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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 750

जाने दो कोई बांधता सरोवर । उसीकी तृषा हरता है क्या नीर ।
रसोई पाकानेवालेको ही घर । मिलता क्या अन्न ॥ ९० ॥
इससे अधिक क्या कहूंगा । गौतमकी लाई हुई गंगा ।
उससे वंचित है क्या जग । कह तू मुझसे ॥ ९१ ॥
तमी अपना अधिकार जान । करता जो शास्त्रोंका अनुष्ठान ।
श्रद्धासे उसका अनुकरण । कर तरता मूर्ख ॥ ९२ ॥
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा-तप—
शास्त्रके नामसे भी जो पार्थ । न जानते आरंभकी बात ।
शास्त्रज्ञोंको रखते सतत । गांवके बाहर ॥ ९३ ॥
देख कर बडोंकी बात । करते हैं ठठोली तात ।
तथा देखके वे पंडित । बजाते चुटकियां ॥ ९४ ॥
करके बड़ा अभिमान । आचरते तपाचरण ।
दंभसे भरकर पूर्ण । पाखंड रचते ॥ ९५ ॥
दूसरोंके शरीरमें शस्त्र । चुभाके छील उसके गात्र ।
रक्तसे लेते प्रणीत-पात्र । भर भर कर ॥ ९६ ॥
वह रक्त आगमें गिराते । भूतके मुखमें भी लगाते ।
तथा बालकोंका बलि देते । उन भूतोंको ॥ ९७ ॥
आग्रहके बलपर । क्षुद्र देवताको धर ।
करते हैं सत्र घोर । अपाचारका ॥ ९८ ॥
अजी ! करके स्वपर पीडन । तम क्षेत्रमें बीज बोते जान ।
आगे पाते हैं वही वे अर्जुन । फलके रूपसे ॥ ९९ ॥
शास्त्र-निषिद्ध जो घोर दंभसे करते तप ।
अहंतासे भरे सारे काम राग बली जन ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७८