ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
ऐसे अहंकार बल । मिल करके सकल ।
दर्प सागर उछल- । आता असीम ॥ ९३ ॥
ऐसे उछलता हुवा दर्प । बढ़ाता काम-पित्त-प्रकोप ।
पाकर उसका फिर ताप । भड़कता क्रोधाग्नि ॥ ९४ ॥
तब मानो जेठका जलाता आतप । तथा तेल घीका साथ ले हो प्रकोप ।
होता अग्नि-वायुका तांडव-प्रताप । उसी भांति ॥ ९५ ॥
अहंकारके साथ बल । दर्प काम-क्रोधसे मिल ।
प्रकट हुवा जिस स्थल । पांडुकुमार ॥ ९६ ॥
ले अपना वे आदेश । रखेंगे क्या रीता शेष ।
करनेमें सर्व-नाश । कौनसा कहां ॥ ९७ ॥
पहले वे धनुर्धर । अपना मांस रुधिर ।
देंगे सब परमार । अभिचारार्थ ॥ ९८ ॥
जहां जलते हैं सब तन । उसमें जो “मैं” होता अर्जुन ।
उस “मैं” आत्मापे आक्रमण । होता है वह ॥ ९९ ॥
तथा ऐसा अभिचार होता कहां । उपद्रव उसके हो जहां तहां ।
मैं रूप चैतन्य होता वहां वहां । उसे होती पीड़ा ॥ ४०० ॥
रहते हैं जो अभिचारसे भिन्न । उनपे दोष-दृष्टिके पाषाण ।
फेंकते रहते हैं जो अर्जुन । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥
तभी मैं उनको दंड देता हूँ—
सती तथा जो है सज्जन । दानशील याज्ञिक जन ।
तपस्वी अद्भुत महान । संन्यासी भी ॥ २ ॥
भक्त या होते हैं महात्मा । होते जो मेरा निज-धाम ।
आधार लेता नित धर्म । उनके सदनका ॥ ३ ॥
द्वेषसे भर ऐसों पर । कालकूटसे भरकर ।
अपशब्दोंके तीखे तीर । चलाते रहते हैं ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६२
तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥
इसभांति सभी प्रकारसे । बरतते हैं मेरे शत्रुसे ।
सुन तू मैं उन पापियोंसे । कैसे निपटता हूं ॥ ५ ॥
मानव-देहका ले आश्रय । करते हैं जगतका क्षय ।
वह पदवी मैं धनंजय । छीन लेता हूं ॥ ६ ॥
तथा फेंकता क्लेश-ग्रामके घूरे पर । अथवा भव-पुरके पन-घाट पर ।
उस तम-योनिमें ऐसे मूढोंको फिर । देता हूं जन्म ॥ ७ ॥
फिर आहारके नामसे जहां । घास भी नहीं उगता है वहां ।
व्याघ्र वृश्चिक सब आते कहां । वहां डालता ॥ ८ ॥
भूखके दुःखसे तडपते । अपने आपको तोड खाते ।
जनमते मरते रहते । उस स्थानपे ॥ ९ ॥
अपने ही विषसे जिनके । चर्म हैं जलते शरीरके ।
बिलमें रहते सिकुडके । सांप बन वह ॥ ४१० ॥
श्वास लेनेमें है जाता । जिनका समय पार्थ ।
आराम नहीं मिलता । उन दुर्जनोंको ॥ ११ ॥
ऐसे करोडों कल्प । गिननेमें है अल्प ।
उतना काल खप- । जाता उनका ॥ १२ ॥
उनको जिस स्थानपे है जाना । पहला पडाव है यह स्थान ।
आगेके होते हैं अति दारुण। दुःख उनके ॥ १३ ॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौंतेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥
द्वेषी क्रूर तथा पापी जगमें हीन जो जन ।
उन्हें मैं फेंकता नित्य आसुरी योनिमें फिर ॥ १९ ॥
आसुरी योनियां पाके अनेक जन्म जन्ममें ।
मुझसे न मिले ही वे पाते जाते अधोगति ॥ २० ॥
६६३ देवासुर-संपद्विभाग-योग
सुन उन्होंने इस भांति । कमाके आसुरी संपत्ति ।
पायी है ऐसी अधोगति । उसके बदलेमें ॥ १४ ॥
फिर व्याघ्रादि तामस । योनियोंमें है अल्पसा ।
देहधारण ढारस । मिलता है ॥ १५ ॥
वह भी मैं फिर छीन लेता । तब तमका ढेर बनाता ।
अंधारभी काला हो जाता । वहां पहुंचके ॥ १६ ॥
आसुरी लोगोंके लिये ज्ञानेश्वरकी करुणा—
तब उससे पाप भी घिनाता । नरक भी उससे भय खाता ।
थकान श्रमसे मूर्छित होता । थककर जो ॥ १७ ॥
इनसे मल भी मलता । ताप भी इनसे तपता ।
इनके नामसे डरता । महा भय भी ॥ १८ ॥
पाप भी इनसे उकताता । अशुभ इनसे है अशोभता ।
भ्रष्टत्व भी इनसे है डरता । भ्रष्टाचारसे ॥ १९ ॥
विश्वमें जो अति हीन । अधम तम अर्जुन ।
भोगते वे सब स्थान । तामस योनिके ॥ ४२० ॥
रोती है वाचा कहनेमें कथा । स्मरणसे मन पीछे हठता ।
मूर्खोंने कितना जोडा है पार्था । यह पाप सारा ॥ २१ ॥
इसलिये कहू ये असुर । संपत्ति पोसते भयंकर ।
होती ऐसी अधोगति घोर । केवल मात्र ॥ २२ ॥
इसलिये तुझे धनुर्धर । जहां संपदा होती आसुर ।
मुडना भी कभी उस ओर । है अनुचित ॥ २३ ॥
तथा दंभादि छ दोष । करते हैं जहां वास ।
तजना है सहवास । उनका सदैव ॥ २४ ॥
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
काम क्रोध तथा लोभ करते आत्म-नाश जो ।
तीन ये नरक-द्वार टालना इनको नित ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६४
काम-क्रोधसे सदा-सर्वत्र दूर रहना चाहिये—
काम-क्रोध तथा लोभ । फूटते तीनोंमें कोंभ ।
फलता वहां अशुभ । जान तू यह ॥ २५ ॥
समस्त दुःखोंका अर्जुन । करानेके लिये दर्शन ।
नियुक्त किये हैं ये तीन । पथ-दर्शक ॥ २६ ॥
या पापियोंको नरक-भोगमें । पहुँचानेके लिये जगतमें ।
पातकोंकी वीर परिषदमें । श्रेष्ठ ये तीन ॥ २७ ॥
रौरवादि नरक महान् । सुनाते नहीं कमी पुराण ।
जब तक न उठते तीन । हृदयमें ये ॥ २८ ॥
अपाय होते इससे सुलभ । होता है यातनाओंका लाभ ।
“हानी” हानी नहीं होती अशुभ । हानी ये तीन ॥ २९ ॥
क्या कहू मैं धनुर्धर । कहे ये निकृष्ट चोर ।
तथा नरकका द्वार । खुला हुवा ॥ ४३० ॥
काम-क्रोध लोभमें जीव । पोसता है जो निज-भाव ।
सम्मान पाता है पांडव । नरक-सभामें ॥ ३१ ॥
इसीलिये तू पुनःपुन । काम-क्रोध लोभ ये तीन ।
दक्ष रहके निशिदिन । तजना पार्थ ॥ ३२ ॥
एतैर्विमुक्तः कौंतेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
पहले छोड इनका साथ । फिर है धर्मादि पुरुषार्थ ।
करनेकी बात है पार्थ । सोचना सारी ॥ ३३ ॥
हृदयमें ये तीन हैं जागृत । तबतक भलाई होगी प्राप्त ।
ऐसी नहीं सुनी गयी है बात । देवोंसे भी ॥ ३४ ॥
तमके द्वार ये तीन टालके छूटता जब ।
कल्याणमार्गसे जाके पाता है गति उत्तम ॥ २२ ॥
६६५ देवासुर-संपद्विभाग-योग
अपनेसे है जिसकी प्रीति । तथा है आत्म-नाशकी भीति ।
न करना उसको संगति । इन तीनोंकी ॥ ३५ ॥
गलेमें बांधा कर पाषाण । करें सिंधुका अतिक्रमण ।
या जीनेके लिये है भोजन । करना कालकूट ॥ ३६ ॥
इन काम-क्रोध लोभका साथ । कार्य सिद्धिमें ऐसा है सतत ।
इसीलिये जड़-मूलसे पार्थ । मिटाना इसे ॥ ३७ ॥
इन तीनोंकी जब । कड़ी टूटेगी तब ।
अपनी राह सब । होगी प्राप्त ॥ ३८ ॥
त्रिदोषके छोडनेसे शरीर । त्रिकूटिका मिटनेसे नगर ।
त्रिदाह मिटनेसे है अंतर । शांत होता वैसे ॥ ३९ ॥
वैसे कामादिक जो ये तीन । तजते वे सुख पाते जान ।
मोक्ष-मार्गमें वे ही सज्जन- । संग पाते हैं ॥ ४४० ॥
सत्संगसे फिर प्रबल । तथा ले सत्शास्त्रका बल ।
पार होते वन सकल । जन्म-मृत्युके ॥ ४१ ॥
जिसमें आत्मानंद पूर्ण । बसता है वह सदन ।
तथा पाता है वह पट्टन । गुरु-कृपाका ॥ ४२ ॥
प्रिय-वस्तुओंकी जो परिसीमा । मिलती है वहां माउली आत्मा ।
तथा नहीं बजता है डिंडिम । संसारका वहां ॥ ४३ ॥
ऐसे जो काम-क्रोध लोभ । झाड़कर खड़ा है तब ।
स्वामी बन पाता है लाभ । इतने सारे ॥ ४४ ॥
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परांगतिम् ॥ २३ ॥
नहीं भाता जिसे यह कुछ । कामादिक ही है सब कुछ ।
इसीमें जाता है श्वपच । आत्मघाती वह ॥ ४५ ॥
छोड जो शास्त्रका मार्ग करता स्वैर-वर्तन ।
न पाता सिद्धिका मार्ग तथा सुख न सद्गति ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६६
जगमें जो समान सरूप । हिताहित दिखाता है दीप ।
वह अमान्य करता बाप- । वेदको जो ॥ ४६ ॥
आसुरी स्वैराचारी इह-परमें सुख शांति नहीं पा सकता—
नहीं करता विधिका पालन । न है जिसको आत्म-हित भान ।
बढ़ाता जाता है भूख नित अर्जुन । इंद्रियोंकी जो ॥ ४७ ॥
कामादिकका आश्रय नहीं छोड़ूँगा । अपने वचनका पालन करूंगा ।
कहकर स्वेच्छाचार रत रहेगा । कुमार्गी जो ॥ ४८ ॥
मुक्ति-प्रवाहका नीर । नहीं पा सकेगा वह नर ।
स्वप्नमें भी यह धनुर्धर । असंभव जान ॥ ४९ ॥
गया ही उसका पर-लोक । किंतु सुख भी वह ऐहिक ।
भोग नहीं सकता तू देख । भली भांति ॥ ४५० ॥
मछलीकी आशासे ब्राह्मण । बन गया जो धीवर मान ।
वहां भी उसे नास्तिक जान । न लेंगे अपनेमें ॥ ५१ ॥
विषयका लोभ धरकर । खोता पारलौकिक जो नर ।
उसको यहांसे भी सत्वर । ले जाती मृत्यु ॥ ५२ ॥
ऐसे पर-लोकमें ना स्वर्ग । यहां भी नहीं सुखोपभोग ।
तब आयेगा कैसा प्रसंग । मोक्षका वहां ॥ ५३ ॥
तमी करके काम का बल । सुख-भोग चाहते सकल ।
वे दोनोंमें होते हैं विफल । न होता उद्धार ॥ ५४ ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
वेद आज्ञाके अनुसार कर्तव्य करते जा—
इस कारणसे अर्जुन । चाहता जो अपना कल्याण ।
वेदकी आज्ञाका उल्लंघन । न करें कभी ॥ ५५ ॥
व्यवस्था जान लेनेमें यहां कार्य अकार्यकी ।
जानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको ॥ २४ ॥
३६७ देवासुर-संपद्विभाग-योग
जान कर पतिका मत । उसपे चलके सतत ।
सहज पाती आत्म-हित । पतिव्रता जैसे ॥ ५६ ॥
अथवा श्रीगुरुका वचन । करके नित परिपालन ।
कर लेना है आत्म-मंचन । अपना वैसे ॥ ५७ ॥
अंधेरेमें रखा कोई सामान । प्राप्त करलेना हो तो अर्जुन ।
सदा दीप करते हैं जान । आगे वैसे ॥ ५८ ॥
पुरुषार्थोंका संपूर्ण । स्वामी होना तो अर्जुन ।
श्रुति स्मृतिके वचन । मानना वंद्य ॥ ५९ ॥
शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य सुख भोग भी तृण मानना ।
विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द भी विरुद्ध ॥ ४६० ॥
ऐसी जिसकी वेदकी निष्ठा । स्थिर हुई तो देख सुभटा ।
होगी कैसी आहितकी भेट । कहां किसको ॥ ६१ ॥
अहितसे जो निकालती । हित करके जो बढाती ।
ऐसी दूसरी न दीखती । श्रुति-मातासी ॥ ६२ ॥
कराती यह ब्रह्मसे मिलन । न करना कभी अवहेलन ।
कर तू इसका सदा अर्जुन । विशेष आश्रय ॥ ६३ ॥
आज तू यहां है पार्थ । शास्त्रोंको सुनले सार्थ ।
जन्म लिया है हितार्थ । धर्म-कार्यके ॥ ६४ ॥
तथा धर्मानुज नामसे । बोध होता सहजतासे ।
इससे भिन्न कुछ ऐसे । करना नहीं ॥ ६५ ॥
कार्याकार्यका विवेक । करना शास्त्रोंको देख ।
अकृत्य जो कुछ देख । तजना उसे ॥ ६६ ॥
तथा जो कुछ है करणीय । दृढतासे उसका आश्रय ।
करके संपन्न धनंजय । करना उसको ॥ ६७ ॥
विश्व-प्रामाण्यकी जो है मुरी । आज तेरे हाथमें सुबुद्धी ।
लोक-संग्रहार्थ तू त्रिशुद्धी । योग्य है इससे ॥ ६८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६८
सोलहवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत समालोचन—
ऐसे आसुरी भाव संपूर्ण । तथा उसके सब लक्षण ।
कहे मुक्त होनेके साधन । कृष्णने पार्थसे ॥ ६९ ॥
इस पर वह पुत्र पांडुका । पूछेगा भाव अपने जीवका ।
सुनो वह सब दे चैतन्यका । कान बनाकर ॥ ४७० ॥
व्यास कृपासे संजय सुनाता । तथा इसे कुरु-नृप सुनता ।
श्रीगुरु कृपासे मैं सुनाता । इसको यहां ॥ ७१ ॥
आप संत-जन मेरी ओर । कृपा-वर्षा करें यहां पर ।
मैं आपकी मान्यतानुसार । बनूंगा स्वामी ॥ ७२ ॥
इसीलिये निज अवधान । मुझको देना पसायदान ।
जिससे बनूं सामर्थ्यवान । कहता ज्ञानदेव ॥ ७३ ॥
गीता श्लोक २४
ज्ञानेश्वरी ओवी ४७३
ॐ
६६९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
१७
श्रद्धा - निरूपण - योग
गणेशरूप गुरुवंदन—
विश्व-विकसित-मुद्रा । छोड तेरी योग-निद्रा ।
नमन जीव-गणेंद्रा । सद्गुरु तुझे ॥ १ ॥
त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व दुर्गमें अटका गया ।
वह आत्मा-शत्रुने छुडालिया । तेरे स्मरणसे ॥ २ ॥
तभी शिवसे करके तुलना । जान लिया तू है अति महान ।
मुमुक्षु - जीव करता तारण । तभी तू है हलका ॥ ३ ॥
तेरे विषयमें जो मूढ़ । उनको है तू वक्र-तुंड ।
ज्ञानियोंके लिये अखंड । सन्मुख ही तू ॥ ४ ॥
देखनेमें छोटी देवकी दृष्टि । किंतु मिलनोन्मिलनमें सृष्टि ।
करती सृष्टि लय दोनों गोष्टि । सहज लीलासे ॥ ५ ॥
प्रवृत्ति कर्णकी हलचलसे । छूटे मद गंधानिलसे ।
पूजा करते नील कमलसे । जीव-भ्रमरोंके ॥ ६ ॥
निवृत्ति कर्णके हिलनेसे फिर । पूजा वह सहज व्यर्थ होकर ।
दिखाता तब अपना अलंकार । खुले शरीरका ॥ ७ ॥
मानो वामांगीका लास्य विलास । जो है वही जगद्रूप आभास ।
तांडव नृत्य-कलाका विलास । दिखाता है तू ॥ ८ ॥
देख होता है यह चकित । होता है तू जिसका भी आप्त ।
आप्त व्यवहारसे विरत । होता है वह ॥ ९ ॥
मिटाता तू बंधनका ठाव । तमी तू जगद्बंधु यह भाव ।
तेरे लिये योग्य यह वैभव- । युत नाम ॥ १० ॥
द्वैतके नामसे जिसको । देह भी न रहे उसको ।
अपनासा किये तुमको । देवराय ॥ ११ ॥
पानेके लिये तुझको । दौड़ते जाते उनको ।
रखता सदा दूरको । अपनेसे तू ॥ १२ ॥
ध्यानसे लाता है जो मनमें । न होता तू उसके गांवमें ।
तुझे भूलता तो स्व-बोधमें । उसका होता तू ॥ १३ ॥
तू सिद्ध है जो न जानता । दिखाता वह सर्वज्ञता ।
वेदोंकी भी ऐसी जो वार्ता । नहीं सुनता तू ॥ १४ ॥
तेरा राशि-नाम है मौन । तब कैसे करूं स्तवन ।
देखना सब मिथ्या जान । नमन वैसे कैसे ॥ १५ ॥
यदि मैं सेवक बनना चाहता । भेद करनेसे मैं द्रोही बनता ।
इसलिये कुछ भी नहीं हो पाता । आपका मैं ॥ १६ ॥
सर्वथा कुछ भी नहीं होना । तुझ अद्वयकी प्राप्ति होना ।
तेरा यह मार्ग मैंने जाना । आराध्य-लिंग ॥ १७ ॥
अपनेको पूर्ण विलीन । करके रसमें लवण ।
भजना है वैसे नमन । मौनसे मेरा ॥ १८ ॥
रीता कुंभ जैसे सिंधुमें जाता । तथा पूर्ण भरके निकलता ।
अथवा दीप संगसे है बनता । बात भी दीप ॥ १९ ॥
करके तुझे मैं प्रणिपात । पूर्ण हुवा श्रीनिवृत्तिनाथ ।
करूंगा अब वह गीतार्थ । प्रकट मैं देव ॥ २० ॥
सोलवे अध्यायका समारोप और सत्रहवीकी भूमिका—
सोलहवे अध्यायके अंतमें । उसके समाप्तिके श्लोकमें ।
ऐसा कहा निश्चितपनमें । परमात्माने ॥ २१ ॥
कार्याकार्यकी है जो व्यवस्था । आचरण करनेमें पार्था ।
मानना तुझे शास्त्र सर्वथा । प्रमाण एक ॥ २२ ॥
६७१ श्रद्धा-निरूपण-योग
तब अर्जुनका मानस । कहता यह ऐसा कैसा ।
शास्त्रके बिना नहीं ऐसा । कर्मसे मुक्ति ॥ २३ ॥
तक्षकके फन परसे । निकाल लेना मणि कैसे ।
अथवा तोडें बाल कैसे । सिंहकी नाकका ॥ २४ ॥
मणि तब उसमें पिरोना । तथा अलंकारसे सजना ।
नहीं तो क्या वैसे ही रहना । खुले गलेसे ॥ २५ ॥
शास्त्रोंकी जो मत-भिन्नता । उसे कहो कौन जानता ।
होगी कैसी एक-वाक्यता । फलदायी उसकी ॥ २६ ॥
होने पर भी एक-वाक्यता । होगी क्या आचरण शक्यता ।
तथा जीवन होगा विस्तृत । इतना कैसे ॥ २७ ॥
तथा शास्त्र अर्थ देश काल । इन चारोंका जो एक फल ।
मिलेगा ऐसा योग सकल । किसको कब ॥ २८ ॥
तभी शास्त्रोचित घड़ना । असंभव है यह जान ।
अज्ञानी जो मुमुक्षु जन । उसकी गति क्या ? ॥ २९ ॥
पूछनेमें यह अर्जुन । करता है प्रस्ताव जान ।
आरंभ कहांसे कथन । करनेका ॥ ३० ॥
सबके विषयमें जो वितृष्ण । तथा सकल कलामें प्रवीण ।
कृष्णको आश्चर्य है जो कृष्ण । अर्जुनत्वमें ॥ ३१ ॥
शौर्यसे जुड़ा हुवा आधार । तथा सोम-वंशका शृंगार ।
सुखादिके लिये उपकार । जिसकी लीला ॥ ३२ ॥
प्रज्ञाका है जो प्रियतम । ब्रह्म विद्याका है विश्राम ।
सहचर औ' मनोधर्म । देवका है जो ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
अर्जुनने कहा
शास्त्रकी विधिको छोड श्रद्धासे पूजते जन ।
कौन सी उनकी निष्ठा सत्व या रज या तम ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७२
An exact line-by-line transcription of the text from the image:
शास्त्ररहित श्रद्धापूर्वक पूजनेवालोंकी क्या गति होती है?--
अर्जुन कहे तमाल-श्याम । इंद्रियोंसे गोचर तू ब्रह्म ।
करते हैं तेरे शब्द-ग्राम । साशंक हमको ॥ ३४ ॥
अन्य नहीं शास्त्रके बिन । जीवका स्व-मोक्ष साधन ।
ऐसे कहता तू श्रीकृष्ण । किसभांति ॥ ३५ ॥
यदि न मिलता ऐसा देश । तथा नहीं काल अवकाश ।
करना ऐसा शास्त्राभ्यास । वह भी दूर ॥ ३६ ॥
तथा अभ्यासके जो साधन । वह भी प्राप्त नहीं है जान ।
ऐसेमें करें क्या कैसे कौन । अभ्यास उसका ॥ ३७ ॥
अनुकूल नहीं प्राचीन । प्रज्ञाका साथ जिसे जान ।
दूर है शास्त्र-संपादन । उसके लिये ॥ ३८ ॥
अजी ! मानते शास्त्रका विषय । नहीं मिलता एक भी आश्रय ।
इसीलिये जिन्होंने छोड दिया । शास्त्रका विचार ॥ ३९ ॥
किंतु निर्धार कर शास्त्र । अर्थानुष्ठानसे पवित्र ।
वास करते जो पात्र । सुख पूर्वक ॥ ४० ॥
उनका-सा हमको होना । ऐसे सोच चित्तमें जान ।
करते हैं आलंबन । उस मार्गका ॥ ४१ ॥
देखके पाठके अक्षर । करे बालक अनुसर ।
अंधा चलता आगे कर । भलेको जैसे ॥ ४२ ॥
वैसे सर्व शास्त्र निपुण । उनका देख आचरण ।
चलते हैं जान प्रमाण । श्रद्धासे आप ॥ ४३ ॥
फिर शिवाविक पूजन । तथा भूम्यादि महादान ।
अग्नि-होत्रादि जो यजन । करते श्रद्धासे ॥ ४४ ॥
उन्हे कह सत्य रज तम । किसमें गिनता पुरुषोत्तम ।
मिले उनको कौन गति हम । जाने कैसे ॥ ४५ ॥
वैकुंठ पीठका तब लिंग । निगम-पद्मका जो पराग ।
जिसकी अंग छाया है जग । जीवित जान ॥ ४६ ॥
(३२) ६७३: श्रद्धा-निरूपण-ओवि
कालसे सहज प्रचंड । तथा जो लोकोत्तर प्रौढ़ ।
अद्वितीय परम गूढ़ । आनंद-घन जो ॥ ४७ ॥
इन गुणोंसे कीर्तिमान । जहां यह सामर्थ्य पूर्ण
बोलता ऐसे जो श्रीकृष्ण । स्वमुखसे यहां ॥ ४८ ॥
भगवान उवाच
त्रिविधा भवति श्रध्दा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
श्रध्दा भी तीन प्रकारकी होती है—
कहता है श्रीहरि पार्थ ! तेरा भाव है मुझे ज्ञात ।
बाधक होती है बात । शास्त्राभ्यासकी ॥ ४९ ॥
केवल साधन मान श्रद्धा । पाना चाहो तो परम-पद ।
नहीं वह वैसे प्रबुद्ध । अज्ञात बात ॥ ५० ॥
श्रद्धा कहनेसे ही पार्थ । नहीं पायेगा सकलार्थ ।
द्विज क्या अंत्यजके साथ । न होगा अंत्यज ॥ ५१ ॥
हुवा भी यदि गंगोदक । मद्यके मटकेमें रख ।
लायेगा तो हो सके देख । पी सकता क्या ? ॥ ५२ ॥
चंदन होता है शीतल । किंतु अग्नि-ज्वालसे मिल ।
पकडा हुवा हाथ जल- । जायेगा न ? ॥ ५३ ॥
हीन कस सोनेके साथ । पुट दिया तो वह पार्थ ।
देगा शुद्ध सोनेका अर्थ । कभी वह ? ॥ ५४ ॥
ऐसे है श्रद्धाका जो स्वरूप । होता शुद्ध अपनेमें आप ।
किंतु मिलता है परंतप । जीवको जब ॥ ५५ ॥
श्रीभगवानने कहा
पाता स्वभावसे प्राणि श्रद्धा तीन प्रकारकी ।
सुन सात्विक है होती तथा राजस तामस ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७५
स्वभावसे ही प्राणि जात । अनादि पापके पड हाथ ।
बन गये त्रिगुणके साथ । एक रूपसे ॥ ५६ ॥
उसमें पाते वे अवनति । तथा चाहते हैं वे उन्नति ।
होती है तब वैसी ही वृत्ति । जीवोंकी सब ॥ ५७ ॥
वृत्ति-सा तब संकल्प करते । संकल्प-सा सब कर्म करते ।
तथा कर्मानुसार ही करते । शरीर-धारण ॥ ५८ ॥
बीज मिटकर वृक्ष होता । फिर वृक्ष बीजमें समाता ।
कल्पोंसे ऐसे चलता आता । किंतु न नाशता वृक्ष ॥ ५९ ॥
उसी भांति है यहां अपार । होता रहता है जन्मांतर ।
त्रिगुणत्व अव्यभिचार । प्राणियोंके साथ ॥ ६० ॥
इसीलिये प्राणियोंके साथ । रहती है श्रद्धा जो सतत ।
जैसे होते गुण वैसे पार्थ । यह जान तू ॥ ६१ ॥
बढता कभी सत्वशुद्ध । ज्ञानकी चाह होती सिद्ध ।
किंतु दोनों होते विरुद्ध । यहां तब ॥ ६२ ॥
होती तब सत्य विषयक । श्रद्धा जो मोक्ष-फल दायक ।
किंतु रज तम सहायक । होंगे क्या कभी ॥ ६३ ॥
सत्वके बलको तोड कर । चढता रज आकाश पर ।
होती तब श्रद्धा कूडा घर । कर्म-उसका झाडू ॥ ६४ ॥
फिर उठती तमकी आग । करती है वह श्रद्धा भंग ।
तब चाहता विषय-भोग । भोगनेमें निषिद्ध ॥ ६५ ॥
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३
ऐसे है सत्व रज तम । श्रद्धा-रूप जान सुधर्म ।
नहीं रखता जीव ग्राम । इससे कुछ भिन्न ॥ ६६ ॥
स्वभाव जिसका जैसे श्रद्धा वैसे मिले उसे ।
श्रद्धासे ही बना जीव श्रद्धा-सा वह भी रहा ॥ ३
६७५ श्रद्धा-निरूपण-योग
इसीलिये श्रद्धा स्वाभाविक । रहती सदा त्रिगुणात्मक ।
रज तम तथा है सात्विक । भेद यहां जो ॥ ६७ ॥
जिस भांति है जीवन उदक । किंतु होता है विषमें मारक ।
अथवा होता है मिर्चमें तीव्र । ईखमें मधुर ॥ ६८ ॥
ऐसे पाता है जो जनम । या मरण साथ ले तम ।
उसका होता परिणाम । उसीका रूप ॥ ६९ ॥
जैसे काजल या हो मसी । उसमें न भिन्नता ऐसी ।
वैसे ही श्रद्धा जो तामसी । या तममें नहीं ॥ ७० ॥
वैसे श्रद्धा तमोगुणीमें । होती है तमके रूपमें ।
पूर्ण रूपसे सात्विकीमें । होती है सात्विक ॥ ७१ ॥
ऐसे है यह सकल । बसा है ब्रह्मांड गोल ।
श्रद्धा-मात्रसे केवल । ढाल करके ॥ ७२ ॥
किंतु गुणत्रयके कारण । किया त्रिविध-रूप धारण ।
श्रद्धाने भी यह साधारण । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥
फूलसे जैसे वृक्ष जाना जाता । या बोलसे मानस जाना जाता ।
या सुख दुःखसे जाना-जाता । पूर्व-संचित ॥ ७४ ॥
वैसे अब पांडुकुमार । जानना श्रद्धाके प्रकार ।
कहता हूं लक्ष्य दे कर । सुन तू सब ॥ ७५ ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजंते तामसा जनाः ॥ ४ ॥
श्रद्धाका विविध रूप—
जिनकी सात्विक श्रद्धा । लेकर बनता बांधा ।
सदैव उनकी मेधा । रहती स्वर्गपे ॥ ७६ ॥
सत्वस्थ पूजते देव यक्ष राक्षस राजस ।
मृत प्रेतादि जो सारे पूजते लोग तामस ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७६
विद्या सभी वे पढ़ते । यज्ञ-क्रियायें करते ।
ऐसे वे जाके रहते । देव-लोकमें ॥ ७७ ॥
तथा श्रद्धा जो राजस । लेकर बने वीरेश ।
भजते हैं वे राक्षस । यक्षादिक सब ॥ ७८ ॥
श्रद्धा लेकर जो तामस । आये कहूंगा तेरे पास ।
केवल वे अति कर्कश । बने पापका ढेर ॥ ७९ ॥
जीव-वध कर अमंगल । बलि देके भूत-प्रेत कुल ।
स्मशानमें जाके संध्याकाल । पूजते जो ॥ ८० ॥
तमो-गुणका लेकर सार । बनाये जाते हैं जो नर ।
जान वे तमोगुणका घर । श्रद्धाका जो ॥ ८१ ॥
ऐसे हैं ये तीन लक्षण । जगमें दीखते हैं जान ।
यह मैं कहता अर्जुन । इसीलिये तुझे ॥ ८२ ॥
सात्विक श्रद्धावाला मनुष्य शास्त्रोंका अनुकरण करता है—
यह जो है सात्विक श्रद्धा । जतन करना प्रबुद्धा ।
तथा है दोनोंके विरुद्ध । खड़ी करना ॥ ८३ ॥
यह सात्विक मति जिसकी । जोपासना करता उसकी ।
उसको नहीं मोक्ष-सिद्धिकी । कमी भीति ॥ ८४ ॥
नहीं सीखा वह ब्रह्म-सूत्र । तथा नहीं पढा कोई शास्त्र ।
सिद्धांत नहीं होता स्वतंत्र । उनके पास ॥ ८५ ॥
किंतु श्रुति-स्मृतिका अर्थ । बनते हैं वे स्वयं मूर्त ।
अनुष्ठानसे वे यथार्थ । देते हैं जगतको ॥ ८६ ॥
उनके आचरणके जो चरण । देख सात्विकी श्रद्धा अनुकरण ।
करके पाते फल असाधारण । निश्चित रूपसे ॥ ८७ ॥
दीप जलाता कोई कष्टसे जैसे । दूसरा दीप जला लेता उससे ।
दीप करेगा क्या कमी प्रकाशसे । उसको वंचित ॥ ८८ ॥
तथा किसीने धन अपार । व्यय कर बांधा अच्छा घर ।
अतिथि उसमें रह कर । सुख नहीं पाता क्या ? ॥ ८९ ॥
६७७ श्रद्धा-निरूपण-योग
जाने दो कोई बांधता सरोवर । उसीकी तृषा हरता है क्या नीर ।
रसोई पाकानेवालेको ही घर । मिलता क्या अन्न ॥ ९० ॥
इससे अधिक क्या कहूंगा । गौतमकी लाई हुई गंगा ।
उससे वंचित है क्या जग । कह तू मुझसे ॥ ९१ ॥
तमी अपना अधिकार जान । करता जो शास्त्रोंका अनुष्ठान ।
श्रद्धासे उसका अनुकरण । कर तरता मूर्ख ॥ ९२ ॥
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा-तप—
शास्त्रके नामसे भी जो पार्थ । न जानते आरंभकी बात ।
शास्त्रज्ञोंको रखते सतत । गांवके बाहर ॥ ९३ ॥
देख कर बडोंकी बात । करते हैं ठठोली तात ।
तथा देखके वे पंडित । बजाते चुटकियां ॥ ९४ ॥
करके बड़ा अभिमान । आचरते तपाचरण ।
दंभसे भरकर पूर्ण । पाखंड रचते ॥ ९५ ॥
दूसरोंके शरीरमें शस्त्र । चुभाके छील उसके गात्र ।
रक्तसे लेते प्रणीत-पात्र । भर भर कर ॥ ९६ ॥
वह रक्त आगमें गिराते । भूतके मुखमें भी लगाते ।
तथा बालकोंका बलि देते । उन भूतोंको ॥ ९७ ॥
आग्रहके बलपर । क्षुद्र देवताको धर ।
करते हैं सत्र घोर । अपाचारका ॥ ९८ ॥
अजी ! करके स्वपर पीडन । तम क्षेत्रमें बीज बोते जान ।
आगे पाते हैं वही वे अर्जुन । फलके रूपसे ॥ ९९ ॥
शास्त्र-निषिद्ध जो घोर दंभसे करते तप ।
अहंतासे भरे सारे काम राग बली जन ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७८
पडा है समुद्रमें पार्थ । तैरने नहीं जो समर्थ ।
तथा नहीं उसके हाथ । और पांव भी ॥ १०० ॥
या वैद्यका द्वेष कर । औषध ठुकरा कर ।
होगा कैसे रोग दूर । किसीका कभी ॥ १ ॥
करके आंखोंसे विरोध । उन्हें फोडले प्रतिशोध ।
पड़ा रहता बन अंध । कोनेमें कहीं ॥ २ ॥
इसी प्रकार ये असुर । शास्त्रोंका करके धिःकार ।
करते हैं बन-संचार । अविवेकसे ॥ ३ ॥
काम जो कराता वह करते । क्रोध मरवाते उसे मारते ।
मुझे दुःखके गढेमें गाढ़ते । सभी ये लोग ॥ ४ ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
अपने या पराये देहको । देते हैं वे दुःख जो उसको ।
भोगना होता मुझ आत्माको । पांडुकुमार ॥ ५ ॥
वाचाके भी अंचलसे । स्पर्श न करता जिसे ।
तजनेके लिये उसे । कहना पडा ॥ ६ ॥
स्पर्शसे जैसे प्रेत हटाते । शब्दसे चांडालको तजते ।
हाथ लगाकर जैसे धोते । मलको वैसे ॥ ७ ॥
वहां शुद्धिके ही हेतुसे । लेप नहीं मानते वैसे ।
उन्हे तजनेके हेतुसे । कहा यह यहां ॥ ८ ॥
होगा तुझे जब दर्शन । असुरोंका तब अर्जुन ।
करना मेरा ही स्मरण । प्रायश्चित्त रूप ॥ ९ ॥
तभी श्रद्धा जो सात्विक । जीव-भावसे हो एक ।
जतन करना नेक । सर्वतोपरी ॥ ११० ॥
गलाते मुझ आत्माको सोखके देह-धातुको ।
ऐसे विवेक-हीनोंकी निष्ठा है जान आसुरी ॥ ६ ॥
६७९ श्रद्धा-निरुपण-योग
करना सदैव ऐसा संग । सत्व-पोषणका हो अंग ।
तथा सत्व-वृद्धिका हो भाग । लेना ऐसा अन्न ॥ ११ ॥
साधकके लिये आहारका महत्व—
जो है अति-स्वाभाविक । स्वभाव वृद्धि कारक ।
आहारसे नहीं नेक । साधन शक्त ॥ १२ ॥
प्रत्यक्ष देख तू यहां वीर । भला मनुष्य सुरा पीकर ।
करता कैसे मत्त होकर । उसी क्षणमें ॥ १३ ॥
अथवा जो मनमाने अन्न-सेवन । करता तब वात-पित्तके कारण ।
या नव-ज्वरमें दूध होता अर्जुन । दुःख-दायक ॥ १४ ॥
अथवा अमृत जैसे । टालता मरण वैसे ।
तथा है विष लेनेसे । आती मृत्यू ॥ १५ ॥
वैसे ही लेनेसे जो आहार । लेता है धातु वही आकार ।
धातु जैसे वैसे ही अंतर । करता भाव पुष्ठ ॥ १६ ॥
या तपनेसै जैसे बर्तन । तपता अंदर जल जान ।
वैसे धातु वश है अर्जुन । चित्त-वृत्ति ॥ १७ ॥
इसीलिये सात्विक सेवन । करनेसे होगा वृद्धि सत्व-गुण ।
तथा रज तम रसका सेवन । बढाता है वही ॥ १८ ॥
तमी कौन सात्विक आहार । रज तमका क्या क्या आकार ।
कहता हूं यह धनुर्धर । आदरसे सुन ॥ १९ ॥
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥
आहारका विविध रूप—
उसी भांतिसे है आहार । हुए कैसे तीन प्रकार ।
तुझसे यह धनुर्धर । कहूंगा सुन ॥ १२० ॥
आहार भी सभीका है तीन भांति यथा रुचि ।
यज्ञ दान तपमें भी कहता भेद तू सुन ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८०
रुचि है कैसे खानेवालेकी । निष्पत्ति होती वैसे अन्नकी ।
तथा रुचि होती है गुणोंकी । दासी जान ॥ २१ ॥
जीव जो है कर्त्ता औ, भोक्ता । गुणोंसे वह स्वभावता ।
प्राप्त करके त्रिविधता । बरतता है ॥ २२ ॥
इसीलिये त्रिविध आहार । यज्ञ करता तीन प्रकार ।
तप दान आदि भी व्यापार । त्रिविध जान ॥ २३ ॥
पहले आहार लक्षण । कहता हूं सुन अर्जुन ।
स्पष्टतासे कर वर्णन । इस समय ॥ २४ ॥
आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ ८ ॥
सात्विक आहारका विवेचन—
सात्विक गुणकी ओर जब । दैवसे भोक्ता पढ़ता तब ।
उसका रस बढ़ता सब । मधुर रसमें ॥ २५ ॥
होते हैं जो रस-भरित । मधुर रसके पदार्थ ।
तथा मधुर स्निग्ध पार्थ । परिपक्व सहज ॥ २६ ॥
आकारमें होते सुंदर । स्पर्शमें भी होते मधुर ।
जीभको स्नेह मधुर । उसका स्पर्श ॥ २७ ॥
रससे जो भरित । द्रव-भावसे युक्त ।
अग्नि-स्पर्शसे मुक्त । ढीली छालका ॥ २८ ॥
अल्प-गात्र परिणाम महत्तर । होता जैसे गुरु-मुखका अक्षर ।
वैसे दीखता अल्प होता अपार । तृप्ति देनेमें ॥ २९ ॥
रुचिमें होता जैसे मधुर । स्वास्थ्यमें भी होता हितकर ।
ऐसा अन्न होता प्रियकर । सात्विकोंको ॥ १३० ॥
सत्व प्रीति सुख स्वास्थ्य आयुष्य बल-वर्धक ।
रसाल मधुर स्निग्ध स्थिर आहार सात्विक ॥ ८ ॥
६८१ श्रद्धा-निरूपण-योग