ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस नामका हृदयमें चिंतन । उस वर्ण-त्रयका नित स्मरण ।
करनेसे योग्यता विश्व-सृजन । आयी उसमें ॥ ३८ ॥
रचे तब ब्रह्माने जन । तथा वेद जैसे शासन ।
और यज्ञ सम वर्तन । जीवन रूप ॥ ३९ ॥
ऐसे कितने लोक फिर । सृजन किये हैं अपार ।
ब्रह्म-दत्त दे अग्रहार । बने त्रिभुवन ॥ ३४० ॥
ऐसे नाम-मंत्रसे महान । बना जो ब्रह्मदेव अर्जुन ।
उसका रूप अब तू सुन । कहता श्रीकांत ॥ ४१ ॥
ओं तत्सत्का दर्शन—
यहां सब मंत्रोंका राजा । आदि प्रणव वह दूजा ।
है तत्कार और जो है तीजा । वहां सत्कार ॥ ४२ ॥
एवं जो ओं तत्सदाकार । ब्रह्मनाम त्रि-प्रकार ।
पुष्प सुगंध सुंदर । लेते उपनिषद ॥ ४३ ॥
इनसे होकर जब एक । कर्म चलता है सात्विक ।
बन जाता है नित सेवक । मोक्ष घटमें ॥ ४४ ॥
कर्पूरके भी अलंकार । देगा यदि दैव लाकर ।
उन्हे चढाना देह पर । है कठिनाई ॥ ४५ ॥
वैसे आचरण किया सत्कर्म । उच्चारण किया ब्रह्मका नाम ।
किंतु नहीं जानता यदि मर्म । विनियोगका ॥ ४६ ॥
साधुओंका समुदाय । घर आता धनंजय ।
किंतु होगा पुण्यक्षय । अवज्ञासे ॥ ४७ ॥
अथवा करने अलंकार । स्वर्णकी पोटली बंधकर ।
गलेमें बांधली धनुर्धर । उसी भांति ॥ ४८ ॥
लेता मुखसे ब्रह्म-नाम । हाथमें हैं सात्विक कर्म ।
प्रयोगके बिन जो कर्म । होता व्यर्थ ॥ ४९ ॥
अजी ! अन्न और जो भूख । साथ रखा हुवा भी देख ।
खाना न जानता बालक । घडता उपवास ॥ ३५० ॥
७०१ श्रद्धा-निरूपण योग