ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 784, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरेकी करनेसे दासता । आई हुई पराधीन श्रेष्ठता ।
उपाधि उच्छिष्टका है क्या होता । बखाननेसे ॥ २२ ॥
तब तू आत्मा एक समान । ऐसे कहनेसे भी श्रीमान् ।
दृश्यादृश्यको बाहर मान । ढकेलता हुवा ॥ २३ ॥
मौन भूषणादिसे गुरु पूजन—
तभी करनेमें तेरा वर्णन । नहीं मिलता योग्य विशेषण ।
तब मौन बिन अन्य भूषण । नहीं चढाता मैं ॥ २४ ॥
स्तवन है कुछ भी न बोलना । पूजा है कुछ भी न करना ।
सन्निधिमें कुछ भी न होना । तेरे पास ॥ २५ ॥
किंतु जैसे कोई भ्रम-ग्रस्त । करता है प्रलाप बहुत ।
वैसे मैं वर्णन गुरु-मात । कहता सहले तू ॥ २६ ॥
अब दे अपना स्वाक्षर । हुवा जो गीतार्थ विस्तार ।
जिससे हो यह स्वीकार । सज्जनोंमें ॥ २७ ॥
कहते हैं श्रीनिवृत्तिनाथ यह । बार बार पूछता क्यों वह ।
कह तू पारसपे घिसते क्यों लोह । बार बार ॥ २८ ॥
ज्ञानदेव तब विनयकर । आपका प्रसाद है गुरुवर ।
सुनना जी अब चित्त देकर । ग्रंथ संवाद ॥ २९ ॥
गीत-रत्न प्रासादका कलशाध्याय—
अजी ! यह गीता-रत्न-प्रासादका । कलशही है अर्थ चिंतामणिका ।
अथवा है सभी गीता-दर्शनका । है पथ-दीप ॥ ३० ॥
लोगोंमें रही है यह मान्यता । जब दूरसे कलश दीखता ।
तब तो सहज दर्शन होता । देवताका भी ॥ ३१ ॥
अजी ! उसी भांति है यहां । एक ही अध्यायमें जहां ।
पूर्ण-दर्शन होता है यहां । गीतागमका ॥ ३२ ॥
कलश है यह इसी कारण । अध्याय यह बादरायण ।
अठारहवा जो सकारण । रचते हैं ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१२