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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 745

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शास्त्ररहित श्रद्धापूर्वक पूजनेवालोंकी क्या गति होती है?--
अर्जुन कहे तमाल-श्याम । इंद्रियोंसे गोचर तू ब्रह्म ।
करते हैं तेरे शब्द-ग्राम । साशंक हमको ॥ ३४ ॥
अन्य नहीं शास्त्रके बिन । जीवका स्व-मोक्ष साधन ।
ऐसे कहता तू श्रीकृष्ण । किसभांति ॥ ३५ ॥
यदि न मिलता ऐसा देश । तथा नहीं काल अवकाश ।
करना ऐसा शास्त्राभ्यास । वह भी दूर ॥ ३६ ॥
तथा अभ्यासके जो साधन । वह भी प्राप्त नहीं है जान ।
ऐसेमें करें क्या कैसे कौन । अभ्यास उसका ॥ ३७ ॥
अनुकूल नहीं प्राचीन । प्रज्ञाका साथ जिसे जान ।
दूर है शास्त्र-संपादन । उसके लिये ॥ ३८ ॥
अजी ! मानते शास्त्रका विषय । नहीं मिलता एक भी आश्रय ।
इसीलिये जिन्होंने छोड दिया । शास्त्रका विचार ॥ ३९ ॥
किंतु निर्धार कर शास्त्र । अर्थानुष्ठानसे पवित्र ।
वास करते जो पात्र । सुख पूर्वक ॥ ४० ॥
उनका-सा हमको होना । ऐसे सोच चित्तमें जान ।
करते हैं आलंबन । उस मार्गका ॥ ४१ ॥
देखके पाठके अक्षर । करे बालक अनुसर ।
अंधा चलता आगे कर । भलेको जैसे ॥ ४२ ॥
वैसे सर्व शास्त्र निपुण । उनका देख आचरण ।
चलते हैं जान प्रमाण । श्रद्धासे आप ॥ ४३ ॥
फिर शिवाविक पूजन । तथा भूम्यादि महादान ।
अग्नि-होत्रादि जो यजन । करते श्रद्धासे ॥ ४४ ॥
उन्हे कह सत्य रज तम । किसमें गिनता पुरुषोत्तम ।
मिले उनको कौन गति हम । जाने कैसे ॥ ४५ ॥
वैकुंठ पीठका तब लिंग । निगम-पद्मका जो पराग ।
जिसकी अंग छाया है जग । जीवित जान ॥ ४६ ॥
(३२) ६७३: श्रद्धा-निरूपण-ओवि