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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

ऐसे गुण लक्षण पूर्ण । होता है सात्विक भोजन ।
आयुष्यको देता है त्राण । नित्य-नया जो ॥ ३१ ॥
इस भांति है वह सात्विक रस । देहमें बरसता रात दिवस ।
जिससे आयुष्य नदी स-उल्लास । बढ़ती देहमें ॥ ३२ ॥
उनके सत्वका है पोषण । होता इसी अन्नके कारण ।
दिनके उन्नतिका साधन । भानु होता जैसे ॥ ३३ ॥
तथा शरीर और मन । समर्थ करता है अन्न ।
तब रोगका क्या कारण । रहता यहां ॥ ३४ ॥
होता जब सात्विक भोग्य । तब भोगते हैं आरोग्य ।
शरीरको मिला सौभाग्य । उदय होकर ॥ ३५ ॥
लेन देन होता सुखका । तथा उत्कर्ष भलाईका ।
बढ़ता स्नेह आनंदका । इससे सदैव ॥ ३६ ॥
ऐसा है सात्विक आहार । परिणाममें है मधुर ।
करता महा उपकार । अंतर्बाह्य ॥ ३७ ॥
राजसिक आहारका विवेचन—
राजसकी जिसमें है प्रीति । जिस रसमें उसकी रति ।
करूंगा उसकी अभिव्यक्ति । प्रसंगसे अब ॥ ३८ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥
कालकूट मृत्यु बिन । इतना कटु है मान ।
या चूनेसे भी अर्जुन । अधिक आम्ल ॥ ३९ ॥
आटेमें पानीके समान । कर नमकका मिलान ।
इसी भांति रसमें मान । डालते नमक ॥ १४० ॥
खारा सूखा कटू तीखा खट्टा अत्युष्ण दाहक ।
दुःख शोक तथा रोग देता आहार राजस ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८२

होता जो ऐसे नमकीन । राजसका प्रिय भोजन ।
निगलता अग्नि समान । उष्ण अतिशय ॥ ४१ ॥
भाफके छोर पर जैसे । रसके बात लगानेसे ।
बल पायेंगे दीप वैसे । भोजन उष्ण ॥ ४२ ॥
आंधीको पीछे ढकेलेगा । या साबल चुभ जायेगा ।
ऐसा तीता वह खायेगा । घावके बिन चुभता जो ॥ ४३ ॥
राखसा जो होता रूक्ष । व्यंजन होता है रूक्ष ।
जिव्हा दंशसा जो रूक्ष । भाता है उसे ॥ ४४ ॥
परस्परमें दांत । टकरायेेंगे साथ ।
ऐसे वस्तुसे पार्थ । तोषता वह ॥ ४५ ॥
पहले ही जो चटपटा होता । उसमें सरसों आदि पड़ता ।
जब उसको मुखमें डालता । नाकमें जाती बाफ ॥ ४६ ॥
आगको भी जो चुप करता । ऐसे बनता जो रायता ।
राजसको प्राणसे भी भाता । ऐसे व्यंजन ॥ ४७ ॥
कम मान जीभकी चुभन । जीभका वह पागल बन ।
भरता वह आगसा अन्न । अपने उदरमें ॥ ४८ ॥
भड़कती इससे आग अंदर । चैन न आता भूमि या सेज पर ।
पानीका पात्र नहीं होता है दूर । मुखसे कभी ॥ ४९ ॥
नहीं खाया था वह आहार । सोया हुवा व्याधि अजगर ।
चेतानेमें डाला मद्यसार । उदरमें अपने ॥ १५० ॥
होडमें उमडता परस्पर । एक साथ रोगोंको दे आधार ।
फलता ऐसे राजस आहार । दुःख रूप केवल ॥ ५१ ॥
ऐसे राजस आहार । दिखाया है धनुर्धर ।
परिणामका विचार । सविस्तृत ॥ ५२ ॥
तामसिक आहारका विवेचन—
अब तामस जिसे खाता । उसे कैसा आहार भाता ।
उसको अब मैं कहता । न कर तू घृणा ॥ ५३ ॥
६८३ श्रद्धा-निरूपण-योग

सडा गला तथा झूठना उसमें न अहित माना ।
चरती जैसे भैंस जाना वैसे खाता ॥ ५४ ॥
यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥
सबेरेका पका हुवा अन्न । दोपहरका दूसरे दिन ।
ऐसे लेता है वह भोजन । प्रेमसे तामस ॥ ५५ ॥
या आधा ही पका हुवा । या संपूर्ण जला हुवा ।
रस हीन बना हुवा । ऐसा वह खाता ॥ ५६ ॥
हुई जब रस-निष्पत्ति । मिठासकी हो अभिव्यक्ति ।
वह अन्न ऐसी प्रतीति । नहीं करता तामस ॥ ५७ ॥
कभी किसी प्रसंगसे । अच्छा अन्न मिलनेसे ।
बैठता है व्याघ्र जैसे । सडने तक ॥ ५८ ॥
पक कर हुवा बहु दिन । हुवा है वह स्वादसे हीन ।
सूखा या सडा हुवा अन्न । खाता वह प्रीतिसे ॥ ५९ ॥
ऐसे सड़ा हुवा अन्न । कीचड़सा करता सान ।
सबके साथही भोजन । करता एकत्र ॥ १६० ॥
ऐसे घिनौना वह जो खाता । उसे सुख भोजन मानता ।
इससे भी संतुष्ट नहीं होता । वह पापी ॥ ६१ ॥
देख तू यह चमत्कार । शास्त्र-निषिद्ध देखकर ।
निषिद्ध ही एकेक कर । लेता कुपथ्य ॥ ६२ ॥
अपेयका वह पान । अभोज्यका भोजन ।
करनेमें है अर्जुन । होता उतावला ॥ ६३ ॥
ऐसे तामस अन्न युक्त । होता है ऐसी आशा-युक्त ।
इसका फल भी तुरंत । मिलता उसको ॥ ६४ ॥
रस हीन तथा ठंडा बासी दुर्गंध-युक्त जो
निषिद्ध और उच्छिष्ट आहार तामस-प्रिय ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी : ६८४

जमी छूता अपवित्र । अन्नको उसका वस्त्र ।
तभी वह पाप-पात्र । बनता है ॥ ६५ ॥
फिर इसके उपरांत । खानेकी उसकी रीत ।
उदर-पूर्तिकी सतत । यातना मान ॥ ६६ ॥
शिर छेदनेसे क्या मिलता । अग्नि-प्रवेशसे जो बनता ।
उसको वह नित सहता । धनुर्धर ॥ ६७ ॥
इसीलिये जो तामस अन्न । उसके फलका क्या कथन ।
उसको खाना ही दुःख जान । कहता देव ॥ ६८ ॥
यज्ञके भी तीन प्रकार हैं—
जैसे तामस आहार । वैसे हैं यज्ञके प्रकार ।
वे भी होते तीन प्रकार । कहता हूं सुन ॥ ६९ ॥
इन तीनोंमें प्रथम । सात्विक यज्ञका मर्म ।
सुन यह सुमहिम । शिरोमणि तू ॥ १७० ॥
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
सात्विक यज्ञका विवेचन—
जैसे है एक प्रियोत्तम । उसके बिन न हो काम ।
ऐसे जिसका मनोधर्म । पतिव्रताका ॥ ७१ ॥
गंगा सिंधुको छोड़कर । नहीं जाती है किसी ओर ।
तथा आत्माको देखकर । वेद होते मौन ॥ ७२ ॥
तथा स्व-हितमें जो होती । सदा निरत चित्त-वृत्ति ।
नहीं रहती अहंकृति । फल हेतु यहां ॥ ७३ ॥
पहुंच कर वृक्षका मूल । लौटना न चाहता जल ।
सूख जाता है वहीं केवल । उसी मूलमें ॥ ७४ ॥
तजके फलकी आशा मानके करणीय है ।
विधिसे मनसे जो है करते यज्ञ सात्विक ॥ ११ ॥
६८५ श्रद्धा-निरूपण-योग

वैसे ही मन और तन । यजन निश्चयके स्थान ।
होकर सदैव विलीन । न चाहते कुछ ॥ ७५ ॥
फल अभिलाषा तजकर नित । स्वधर्म बिन अन्यमें हो विरक्त ।
करता है यज्ञ-कार्य अलंकृत । सर्वांग पूर्ण ॥ ७६ ॥
देखते हैं दर्पणमें जैसे । अपनी ही आंखोंकी ओरसे ।
या हथेली पर रत्न जैसे । दीपसे देखते ॥ ७७ ॥
या उदित होते ही दिवाकर । दीखते नाना पथ चहूं ओर ।
वैसे देखके वेदका निर्धार । चलता वह ॥ ७८ ॥
वह कुंड मंडप वेदी । अन्य भी साधन समृद्धि ।
पाता जैसी कहती विधि । वैसे वह सकल ॥ ७९ ॥
जैसे सब अलंकार यथा स्थान । शरीर पर करते हैं धारण ।
वैसे रखता वह स्वस्थान । योजन पूर्वक ॥ १८० ॥
करना क्या इसका वर्णन । देती यज्ञ विद्याही दर्शन ।
मूर्तिमंत हो आयी स्वस्थान । यज्ञ-हेतुसे ॥ ८१ ॥
वैसे सांगोपांग । होता है जो याग ।
अहंकृति भाग । डुबाकर ॥ ८२ ॥
कहते हैं उत्तम लक्षण । तुलसी वृक्षका क्षण क्षण ।
न रख कोई आशा अर्जुन । फल पुष्प छायाकी ॥ ८३ ॥
या होता है जो फलाशा बिन । योजना पूर्ण यज्ञ निर्माण ।
ऐसे यज्ञ करना जान । यज्ञ सात्विक ॥ ८४ ॥
अभिसंधाय तु फलं दंभार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥
राजसिक यज्ञका विवेचन—
कहना यह भी अर्जुन । यज्ञ वैसे ही सुलक्षण ।
जैसे राजाको निमंत्रण । श्राद्धमें जैसे ॥ ८५ ॥
फलका अनुसंधान रखके दंभपूर्वक ।
होता यजन लोगोंमें जान तू यज्ञ राजस ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८६

राजा यदि घरमें आता । अन्य भी जो कार्य साधता ।
तथा है यश भी मिलता । होता है श्राद्ध ॥ ८६ ॥
करके ऐसा पूर्ण विचार । स्वर्ग मिलेगा मरने पर ।
तथा कीर्ति होगी यहां पर । यज्ञ दीक्षासे ॥ ८७ ॥
ऐसा फलाशासे केवल । किया यज्ञ-कर्म सकल ।
यश-कीर्ति जिसका मूल । यज्ञ है राजस ॥ ८८ ॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
तामसिक यज्ञका विवेचन—
पशु-पक्षियोंके व्याहमें कमी कहीं । कामके बिना ज्योतिषीका काम नहीं ।
वैसे तामसीके यज्ञमें सर्वत्र ही । आग्रहही मूल ॥ ८९ ॥
पवन राह नहीं चाहता । मरण मुहूर्त देखता ।
निषिद्धसे नहीं है डरता । अग्नि जैसे ॥ १९० ॥
वैसे हैं तामसके आचार । न मानता विधि-व्यवहार ।
इसीलिये वह धनुर्धर । होता उच्छृंखल ॥ ९१ ॥
विधि-विधान वहां नहीं होता । मंत्र-तंत्रका स्पर्श न रहता ।
अन्न मात्र भी वह नहीं देता । भैंस भी जो खाये ॥ ९२ ॥
शत्रु-बोध है जहां ब्राह्मण । वहां आयेगी कैसे दक्षिणा ।
आंधीमें आग साथ अर्जुन । ऐसे है वहां ॥ ९३ ॥
ऐसे वहां सभी व्यर्थ होता । श्रद्धाका मुख नहीं दीखता ।
वह घर जैसे लूटा जाता । निपुत्रिकका ॥ ९४ ॥
इस भांति होता यज्ञाभास । उसका नाम यज्ञ तामस ।
कहता है यह श्रीनिवास । धनुर्धरसे यहां ॥ ९५ ॥
न है विधि न है मंत्र अन्नोत्पत्ति नहीं जहां ।
नहीं श्रद्धा नहीं त्याग वह है यज्ञ तामस ॥ १३ ॥
३८७ श्रद्धा-निरूपण-योग

जैसे गंगाका ही उदक । ले जाते भिन्न मार्गसे देख ।
तब मल एक शुद्धि एक । आता जैसे ॥ ९६ ॥
तपका स्वरूप—
तथा तीन गुणोंसे तप । हुवा है यहां तीन रूप ।
करनेसे एक है पाप । उद्धरता दूजा ॥ ९७ ॥
तपके यहां तीन प्रकार । हुए हैं जैसे पांडुकुमार ।
यह जाननेमें ही सुकर । जान तू तप क्या है ॥ ९८ ॥
कहते हैं यहां तप किसको । समझाता हूं मैं यह तुझको ।
फिर उसके तीन प्रकारको । कहूंगा मैं ॥ ९९ ॥
तप है यहां जो सम्यक । वह भी त्रिविध रूपक ।
शारीरिक औ' मानसिक । तथा वाचिक भी ॥ २०० ॥
अब त्रिविध-तपमें सुन । शारीरिक तपका लक्षण ।
जिसे जो प्रिय हो उसे मान । शंभु या श्रीहरि ॥ १ ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
शारीरिक तप सात्विक—
जिसको प्रिय देवालय । यात्रादि करनेमें समय ।
आठौ प्रहर जैसे हैं पाय । चले काल-चक्रसे ॥ २ ॥
देवांगणकी रखने स्वच्छता । पूजोपचारमें नित रहता ।
तत्पर हो वह सब करता । हाथकी शोभा जान ॥ ३ ॥
लिंग या मूर्ति है देखता । अष्टांग प्रणाम करता ।
जैसे स्वाभाविक गिरता । कोई वस्तु ॥ ४ ॥
तथा विधि-विधानसे सतत । रहते जो वृद्ध गुणी निरत ।
प्राज्ञ ब्राह्मण आदिकी जो नित । करता सेवा ॥ ५ ॥
गुरु-देवादिकी पूजा स्वच्छता वीर्य-संग्रह ।
अहिंसा ऋजुता जान देहका तप है कहा ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८८

तथा प्रवास या पीडासे । थका मांदा जो मिला उसे ।
देता है वह शुश्रूषासे । सुख और शांति ॥ ६ ॥
सभी तीर्थका जो आधार । माता पिताका है शरीर ।
उनपर है निछावर । होता सेवामें ॥ ७ ॥
वैसे ही संसार जैसा दारुण । मिलते ही जो हरता थकान ।
ज्ञान-दानमें वह सकरुण । भजता गुरु ॥ ८ ॥
तथा अग्निमें जो स्वधर्मकी । मलिनता देह-अहंताकी ।
मिटाना पुट देके आवृत्तिकी । पुनः पुनः पार्थ ॥ ९ ॥
भूतजातमें वह वस्तुको जान । करता परोपकार औ' नमन ।
स्त्री-विषयमें करता क्षण क्षण । निग्रह मनका ॥ २१० ॥
जन्मके ही प्रसंग । स्पर्श हुवा स्त्री अंग ।
आगे है जन्म सांग । रखना शुद्ध ॥ ११ ॥
भूतजातमें एक । वस्तुको वह देख ।
नहीं जो तृण तक । करता भंग ॥ १२ ॥
इस भांतिका जब आचरण । करता रहता जिसका तन ।
तब उसमें खिला यह जान । शारीरिक तप ॥ १३ ॥
करना यह सब पार्थ । देहसे ही है विशेषता ।
तभी मैं उसको कहता । तप शारीरिक ॥ १४ ॥
एवं शारीरिक जो तप । दिखाया है उसका रूप ।
कहता हूं सुन निष्पाप । तप वाङ्मय ॥ १५ ॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५॥
वाणीका तप सात्विक—
लोहेका आकार तूक । न घटाकर कनक ।
करता कैसे है देख । पारस वैसे ॥ १६ ॥
हितार्थ बोलना सत्य प्रेमसे न खले कभी ।
स्वाध्याय करना नित्य वाणीका तप है कहा ॥ १५ ॥
६८९
(३३) श्रद्धा-निरूपण-योग

ऐसे जो नहीं दुखाता । जो सुनता सुख पाता ।
ऐसा ही वह बोलता । साधुतासे ॥ १७ ॥
पानी तो वृक्षको दिया जाता । किंतु पासका घास उगता ।
ऐसे है एकसे कहा जाता । होता सबका सुख ॥ १८ ॥
जैसे अमृतकी गंगा बहकर । करती है वह प्राणोंको अमर ।
स्नानसे पाप ताप विनाश कर । देती है शांति ॥ १९ ॥
वैसे है अविवेकको मिटाता । अपना अनादित्व दिलाता ।
पीयूषसा रुचि न विघडाता । सुननेवालेकी ॥ २२० ॥
जब कोई है पूछता । तब है ऐसा बोलता ।
या आवर्तन करता । नाम या निगम ॥ २१ ॥
ऋग्वेदादि जो है तीन । जा बसते वाग्भुवन ।
बनता जैसे वदन । ब्रह्मशाला ॥ २२ ॥
नहीं तो कोई भी नांव । शैव अथवा वैष्णव ।
बनाता वाचा वाग्भव । तप मानके ॥ २३ ॥
मानसिक तप, सात्विक—
अब तप जो मानसिक । यह भी कहता हूं देख ।
कहे लोक-नाथ नायक । इस समय ॥ २४ ॥
मनःप्रसादःसौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
सरोवरको यदि तरंग । तजते हैं आकाशको मेघ ।
या चंदन-वनको आग । उसी भांति ॥ २५ ॥
नाना कला-वैषम्य चंद्र । तजती चिंतायें नरेंद्र ।
अथवा है क्षीर समुद्र । मंदराचल ॥ २६ ॥
प्रसन्न वृत्ति सौम्यत्व आत्म-चिंतन संयम ।
भावना रखना शुद्ध मनका तप है कहा ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९०

वैसे नाना विकल्प-जाल । छोड़कर जाते सकल ।
मन रहता है केवल । स्वरूपावस्थामें ॥ २७ ॥
उष्णताके बिन प्रकाश । जाड्य बिन अन्नमें रस ।
रिक्तता बिन अवकाश । होता जैसे ॥ २८ ॥
देखकर अपना विश्रांति-स्थान । अपना स्वभाव छोड़ता है मन ।
शीतसे कांपने न देता है तन । अपने ही शीतसे ॥ २९ ॥
जैसे अचल कलंक बिन । चंद्र-बिंब होता परिपूर्ण ।
वैसे सुशोभित स्वच्छ मन । होता है जो ॥ २३० ॥
मिट गये हैं वैराग्यके आघात । तथा पचा मनका अस्वास्थ्य पार्थ ।
बन गया है वहां उत्तम खेत । निज-बोधका ॥ ३१ ॥
तभी विचार करने शास्त्र । चलना चाहते जो एकत्र ।
वह है कभी वाचाका सूत्र । नहीं पकड़ता ॥ ३२ ॥
स्व-लाभका लाभ होते ही जब । मनका मनत्व मिटता तब ।
नीर-स्पर्शसे पिघलता सब । लवण जैसे ॥ ३३ ॥
जब वहां भाव ही नहीं उठता । इंद्रियोंके पीछे वह कैसे दौड़ता ।
तब यह कैसे कह तू पहुंचता । विषय-ग्राममें ॥ ३४ ॥
इसीलिये है मनमें ऐसे । भाव-शुद्धि होती है आपसे ।
रोम-शुद्धि हथेलीपे जैसे । होती है आप ॥ ३५ ॥
अधिक क्या कहें अर्जुन । यह दशा पाता है मन ।
तब मन-तपाभिधान । प्राप्त करता ॥ ३६ ॥
किंतु अब तू यह जान । मानस तपका लक्षण ।
श्रीकृष्ण कहता संपूर्ण । कहा मैने ॥ ३७ ॥
इसीलिये देह वाचा चित्त । करता जो विविधत्व प्राप्त ।
वह है सामान्य तप पार्थ । जाना तूने ॥ ३८ ॥
अब गुण-त्रयके संगसे । यही त्रिविध रूप लेनेसे ।
क्या होता यह प्रज्ञा बलसे । सुन तू अब ॥ ३९ ॥
३९१ श्रद्धा-निरूपण-योग

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
सात्विक तप—
तभी यह तप है त्रिविध । कहा है तुझसे प्रबुद्ध ।
वह करें हो पूर्ण श्रद्ध । छोडके फलाशा ॥ २४० ॥
वह संपूर्ण सत्व-शुद्धि । करता हो आस्तिक बुद्धि ।
तब उसको है सुबुद्धि । कहते तप सात्विक ॥ ४१ ॥
राजसिक तप—
सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥
या करने तपका स्थापन । जगमें द्वैत कर उत्पन्न ।
प्राप्त करने सर्वोच्च स्थान । लोगोंमें तब ॥ ४२ ॥
तथा त्रिभुवनका सन्मान । नहीं पाये कोई अन्य जन ।
पंगतमें सर्वोच्च आसन । पाने भोजनमें ॥ ४३ ॥
अथवा विश्वके स्तोत्र । बनना है आप मात्र ।
विश्व ही अपनी यात्रा । करने आये ॥ ४४ ॥
तथा लोगोंसे ले पूजा विविध । आश्रय बने आप यह साध ।
इससे भोग भोगें सर्व-विध । इस आशासे ॥ ४५ ॥
करके अंगांगका श्रृंगार । सजाता है तपसे शरीर ।
तडपती बेचने शरीर । वेश्या जैसे ॥ ४६ ॥
रखके धन-मानमें आस । तपते हैं करके आयास ।
तब ऐसा ही तप राजस । कहलाता है ॥ ४७ ॥
त्रिविध तप जो सारा श्रद्धा उत्कट जोडके ।
तजके फलकी आशा होता है वह सात्विक ॥ १७ ॥
चाहके मान सत्कार करते दंभ-पूर्वक ।
वह चंचल तू जान तप राजस अस्थिर ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९२

पहुरणी जब थन चूसता । गायके पास दूध न रहता ।
या जानवर खेतको चरता । न मिलती उपज ॥ ४८ ॥
तपका ऐसे प्रदर्शन । करनेसे वह अर्जुन ।
होता है फलसे विहीन । कष्टसे जो किया था ॥ ४९ ॥
देख कर ऐसे विफल । छोड़ता है तप सकल ।
तभी होता वह चंचल । तप राजस ॥ २५० ॥
जैसे अकालके बादल । भर देते नभ - मंडल ।
नहीं टिकते क्षण-काल । गरज कर भी ॥ ५१ ॥
राजस तप ऐसा होता । फलते निष्फल बनता ।
आचरणमें न टिकता । सिद्धि तक ॥ ५२ ॥
देख तू अब वही तप । किया जाता तामस रूप ।
इह-परमें परंतप । होता व्यर्थ ॥ ५३ ॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
तामसिक तप-
केवल मूर्खताका संचार । जीवमें होकर धनुर्धर ।
माना जाता अपना शरीर । शत्रुरूप ॥ ५४ ॥
जहां पंचाग्निकी ज्वाल । जलाती देह सकल ।
मानो तन मन बल । बनाके समिधा ॥ ५५ ॥
मस्तकपे जलाते गुगूल । या पेटमें चुभाते हैं कील ।
या जलाते हैं अंग सकल । आगसे अपना ॥ ५६ ॥
तथा रोककर श्वासोच्छ्वास । करते व्यर्थ ही उपवास ।
या करते धूममें वास । हो अधोमुख ॥ ५७ ॥
हठसे जो किया जाता करके आत्म-पीडन ।
तथा जो पर-घातार्थ कहाता तप तामस ॥ १९ ॥
६९३ श्रद्धा-निरूपण-योग

तथा हिमोदकमें आकंठ । नदीमें या पाषाणपे बैठ ।
जीते मांसके टुकडे काट । डालते हैं ॥ ५८ ॥
ऐसे भांति भांतिसे काया । जला घुलाके धनंजया ।
नाशार्थ तप कहलाया । दूसरोंके ॥ ५९ ॥
अंग-भारसे छूटा पाषाण । गिरके टूटता आप जान ।
आता है जो उसका हनन । करता राहमें ॥ २६० ॥
अपनेको देकर दुःख । पाते रहते हैं जो सुख ।
करने उन्हे अधोमुख । तप जो करते ॥ ६१ ॥
ऐसे दुःखका कर स्वीकार । करते हैं तप धनुर्धर ।
स्व-पर घातक हैं जो घोर । तप तामस ॥ ६२ ॥
ऐसे सत्त्वादिके कारण । होते तपके प्रकार तीन ।
उसको व्यक्त किया है जान । स्पष्ट रूपसे ॥ ६३ ॥
करनेमें अब कथन । सहज प्रसंग है जान ।
कहता दानका लक्षण । तीन प्रकारके ॥ ६४ ॥
इन्ही गुणके कारण । दान भी त्रिविध जान ।
वही तू पहले सुन । सात्विक कैसे ॥ ६५ ॥
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥
सात्विक दान—
करते स्वधर्माचरण । पाया है आप जो धन ।
उसको देना स-संमान । किसी समय ॥ ६६ ॥
मिलता सु-बीज प्रसंग । नहीं मिलता खेत चांग ।
ऐसा यह दानका योग । दीखता मुझे ॥ ६७ ॥
अनर्घ्य रत्न चढ़ता हाथ । तब स्वर्ण न मिलता पार्थ ।
दोनो मिलते हैं एक साथ । न आता ऐसा योग ॥ ६८ ॥
धर्मके भावसे देना उपकार न चाहके ।
देश काल तथा पात्र देखके दान सात्विक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ६९४

किंतु पर्व सुहृद् संपत्ति । इन तीनोंकी होती है युति ।
जब करता भाग्य उन्नति । अपना तब ॥ ६९ ॥
इस भांति होता हो तो दान । बने जो सत्वका संघटन ।
वहां है देश-काल भाजन । सब उगते हैं ॥ २७० ॥
करना पहला ऐसा प्रयास । होना कुरुक्षेत्र या काशीवास ।
नहीं हो तो ऐसा कोई देश । धनुर्धर ॥ ७१ ॥
तब हो रवि-चंद्र राहु मेल । होने पाये ऐसा ही पुण्य-काल ।
अथवा हो ऐसा कोई निर्मल । काल दूसर ॥ ७२ ॥
ऐसे ही स्थल-काल हो एकत्र । मिले ऐसे ही संपत्ति पात्र ।
जैसे मूर्त-रूप ही पवित्र । आया हो वहां ॥ ७३ ॥
सदाचारका हो सदन । चलता हो वहां वेद-दान ।
ऐसे द्विज-रत्न पावन । आया हो वहां ॥ ७४ ॥
उनके पद-तलमें पार्था । उत्सर्ग करना वित्त सत्ता ।
जैसे पतिके सम्मुख कांता । आती जैसे ॥ ७५ ॥
या पराई धरोहर । सांस लेते लौटाकर ।
या राजाको जो किंकर । देता है पान ॥ ७६ ॥
ऐसे हो निष्काम अंतःकरण । करना भूमि धनादि अर्पण ।
तथा उठने न देना अर्जुन । फलेच्छा कभी ॥ ७७ ॥
और जिसको देना है दान । पात्र वह ऐसे हो अर्जुन ।
न करे कभी उसका मन । लौटानेका नाम ॥ ७८ ॥
यदि कोई आकाशको पुकारता । आकाश उसका उत्तर न देता ।
या उलटे देखनेसे न दीखता । दर्पणमें जैसे ॥ ७९ ॥
गेंद जैसे पानी पर । मारनेसे भी दे जोर ।
न आता उछलकर । अपने हाथमें ॥ २८० ॥
अथवा सांडको दिया चारा । तथा कृतघ्नको माना प्यारा ।
न मानते वे उपकार । उसी भांति ॥ ८१ ॥
६९५ श्रद्धा-निरूपण-योग

करता है जो दानका अंगीकार । न कर सके कभी प्रत्युपकार ।
वैसे रहता दाताको भूलकर । चितमें भी वह ॥ ८२ ॥
ऐसी परिस्थितिमें जो दान । सहज दिया गया अर्जुन ।
जान तू वही सात्विक दान । सबमें श्रेष्ठ ॥ ८३ ॥
वही है स्थल और काल । घटता पात्रका सुमेल ।
दान-भाग भी है निर्मल । होना न्यायगत ॥ ८४ ॥
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥
राजसिक दान—
दूधकी आशा मनमें रखकर । लाते हैं नित गायको चराकर ।
तथा उपजकी आशा रखकर । करते खेत जैसे ॥ ८५ ॥
या दृष्टि रख उपहार पर । बुलाते हैं आप्तोंको घर पर ।
या वायन भेजते घर पर । गोद भरनेवालोंके ॥ ८६ ॥
काटकर सूदका धन । देते हैं जैसे आप ऋण ।
या लेकर शुल्कका धन । औषध वैद्य ॥ ८७ ॥
जैसे जिसे दिया जो दान । काम आये वह स-साधन ।
ऐसी भावना रख अर्जुन । दिया जाता जो ॥ ८८ ॥
अथवा कोई राह चलता । जो है किसी काम नहीं आता ।
मिलता है तब पांडुसुत । द्विजोत्तम ऐसा ॥ ८९ ॥
एक भी कवडीके लिये । गोत्रजोंने जो पाप किये ।
सर्व प्रायश्चित्तके लिये । छोडता उदक ॥ २९० ॥
वैसे ही पारलौकिक । वांछना रख अनेक ।
दिया जाता वह एक । ग्रासमें भी न आता ॥ ९१ ॥
उपकार अपेक्षासे अथवा फल चाहके ।
क्लेश-पूर्वक जो देते जान तू दान राजस ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९६

ले जाता ब्राह्मण जब दान । थकता बडी हानि मान ।
लुट लिया सारा ही धन । चोरोंने जैसे ॥ ९२ ॥
सुन इस मनोवृत्तिसे । दिया जाता जो दान उसे ।
कहाता त्रिलोकमें जैसे । राजस दान ॥ ९३ ॥
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
तामसिक दान—
म्लेच्छोंका जो वसति-स्थान । धर्म-हीन स्थान या वन ।
या शिविर हो या कुस्थान । चौराहेका ॥ ९४ ॥
ऐसे स्थान पर धनंजय । सांझ हो या रातके समय ।
उदारतासे करता व्यय । चोरीका धन ॥ ९५ ॥
पात्र वहां ग्राम या नागरी । सामान्य स्त्रियां हो या जुआरी ।
मूर्तिमंत जो भूलसे पूरी । भूल-मात्र ॥ ९६ ॥
रूप नृत्यका जो प्रदर्शन । होता वहां आंखोंको दर्शन ।
तथा भाटोंका गीत-श्रवण । होता कर्ण जप ॥ ९७ ॥
अल्प-स्वल्प फिर जो मादक । पुष्प चंदनादि सुगंधिक ।
उसमें उतरता भ्रामक । वेताल तामस ॥ ९८ ॥
वहां लूटे हुए अनेक । भूषण स्वर्ण-रत्नादिक ।
डालता अन्न छत्र एक । वधिकोंको जैसे ॥ ९९ ॥
ऐसे जो जो है दिया जाता । उसे मैं तामस कहता ।
उसमें भी दैवसे होता । और सुयोग ॥ ३०० ॥
दैवयोगसे गुणाक्षर घडता । अथवा तालियोंमें काग फंसता ।
वैसे ही देशमें आ जुडता । तामसोंका पर्व ॥ १ ॥
धरके भावना तुच्छ देश काल न देखके ।
बिना आदर जो देते जान तू दान तामस ॥ २२ ॥
६९७ श्रद्धा-निरूपण-योग

जब देख तमोगुणी संपन्न । भाग्यसे आया कोई लेने दान ।
तब वह फूलता साभिमान । नशामें उन्मत्तसा ॥ २ ॥
नहीं होती मन में श्रद्धा पार्थ । न झुकाता वह अपना माथ ।
आप नहीं करता या कराता । अर्घ्यादिक ॥ ३ ॥
नहीं देता अभ्यागतको आसन । वहां गंधाक्षतकी बात ही कौन ।
तामसमें कहां ये सब लक्षण । कह तू होंगे संभव ॥ ४ ॥
कुछ देकर जैसे लौटाते ऋणदाता । वैसे उसके हाथमें वह कुछ देता ।
तू तुकार कर बोलना उसका होता । स्वभाव सदैव ॥ ५ ॥
जिसको जो कुछ जब वह देता । उसीमें करता उसकी योग्यता ।
या उसका अपमान भी करता । कुवचनोंसे ॥ ६ ॥
होता है जो इस प्रकार । धन देता पांडुकुमार ।
उसे कहता चराचर । तामस दान ॥ ७ ॥
सत्वको स्पष्ट करनेके लिये रज तम दिखाया है—
ऐसे हैं जिनके लक्षण । इन लक्षणोंके जो तीन ।
कहे हैं ये दान दे ध्यान । रज तम पर ॥ ८ ॥
यहां मैं यह जानता । मनमें है तू सोचता ।
तेरी यह कल्पकता । है विलक्षण ॥ ९ ॥
जो है भव-बंध मोचक । कहा गया कर्म सात्विक ।
तब क्यों कहता सदोष । कर्मका लक्षण ॥ ३१० ॥
जैसे पिशाचको नहीं हटाते । गढ़ा हुवा धन न पा सकते ।
या यदि धुंएको नहीं सहते । न लगता दीप ॥ ११ ॥
शुद्ध सत्व पर भी वैसे सतत । पट पडता रज-तमका पार्थ ।
उसको भेदनेकी यह जो बात । अस्वाभाविक क्या ? ॥ १२ ॥
श्रद्धा दानादि जो सभी पार्थ । हमने तुझको क्रियाजात ।
कहे हैं अब उसमें व्याप्त । तीनों ही गुण ॥ १३ ॥
वहां कहनेके ये जो तीन । उद्देश्य न रखता था मन ।
बतानेमें सत्वके लक्षण । कहे ये दो भी ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९८

अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

दोनोंमें जब तीसरा होता । दोनोंको तजनेसे मिलता ।
अहोरात्र त्यागसे मिलता । संध्यारूप जैसे ॥ १५ ॥
वैसे रज-तमका विनाश । डालता उत्तम प्रकाश ।
तब दीखता सत्व विशेष । स्पष्टरूपसे ॥ १६ ॥
एवं दिखानेमें सत्व तुझ । दिखाया है तम तथा रज ।
वह छोड़ सत्वसे तू काज । साध ले अपना ॥ १७ ॥
सत्वसे जो ऐसे निर्मल । कर तू यज्ञादि सकल ।
जिससे होगा करतल । सकल सिद्धि ॥ १८ ॥
सूर्य जब प्रकाशित करता । जगमें तब क्या न दीखता ।
वैसे ही सत्वसे नहीं मिलता । फल वह कौन ॥ १९ ॥
अजी ! जो मन भाया फल । प्राप्त करनेमें सकल ।
तथा मोक्षमें मी निश्चल । होता समर्थ ॥ ३२० ॥
इससे भिन्न है बात एक । उसका साथ मिलता नेक ।
तब पैठता वह सात्विक । मोक्ष-ग्राममें ॥ २१ ॥
होता है जब स्वर्ण शुद्ध । तथा राजाक्षरसे सिद्ध ।
चलन कहाता प्रसिद्ध । उसी भांति ॥ २२ ॥
स्वच्छ शीतल सुगंध । जल होता सुख-प्रद ।
किंतु पावित्र्य संबंध । आता तीर्थसे ॥ २३ ॥
नाला हो कितना ही अपार । जब गंगा करती स्वीकार ।
तब होता उसका सागर- । प्रवेश संभव ॥ २४ ॥
वैसा सात्विक कर्म अर्जुन । करने आता मोक्षालिंगन ।
न होता तब अधिक जान । भिन्न जो वह बात ॥ २५ ॥
सुन यह वचन धनुर्धर । कहता हृदय उमड़ कर ।
प्रभो ! कह वह कृपा कर । अति शीघ्र ॥ २६ ॥
तब वह कृपा-गुण-चक्रवर्ती । कहता सुन उसकी अभिव्यक्ती ।
दिखाता जो सात्विक कर्म मुक्ती- । दीप सदैव ॥ २७ ॥
६९९ श्रद्धा-निरूपण-योग

यज्ञादिके आदि लेनेका मंगल-नाम—
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
ऐसे अनादि परब्रह्म । जगदादि विश्रामधाम ।
उसका है एकही नाम । कहा तीन प्रकारसे ॥ २८ ॥
वास्तविक वह नाम जाति रहित । किंतु पडे जो अविज्ञातममें ग्रस्त ।
उनके लिये श्रुतिने किया चिन्हित । जाननेमें उसे ॥ २९ ॥
नव जात शिशुको जैसे । कोई नाम न होता उसे ।
बुलाते तो रखे नामसे । जी कह उठता ॥ ३३० ॥
संसार-दुःखसे जो हैं पीडित । जीव आते उसके पास नित ।
उनको ओ ! देता है संकेत । जो यह नाम ॥ ३१ ॥
मिटे पर-ब्रह्मका चिर-मौन । तथा अद्वयत्वसे हो मिलन ।
ऐसा मंत्र दिया हो सकरुण । श्रुति-माताने ॥ ३२ ॥
वेदका दिया हुवा जो नाम । सुनते ही वह पर-ब्रह्म ।
सम्मुख आता वह परम । होता जो पीछे ॥ ३३ ॥
किंतु निगमाचल शिखर पर । बसे जो उपनिषदार्थ नगर ।
करते वहां ब्रह्म सह विहार । वही जानते यह ॥ ३४ ॥
रहने दे वह प्रजापति । रखता सृष्टि कर्तृत्व-शक्ति ।
उसका आधार है आवृत्ति । इस नामकी ॥ ३५ ॥
हुवा जब सृष्टिका उपक्रम । सुन अर्जुन उसके प्रथम ।
पगलाया हुवा-सा यह ब्रह्म । था अकेला ही ॥ ३६ ॥
मुझ ईश्वरको जो न जानता । तथा सृष्टि भी न कर सकता ।
ऐसेको वह महान बनाता । नाम एक ॥ ३७ ॥
ॐ तत्सत् तीन नामोंसे किया निर्देश ब्रह्मका ।
जिससे ये हुए वेद यज्ञ याज्ञिक आदि में ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७००

उस नामका हृदयमें चिंतन । उस वर्ण-त्रयका नित स्मरण ।
करनेसे योग्यता विश्व-सृजन । आयी उसमें ॥ ३८ ॥
रचे तब ब्रह्माने जन । तथा वेद जैसे शासन ।
और यज्ञ सम वर्तन । जीवन रूप ॥ ३९ ॥
ऐसे कितने लोक फिर । सृजन किये हैं अपार ।
ब्रह्म-दत्त दे अग्रहार । बने त्रिभुवन ॥ ३४० ॥
ऐसे नाम-मंत्रसे महान । बना जो ब्रह्मदेव अर्जुन ।
उसका रूप अब तू सुन । कहता श्रीकांत ॥ ४१ ॥
ओं तत्सत्का दर्शन—
यहां सब मंत्रोंका राजा । आदि प्रणव वह दूजा ।
है तत्कार और जो है तीजा । वहां सत्कार ॥ ४२ ॥
एवं जो ओं तत्सदाकार । ब्रह्मनाम त्रि-प्रकार ।
पुष्प सुगंध सुंदर । लेते उपनिषद ॥ ४३ ॥
इनसे होकर जब एक । कर्म चलता है सात्विक ।
बन जाता है नित सेवक । मोक्ष घटमें ॥ ४४ ॥
कर्पूरके भी अलंकार । देगा यदि दैव लाकर ।
उन्हे चढाना देह पर । है कठिनाई ॥ ४५ ॥
वैसे आचरण किया सत्कर्म । उच्चारण किया ब्रह्मका नाम ।
किंतु नहीं जानता यदि मर्म । विनियोगका ॥ ४६ ॥
साधुओंका समुदाय । घर आता धनंजय ।
किंतु होगा पुण्यक्षय । अवज्ञासे ॥ ४७ ॥
अथवा करने अलंकार । स्वर्णकी पोटली बंधकर ।
गलेमें बांधली धनुर्धर । उसी भांति ॥ ४८ ॥
लेता मुखसे ब्रह्म-नाम । हाथमें हैं सात्विक कर्म ।
प्रयोगके बिन जो कर्म । होता व्यर्थ ॥ ४९ ॥
अजी ! अन्न और जो भूख । साथ रखा हुवा भी देख ।
खाना न जानता बालक । घडता उपवास ॥ ३५० ॥
७०१ श्रद्धा-निरूपण योग