ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे अहंकार बल । मिल करके सकल ।
दर्प सागर उछल- । आता असीम ॥ ९३ ॥
ऐसे उछलता हुवा दर्प । बढ़ाता काम-पित्त-प्रकोप ।
पाकर उसका फिर ताप । भड़कता क्रोधाग्नि ॥ ९४ ॥
तब मानो जेठका जलाता आतप । तथा तेल घीका साथ ले हो प्रकोप ।
होता अग्नि-वायुका तांडव-प्रताप । उसी भांति ॥ ९५ ॥
अहंकारके साथ बल । दर्प काम-क्रोधसे मिल ।
प्रकट हुवा जिस स्थल । पांडुकुमार ॥ ९६ ॥
ले अपना वे आदेश । रखेंगे क्या रीता शेष ।
करनेमें सर्व-नाश । कौनसा कहां ॥ ९७ ॥
पहले वे धनुर्धर । अपना मांस रुधिर ।
देंगे सब परमार । अभिचारार्थ ॥ ९८ ॥
जहां जलते हैं सब तन । उसमें जो “मैं” होता अर्जुन ।
उस “मैं” आत्मापे आक्रमण । होता है वह ॥ ९९ ॥
तथा ऐसा अभिचार होता कहां । उपद्रव उसके हो जहां तहां ।
मैं रूप चैतन्य होता वहां वहां । उसे होती पीड़ा ॥ ४०० ॥
रहते हैं जो अभिचारसे भिन्न । उनपे दोष-दृष्टिके पाषाण ।
फेंकते रहते हैं जो अर्जुन । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥
तभी मैं उनको दंड देता हूँ—
सती तथा जो है सज्जन । दानशील याज्ञिक जन ।
तपस्वी अद्भुत महान । संन्यासी भी ॥ २ ॥
भक्त या होते हैं महात्मा । होते जो मेरा निज-धाम ।
आधार लेता नित धर्म । उनके सदनका ॥ ३ ॥
द्वेषसे भर ऐसों पर । कालकूटसे भरकर ।
अपशब्दोंके तीखे तीर । चलाते रहते हैं ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६२