ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजय जय देव श्रीगुरु । अकल्पनाख्य कल्पतरु ।
स्वसंविद्रुमबीजप्ररु । भूमिरूप ॥ १० ॥
निर्विशेष तेरा स्तवन कैसे करूं ?—
यह क्या एकेक कर ऐसे । अनेक परिभाषासे कैसे ।
स्तोत्र करूं तव उद्देश्यसे । निर्विशेष ॥ ११ ॥
जिन विशेषणसे करना वर्णन । वह दृश्य-रूप तेरा न होता जान ।
लज्जित होता हूं करनेमें स्तवन । तेरा मैं श्रीगुरु ॥ १२ ॥
किंतु जो मर्यादाका सागर । ऐसी उसकी ख्याति सादर ।
किंतु न देखता सुधाकर । हुवा उदय ॥ १३ ॥
निज-निर्झरसे वह सोमकांत । चंद्रको अर्घ्य न देता यदि रात ।
तब उससे दिलाता निशा-नाथ । सुनो देव ॥ १४ ॥
न जाने कैसे वसंत आता । सहसा खिलते वृक्ष-लता ।
किंतु आप न रोक सकता । खिलता वृक्ष ॥ १५ ॥
पद्मिनी पाकर रवि-किरण । सिकुडना जानती कहां कौन ।
या जल-स्पर्श होते ही लवण । भूलता अंग ॥ १६ ॥
वैसे मैं करता तेरा स्मरण । होता मैं मेरा यह विस्मरण ।
डकार रोक न सकता जान । तृप्त जैसे ॥ १७ ॥
तूने मुझे किया ही है ऐसे । मेरा मैं-पन मिटा देनेसे ।
स्तवनार्थ पागल-पनसे । नाचती वाचा ॥ १८ ॥
अथवा मैं वैसे ही सचेतन । रहके करूंगा तेरा स्तवन ।
जिससे गुण-गुणीकी तुलना । होगी मुझसे ॥ १९ ॥
तथा तू है एकरस अखंड । कैसे करें गुण-गुणीका खंड ।
मोति भला क्या तोडकर जोड़ । या समूचा वैसेही ॥ २० ॥
और तू है माता तथा पिता । इससे स्तवन नहीं होता ।
लगती उपाधिकी भृष्टता । पुत्रत्वकी मात्र ॥ २१ ॥
७११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग