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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 752

करना सदैव ऐसा संग । सत्व-पोषणका हो अंग ।
तथा सत्व-वृद्धिका हो भाग । लेना ऐसा अन्न ॥ ११ ॥
साधकके लिये आहारका महत्व—
जो है अति-स्वाभाविक । स्वभाव वृद्धि कारक ।
आहारसे नहीं नेक । साधन शक्त ॥ १२ ॥
प्रत्यक्ष देख तू यहां वीर । भला मनुष्य सुरा पीकर ।
करता कैसे मत्त होकर । उसी क्षणमें ॥ १३ ॥
अथवा जो मनमाने अन्न-सेवन । करता तब वात-पित्तके कारण ।
या नव-ज्वरमें दूध होता अर्जुन । दुःख-दायक ॥ १४ ॥
अथवा अमृत जैसे । टालता मरण वैसे ।
तथा है विष लेनेसे । आती मृत्यू ॥ १५ ॥
वैसे ही लेनेसे जो आहार । लेता है धातु वही आकार ।
धातु जैसे वैसे ही अंतर । करता भाव पुष्ठ ॥ १६ ॥
या तपनेसै जैसे बर्तन । तपता अंदर जल जान ।
वैसे धातु वश है अर्जुन । चित्त-वृत्ति ॥ १७ ॥
इसीलिये सात्विक सेवन । करनेसे होगा वृद्धि सत्व-गुण ।
तथा रज तम रसका सेवन । बढाता है वही ॥ १८ ॥
तमी कौन सात्विक आहार । रज तमका क्या क्या आकार ।
कहता हूं यह धनुर्धर । आदरसे सुन ॥ १९ ॥
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥
आहारका विविध रूप—
उसी भांतिसे है आहार । हुए कैसे तीन प्रकार ।
तुझसे यह धनुर्धर । कहूंगा सुन ॥ १२० ॥
आहार भी सभीका है तीन भांति यथा रुचि ।
यज्ञ दान तपमें भी कहता भेद तू सुन ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८०