ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥
इसभांति सभी प्रकारसे । बरतते हैं मेरे शत्रुसे ।
सुन तू मैं उन पापियोंसे । कैसे निपटता हूं ॥ ५ ॥
मानव-देहका ले आश्रय । करते हैं जगतका क्षय ।
वह पदवी मैं धनंजय । छीन लेता हूं ॥ ६ ॥
तथा फेंकता क्लेश-ग्रामके घूरे पर । अथवा भव-पुरके पन-घाट पर ।
उस तम-योनिमें ऐसे मूढोंको फिर । देता हूं जन्म ॥ ७ ॥
फिर आहारके नामसे जहां । घास भी नहीं उगता है वहां ।
व्याघ्र वृश्चिक सब आते कहां । वहां डालता ॥ ८ ॥
भूखके दुःखसे तडपते । अपने आपको तोड खाते ।
जनमते मरते रहते । उस स्थानपे ॥ ९ ॥
अपने ही विषसे जिनके । चर्म हैं जलते शरीरके ।
बिलमें रहते सिकुडके । सांप बन वह ॥ ४१० ॥
श्वास लेनेमें है जाता । जिनका समय पार्थ ।
आराम नहीं मिलता । उन दुर्जनोंको ॥ ११ ॥
ऐसे करोडों कल्प । गिननेमें है अल्प ।
उतना काल खप- । जाता उनका ॥ १२ ॥
उनको जिस स्थानपे है जाना । पहला पडाव है यह स्थान ।
आगेके होते हैं अति दारुण। दुःख उनके ॥ १३ ॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौंतेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥
द्वेषी क्रूर तथा पापी जगमें हीन जो जन ।
उन्हें मैं फेंकता नित्य आसुरी योनिमें फिर ॥ १९ ॥
आसुरी योनियां पाके अनेक जन्म जन्ममें ।
मुझसे न मिले ही वे पाते जाते अधोगति ॥ २० ॥
६६३ देवासुर-संपद्विभाग-योग