ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥
याग हो अथवा दान । तथा तपादि गहन ।
पूर्ण अथवा अपूर्ण । रहे वह ॥ ६ ॥
पारसकी कसौटी पर जैसे । भले बुरेकी बात न हो वैसे ।
ब्रह्ममें अर्पण करते जिसे । वह है ब्रह्म-रूप ॥ ७ ॥
नहीं रहते पूर्ण या अपूर्ण । किये जाते कर्म जो ब्रह्मार्पण ।
देखी न जाती सिंधुमें अर्जुन । जैसे नदियां ॥ ८ ॥
ऐसे पार्थ तेरे प्रति । ब्रह्म नामकी है शक्ति ।
कही है स-उपपत्ति । बुद्धिमान तू ॥ ९ ॥
तथा एकेक अक्षर । भिन्न भिन्न स्पष्ट कर ।
विनियोग धनुर्धर । कहा तुझसे ॥ ४१० ॥
अब ऐसे सु-महिम । इसीलिये है ब्रह्मनाम ।
जान लिया न यह मर्म । तूने अर्जुन ॥ ११ ॥
तभी इस पर श्रद्धा । बढ़ती रहने दो सदा ।
उसका विनियोग कदा । रुकने न देना ॥ १२ ॥
जिस कर्ममें यह प्रयोग । अनुष्ठान किया सद्द्विनियोग ।
वहां अनुष्ठान किया सांग । वेदविदित ॥ १३ ॥
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
तप यज्ञ तथा दान करता कर्म साधक ।
उसमें बरता जाता उसको सत् कहा गया ॥ २७ ॥
अश्रद्धासे किया कर्म यज्ञ दान तपादिक ।
असत् वह कहा जाता होता सर्वत्र निष्फल ॥ २८ ॥
७०७ श्रद्धा-निरूपण-योग