ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकलशके बाद कुछ भी कहीं । मंदिरका काम रहता नहीं ।
यह बात अष्टादशमें यहीं । दीखती स्पष्ट ॥ ३४ ॥
व्यास सहज सशक्त सूत्रकार । उसने निगम-रत्नाचल पर ।
उपनिषदार्थके पठार पर । किया खनन ॥ ३५ ॥
वहां जो त्रिवर्गका असार । मिला माटी कंकड़ादि अपार ।
उससे महा-भारत प्राकार । रचा चतुर्दिक ॥ ३६ ॥
आत्म-ज्ञानका वहां अखंड । मिला जो सुंदर शिला-खंड ।
रची पार्थ-कृष्णकी अखंड । संवाद कलाकृति ॥ ३७ ॥
निवृत्ति-सूत्रका अधिष्ठान । सर्व-शास्त्रार्थका है भरण ।
आकार लाया बादरायण । मोक्ष-रेखाका ॥ ३८ ॥
करनेमें ऐसा यह निर्माण । पंद्रह अध्यायका है सदन ।
हुए हैं पंद्रह अंतस्त मान । इस प्रासादके ॥ ३९ ॥
षोडश अध्याय ऊपर । ग्रीवा घंटाका जो आकार ।
तथा कलश-पीठाकार । सप्तदश जो ॥ ४० ॥
उस पर यह अष्टादश । अपने आप हुवा कलश ।
ऊपर गीताविकमें व्यास । लगाता है ध्वज ॥ ४१ ॥
पिछले सभी अध्याय । चढते भूमिका आय ।
पूर्णता दिखाते जाय । अपनेसे ॥ ४२ ॥
हुए कार्यमें रही जो अपूर्णता । कलशमें होगी वह पूर्णता ।
वैसे अष्टादश विचार कहता । साद्यंत गीताका ॥ ४३ ॥
व्यास बडा कारीगर । रचा गीताका मंदिर ।
किया महा उपकार । प्राणि मात्रका ॥ ४४ ॥
कोई है परिक्रमा जपकी । करते बाहरसे इसकी ।
कोई श्रवणार्थ हैं छायाकी । धरते अपेक्षा ॥ ४५ ॥
तथा अवधानका संपूर्ण । देकर कोई दक्षिणा-धन ।
पैठते अंतर्गृहमें तत्क्षण । अर्थ ज्ञानके ॥ ४६ ॥
७१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग