ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह हो तद्रूप ब्रह्मार्पण । न रहे यहां फल-कारण ।
भोग रूप न रहे स्मरण- । बीजका भी ॥ ७१ ॥
ऐसे तदात्मक जो ब्रह्म । साकार यहां सब कर्म ।
कह कर इदं न मम । झटक देते हैं ॥ ७२ ॥
ओंकारसे ऐसे प्रारंभ कर । तथा तत्कारमें अर्पण कर ।
कर्मको बनाया इस प्रकार । ब्रह्मकर्म ॥ ७३ ॥
हुवा वह कर्म ब्रह्मकार । इससे न होता कार्य भार ।
कर्ता कर्मका रहा विचार । भिन्नत्वका जो ॥ ७४ ॥
रूपसे लवण घुल जाता । किंतु स्वादसे जो रह जाता ।
वैसे द्वैत-भावसे रहता । कर्ता जो भिन्न ॥ ७५ ॥
रहता जब द्वैतका भान । होता भव-भयका कारण ।
ऐसे स्वमुखसे हैं श्रीकृष्ण । बोलते वेद ॥ ७६ ॥
तभी जो परत्वमें ब्रह्म रहता । उसको आत्मत्वमें जानना होता ।
सत् शब्द ऋण दोषार्थ रखता । यहां श्रीकृष्ण ॥ ७७ ॥
तो भी यहां ओंकार तत्कारमें । ब्रह्म-कर्म किया जो शरीरमें ।
वह कर्म प्रशस्तादि शब्दोंमें । किया है बखान ॥ ७८ ॥
उस प्रशस्त कर्ममें है । सत् शब्दका विनियोग है ।
वहीं जो प्रभु कहता है । सुनो अब ॥ ७९ ॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
सत् भावसे होनेवाले लाभ—
सत् शब्दका यहां सारांश । असत् नाट्यका हो निरास ।
दीखते हैं रूप निर्दोष । सत्ताका यहां ॥ ३८० ॥
सत्का स्मरण देता है सत्यता और साधुता ।
वैसे ही कर्म-सौंदर्य कहा सत्कारका फल ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७०४