ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजगमें जो समान सरूप । हिताहित दिखाता है दीप ।
वह अमान्य करता बाप- । वेदको जो ॥ ४६ ॥
आसुरी स्वैराचारी इह-परमें सुख शांति नहीं पा सकता—
नहीं करता विधिका पालन । न है जिसको आत्म-हित भान ।
बढ़ाता जाता है भूख नित अर्जुन । इंद्रियोंकी जो ॥ ४७ ॥
कामादिकका आश्रय नहीं छोड़ूँगा । अपने वचनका पालन करूंगा ।
कहकर स्वेच्छाचार रत रहेगा । कुमार्गी जो ॥ ४८ ॥
मुक्ति-प्रवाहका नीर । नहीं पा सकेगा वह नर ।
स्वप्नमें भी यह धनुर्धर । असंभव जान ॥ ४९ ॥
गया ही उसका पर-लोक । किंतु सुख भी वह ऐहिक ।
भोग नहीं सकता तू देख । भली भांति ॥ ४५० ॥
मछलीकी आशासे ब्राह्मण । बन गया जो धीवर मान ।
वहां भी उसे नास्तिक जान । न लेंगे अपनेमें ॥ ५१ ॥
विषयका लोभ धरकर । खोता पारलौकिक जो नर ।
उसको यहांसे भी सत्वर । ले जाती मृत्यु ॥ ५२ ॥
ऐसे पर-लोकमें ना स्वर्ग । यहां भी नहीं सुखोपभोग ।
तब आयेगा कैसा प्रसंग । मोक्षका वहां ॥ ५३ ॥
तमी करके काम का बल । सुख-भोग चाहते सकल ।
वे दोनोंमें होते हैं विफल । न होता उद्धार ॥ ५४ ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
वेद आज्ञाके अनुसार कर्तव्य करते जा—
इस कारणसे अर्जुन । चाहता जो अपना कल्याण ।
वेदकी आज्ञाका उल्लंघन । न करें कभी ॥ ५५ ॥
व्यवस्था जान लेनेमें यहां कार्य अकार्यकी ।
जानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको ॥ २४ ॥
३६७ देवासुर-संपद्विभाग-योग