सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 791, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 791

कूप सरोवर आराम । अग्रहारादि महाप्राम ।
व्रत समारोहादि कर्म । अन्य अनेक ॥ ९९ ॥
ऐसे इष्ट-पूर्तिके जो सकल । कामना होती है जिसका मूल ।
भोगना पड़ता इसका फल । बंधकर ही ॥ १०० ॥
करते हैं सब देह-धारण । भोगने पड़ते जनन-मरण ।
इसको अ-स्वीकारना अर्जुन । असंभव जैसे ॥ १ ॥
अथवा ललाट लिखित जैसे । कभी नहीं मिटाया जाता वैसे ।
तथा काला गोरापन धोनेसे । मिटता नहीं ॥ २ ॥
वैसे काम्य-कर्म फल पार्थ । भोगना पड़ता है निश्चित ।
धरना दे बैठता है नित । ऋणदाता समान ॥ ३ ॥
या कामना नहीं करते । सहज रूपमें कर्म होते ।
रणभूमिमें बाण लगते । न लड़ते भी जैसे ॥ ४ ॥
अजानपनसे गूड़ खाता । फिर भी वह मीठा लगता ।
राख मानकर पैर देता । जलाती आग ॥ ५ ॥
काम्य-कर्ममें जो यह एक । सामर्थ्य होता है स्वाभाविक ।
इसीलिये मुमुक्षुको देख । नहीं चाहना उसे ॥ ६ ॥
वास्तवमें पार्थ ऐसे । काम्य कर्म होता उसे ।
तज देना विष जैसे । उगलकर ॥ ७ ॥
देख कर फिर यह त्याग । संन्यास कहता है सारा जग ।
तथा देखता जो अंतरंग । सर्वदृष्टा ॥ ८ ॥
इस काम्य-कर्मको तजना । कामनाको जैसे उखाडना ।
धन-त्याग कर मिटा देना । भयको जैसे ॥ ९ ॥
नित्य-नैमित्तिक कर्मका विवेचन—
चंद्र-सूर्यके जो ग्रहण । बनाते पर्वणी अर्जुन ।
या माता-पिताका मरण । निश्चित दिवस ॥ ११० ॥
७१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग