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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 780

श्रद्धाहीन कार्य कभी सफल नहीं होता—
अथवा नामको छोड़कर । तोड़कर श्रद्धाका आधार ।
दुराग्रह बल बढ़ाकर । धनंजय ॥ १४ ॥
अश्वमेघ किये अगणित । रत्नमय पृथ्वी-दान पार्थ ।
एकांगुष्ठ तप भी सतत । किया गया ॥ १५ ॥
जलाशयके नाम पर । बन गये नये सागर ।
किंतु वे सब धनुर्धर । व्यर्थ ही मान ॥ १६ ॥
पत्थर पर मेघ बरसना । या राखमें हवन किया जाना ।
या प्रेमसे आलिंगन करना । अपनी छायाका ॥ १७ ॥
या आकाशको बेंत । मारना जैसे पार्थ ।
वैसे ही सब है व्यर्थ । यह समारोह ॥ १८ ॥
कोल्हूमें कंकडका घान डाला । उससे न खली न तेल मिला ।
किंतु अपना दारिद्र्य सकल । रहा साथ ही ॥ १९ ॥
गांठमें बंधा हुवा ढेला । यहां या वहां नहीं चला ।
जिससे मर गया भला । उपवाससे ॥ ४२० ॥
वैसे कर्म जात सफल । नहीं देते हैं यहां फल ।
तब होंगे वहां विफल । कहना रहा क्या ॥ २१ ॥
ब्रह्म नामकी श्रद्धा तजकर । करनेमें ये सभी व्यवहार ।
व्यर्थ ही जान तू पांडुकुमार । केवल दिखानेके ॥ २२ ॥
जो कलुष-कुल-केसरी । त्रिताप-तिमिर-तमारी ।
वीरवर श्रीनरहरी । बोलते ऐसे ॥ २३ ॥
निजानन्दमें तद्रूप । हुवा तब परंतप ।
चंद्रमा जैसे तद्रूप । होता चांदनीसे ॥ २४ ॥
अजी ! यह युद्ध ऐसा देखा । वाणी तथा बाणके जो नोक ।
नापते हैं जीव सह एकेक । मांस खंड ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०८