ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये श्रद्धा स्वाभाविक । रहती सदा त्रिगुणात्मक ।
रज तम तथा है सात्विक । भेद यहां जो ॥ ६७ ॥
जिस भांति है जीवन उदक । किंतु होता है विषमें मारक ।
अथवा होता है मिर्चमें तीव्र । ईखमें मधुर ॥ ६८ ॥
ऐसे पाता है जो जनम । या मरण साथ ले तम ।
उसका होता परिणाम । उसीका रूप ॥ ६९ ॥
जैसे काजल या हो मसी । उसमें न भिन्नता ऐसी ।
वैसे ही श्रद्धा जो तामसी । या तममें नहीं ॥ ७० ॥
वैसे श्रद्धा तमोगुणीमें । होती है तमके रूपमें ।
पूर्ण रूपसे सात्विकीमें । होती है सात्विक ॥ ७१ ॥
ऐसे है यह सकल । बसा है ब्रह्मांड गोल ।
श्रद्धा-मात्रसे केवल । ढाल करके ॥ ७२ ॥
किंतु गुणत्रयके कारण । किया त्रिविध-रूप धारण ।
श्रद्धाने भी यह साधारण । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥
फूलसे जैसे वृक्ष जाना जाता । या बोलसे मानस जाना जाता ।
या सुख दुःखसे जाना-जाता । पूर्व-संचित ॥ ७४ ॥
वैसे अब पांडुकुमार । जानना श्रद्धाके प्रकार ।
कहता हूं लक्ष्य दे कर । सुन तू सब ॥ ७५ ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजंते तामसा जनाः ॥ ४ ॥
श्रद्धाका विविध रूप—
जिनकी सात्विक श्रद्धा । लेकर बनता बांधा ।
सदैव उनकी मेधा । रहती स्वर्गपे ॥ ७६ ॥
सत्वस्थ पूजते देव यक्ष राक्षस राजस ।
मृत प्रेतादि जो सारे पूजते लोग तामस ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७६