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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 737

काम-क्रोधसे सदा-सर्वत्र दूर रहना चाहिये—
काम-क्रोध तथा लोभ । फूटते तीनोंमें कोंभ ।
फलता वहां अशुभ । जान तू यह ॥ २५ ॥
समस्त दुःखोंका अर्जुन । करानेके लिये दर्शन ।
नियुक्त किये हैं ये तीन । पथ-दर्शक ॥ २६ ॥
या पापियोंको नरक-भोगमें । पहुँचानेके लिये जगतमें ।
पातकोंकी वीर परिषदमें । श्रेष्ठ ये तीन ॥ २७ ॥
रौरवादि नरक महान् । सुनाते नहीं कमी पुराण ।
जब तक न उठते तीन । हृदयमें ये ॥ २८ ॥
अपाय होते इससे सुलभ । होता है यातनाओंका लाभ ।
“हानी” हानी नहीं होती अशुभ । हानी ये तीन ॥ २९ ॥
क्या कहू मैं धनुर्धर । कहे ये निकृष्ट चोर ।
तथा नरकका द्वार । खुला हुवा ॥ ४३० ॥
काम-क्रोध लोभमें जीव । पोसता है जो निज-भाव ।
सम्मान पाता है पांडव । नरक-सभामें ॥ ३१ ॥
इसीलिये तू पुनःपुन । काम-क्रोध लोभ ये तीन ।
दक्ष रहके निशिदिन । तजना पार्थ ॥ ३२ ॥
एतैर्विमुक्तः कौंतेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
पहले छोड इनका साथ । फिर है धर्मादि पुरुषार्थ ।
करनेकी बात है पार्थ । सोचना सारी ॥ ३३ ॥
हृदयमें ये तीन हैं जागृत । तबतक भलाई होगी प्राप्त ।
ऐसी नहीं सुनी गयी है बात । देवोंसे भी ॥ ३४ ॥
तमके द्वार ये तीन टालके छूटता जब ।
कल्याणमार्गसे जाके पाता है गति उत्तम ॥ २२ ॥
६६५ देवासुर-संपद्विभाग-योग