ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपडा है समुद्रमें पार्थ । तैरने नहीं जो समर्थ ।
तथा नहीं उसके हाथ । और पांव भी ॥ १०० ॥
या वैद्यका द्वेष कर । औषध ठुकरा कर ।
होगा कैसे रोग दूर । किसीका कभी ॥ १ ॥
करके आंखोंसे विरोध । उन्हें फोडले प्रतिशोध ।
पड़ा रहता बन अंध । कोनेमें कहीं ॥ २ ॥
इसी प्रकार ये असुर । शास्त्रोंका करके धिःकार ।
करते हैं बन-संचार । अविवेकसे ॥ ३ ॥
काम जो कराता वह करते । क्रोध मरवाते उसे मारते ।
मुझे दुःखके गढेमें गाढ़ते । सभी ये लोग ॥ ४ ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
अपने या पराये देहको । देते हैं वे दुःख जो उसको ।
भोगना होता मुझ आत्माको । पांडुकुमार ॥ ५ ॥
वाचाके भी अंचलसे । स्पर्श न करता जिसे ।
तजनेके लिये उसे । कहना पडा ॥ ६ ॥
स्पर्शसे जैसे प्रेत हटाते । शब्दसे चांडालको तजते ।
हाथ लगाकर जैसे धोते । मलको वैसे ॥ ७ ॥
वहां शुद्धिके ही हेतुसे । लेप नहीं मानते वैसे ।
उन्हे तजनेके हेतुसे । कहा यह यहां ॥ ८ ॥
होगा तुझे जब दर्शन । असुरोंका तब अर्जुन ।
करना मेरा ही स्मरण । प्रायश्चित्त रूप ॥ ९ ॥
तभी श्रद्धा जो सात्विक । जीव-भावसे हो एक ।
जतन करना नेक । सर्वतोपरी ॥ ११० ॥
गलाते मुझ आत्माको सोखके देह-धातुको ।
ऐसे विवेक-हीनोंकी निष्ठा है जान आसुरी ॥ ६ ॥
६७९ श्रद्धा-निरुपण-योग