर्ण त्याग ।
स्वीकार करना जो अव्यंग । संन्यास यहां ॥ ६९ ॥
कर्म-बाधाकी जो कहीं । भयकी बातही नहीं ।
वह आत्म-ज्ञान यहीं । होता हस्तगत ॥ ७० ॥
७१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग