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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 742

१७
श्रद्धा - निरूपण - योग
गणेशरूप गुरुवंदन—
विश्व-विकसित-मुद्रा । छोड तेरी योग-निद्रा ।
नमन जीव-गणेंद्रा । सद्गुरु तुझे ॥ १ ॥
त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व दुर्गमें अटका गया ।
वह आत्मा-शत्रुने छुडालिया । तेरे स्मरणसे ॥ २ ॥
तभी शिवसे करके तुलना । जान लिया तू है अति महान ।
मुमुक्षु - जीव करता तारण । तभी तू है हलका ॥ ३ ॥
तेरे विषयमें जो मूढ़ । उनको है तू वक्र-तुंड ।
ज्ञानियोंके लिये अखंड । सन्मुख ही तू ॥ ४ ॥
देखनेमें छोटी देवकी दृष्टि । किंतु मिलनोन्मिलनमें सृष्टि ।
करती सृष्टि लय दोनों गोष्टि । सहज लीलासे ॥ ५ ॥
प्रवृत्ति कर्णकी हलचलसे । छूटे मद गंधानिलसे ।
पूजा करते नील कमलसे । जीव-भ्रमरोंके ॥ ६ ॥
निवृत्ति कर्णके हिलनेसे फिर । पूजा वह सहज व्यर्थ होकर ।
दिखाता तब अपना अलंकार । खुले शरीरका ॥ ७ ॥
मानो वामांगीका लास्य विलास । जो है वही जगद्रूप आभास ।
तांडव नृत्य-कलाका विलास । दिखाता है तू ॥ ८ ॥
देख होता है यह चकित । होता है तू जिसका भी आप्त ।
आप्त व्यवहारसे विरत । होता है वह ॥ ९ ॥