ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुन उन्होंने इस भांति । कमाके आसुरी संपत्ति ।
पायी है ऐसी अधोगति । उसके बदलेमें ॥ १४ ॥
फिर व्याघ्रादि तामस । योनियोंमें है अल्पसा ।
देहधारण ढारस । मिलता है ॥ १५ ॥
वह भी मैं फिर छीन लेता । तब तमका ढेर बनाता ।
अंधारभी काला हो जाता । वहां पहुंचके ॥ १६ ॥
आसुरी लोगोंके लिये ज्ञानेश्वरकी करुणा—
तब उससे पाप भी घिनाता । नरक भी उससे भय खाता ।
थकान श्रमसे मूर्छित होता । थककर जो ॥ १७ ॥
इनसे मल भी मलता । ताप भी इनसे तपता ।
इनके नामसे डरता । महा भय भी ॥ १८ ॥
पाप भी इनसे उकताता । अशुभ इनसे है अशोभता ।
भ्रष्टत्व भी इनसे है डरता । भ्रष्टाचारसे ॥ १९ ॥
विश्वमें जो अति हीन । अधम तम अर्जुन ।
भोगते वे सब स्थान । तामस योनिके ॥ ४२० ॥
रोती है वाचा कहनेमें कथा । स्मरणसे मन पीछे हठता ।
मूर्खोंने कितना जोडा है पार्था । यह पाप सारा ॥ २१ ॥
इसलिये कहू ये असुर । संपत्ति पोसते भयंकर ।
होती ऐसी अधोगति घोर । केवल मात्र ॥ २२ ॥
इसलिये तुझे धनुर्धर । जहां संपदा होती आसुर ।
मुडना भी कभी उस ओर । है अनुचित ॥ २३ ॥
तथा दंभादि छ दोष । करते हैं जहां वास ।
तजना है सहवास । उनका सदैव ॥ २४ ॥
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
काम क्रोध तथा लोभ करते आत्म-नाश जो ।
तीन ये नरक-द्वार टालना इनको नित ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६४