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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 788

ज्ञानका आवाहन-मंत्र । ज्ञान फलनेका सु-क्षेत्र ।
तथा ज्ञानाकर्षक-सूत्र । तंतु ही जो ॥ ७१ ॥
यह दोनों संन्यास और त्याग । आचरनेसे छूटता जग ।
तब इस बातमें हो सजग । पूछना स्पष्ट ॥ ७२ ॥
ऐसे विचार कर अर्जुन । त्याग संन्यासका पक्व ज्ञान ।
जान लेनेमें करता प्रश्न । इस स्थानपे ॥ ७३ ॥
उसके उत्तरमें श्रीकृष्ण । करता है जो यहां कथन ।
उससे व्यक्त हुवा संपूर्ण । अष्टादशाध्याय ॥ ७४ ॥
एवं यहां ले जन्य-जनक भाव । होता अध्यायसे अध्याय प्रसव ।
अब प्रश्न किया वह सावयव । सुनलें सब ॥ ७५ ॥
कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन—
वहां जो श्रीकृष्णका कथन । समाप्त होता देख अर्जुन ।
अपने मनमें होता खिन्न । जिस समय ॥ ७६ ॥
वैसे आत्म-तत्वमें निश्चित । बन गया था उसका मत ।
श्रीहरिका न करना बात । न भाया उसे ॥ ७७ ॥
बछडा होने पर भी तृप्त । गाय रहती पास सतत ।
अनन्य प्रीतकी यह रीत । चलती आयी है ॥ ७८ ॥
बिन कारण भी उनका बोलना । देख कर भी फिर फिर देखना ।
प्रिय-वस्तुके भोगसे होता दूना । भोग-भाव ॥ ७९ ॥
ऐसी है प्रेमकी यह रीति । तथा पार्थ है उसकी पूर्ति ।
तभी करती उसकी मति । चिंता मौनकी ॥ ८० ॥
तथा है संवादके निमित्तसे । व्यवहारकी जो वस्तु है उसे ।
भोगा जाता है सहज ही जैसे । दर्पण रूप ॥ ८१ ॥
फिर जब संवाद रुकता । तब यह सुख भंग होता ।
इसको फिर कैसे सहता । अभ्यस्त इसका ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७१६