ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर पाते निज-बोधसे तत्काल । आत्म-रूप हरि-दर्शनका फल ।
ऐसे मोक्ष प्रासादमें है सकल । पाते हैं प्रसाद ॥ ४७ ॥
जैसे समर्थोंका पंक्ति भोजन । देता सबको एकसा पकवान ।
श्रवण पठन अर्थ-चिंतन । मोक्ष देता इसका ॥ ४८ ॥
गीता यह ऐसा वैष्णव-प्रासाद । अठारहवा कलश है विशद ।
मैंने कहा है जानेका यह भेद । इस स्थान पे ॥ ४९ ॥
सत्रहवे और अठारहवे अध्यायका संबंध—
समाप्त होता है सत्रहवां अध्याय । वहां होता कैसे अठारहवां उदय
कहूंगा यह प्रत्यक्ष-सा दृश्य । आंखमें दीखे वैसे ॥ ५० ॥
न तोडके दोनों आकार । बनाया है एक शरीर ।
है अर्धनारी नटेश्वर- । रूपमें जैसे ॥ ५१ ॥
या गंगा-यमुनाका उदक । प्रवाहमें भिन्न है जो देख ।
तथा पानी रूपसे एक । दीखता सदैव ॥ ५२ ॥
अथवा शुक्ल-पक्षमें जैसे । नाना चंद्रकला दीखती वैसे ।
पूर्णमासीका पूर्ण चंद्र जैसे । दीखता एक ॥ ५३ ॥
जैसे भिन्न होनेसे सब पद । श्लोकके होते हैं श्लोकावछेद ।
अध्यायके होते अध्याय भेद । इसी भांति ॥ ५४ ॥
किंतु कहते हैं एक ही प्रमेय । मिलकर ये अष्टादश अध्याय ।
नाना रत्नोंको पिरोती साभिप्राय । जैसे एकही डोरी ॥ ५५ ॥
अनेक मोतियां मिलकर । होता जैसा एकावली हार ।
किंतु शोभा दीखती सुंदर । एकही अखंड ॥ ५६ ॥
गिन सकते हैं वृक्षके सभी फूल । सौरभपे उंगली न पडे सरल ।
अध्यायोंमें श्लोक हैं वैसे ही अचल । जानना यहां ॥ ५७ ॥
यहां है जो सात शत श्लोक । अष्टादश अध्यायमें लेख ।
किंतु देव बोलता है एक । दूसरा नहीं ॥ ५८ ॥
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