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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 789

इसलिये वह संन्यास । पूछनेका करके मिस ।
खोलता है पर विशेष । गीता तत्वका ॥ ८३ ॥
अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है—
अठारहवा अध्याय यही नहीं । समग्र एकाध्यायी गीता है यही ।
दुहता है जब स्वयं बछडा ही । तब कैसा अकाल ॥ ८४ ॥
संवाद रुकनेका समय आया । पुनरपि गीता प्रारंभ कराया ।
गुरु-शिष्यके संवादमें अशक्य क्या । होता है कब ॥ ८५ ॥
यह सब रहने दें अब । अर्जुन पूछता सुने सब ।
कहता यह विनय अब । सुनले देव ॥ ८६ ॥
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
त्याग और संन्यासका अर्थ भिन्नत्व—
अजी ! संन्यास और त्याग । एक ही अर्थके दो अलग ।
जैसे संघात और संग , है समुदायके ॥ ८७ ॥
त्याग तथा संन्याससे । त्याग ही कहना ऐसे ।
जान लिया है मनसे । यहां मैंने ॥ ८८ ॥
इसमें है यदि अर्थ-भेद । करें देव इसको विशद ।
तब कहता वह मुकुंद । ये दोनों हैं भिन्न ॥ ८९ ॥
अर्जुनने कहा
कैसे संन्यासका तत्व तथा है त्यागका कहो ।
जानना चाहता हूं मैं कह तूं भिन्न भिन्न जो ॥ १ ॥
७१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग