ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वभावसे ही प्राणि जात । अनादि पापके पड हाथ ।
बन गये त्रिगुणके साथ । एक रूपसे ॥ ५६ ॥
उसमें पाते वे अवनति । तथा चाहते हैं वे उन्नति ।
होती है तब वैसी ही वृत्ति । जीवोंकी सब ॥ ५७ ॥
वृत्ति-सा तब संकल्प करते । संकल्प-सा सब कर्म करते ।
तथा कर्मानुसार ही करते । शरीर-धारण ॥ ५८ ॥
बीज मिटकर वृक्ष होता । फिर वृक्ष बीजमें समाता ।
कल्पोंसे ऐसे चलता आता । किंतु न नाशता वृक्ष ॥ ५९ ॥
उसी भांति है यहां अपार । होता रहता है जन्मांतर ।
त्रिगुणत्व अव्यभिचार । प्राणियोंके साथ ॥ ६० ॥
इसीलिये प्राणियोंके साथ । रहती है श्रद्धा जो सतत ।
जैसे होते गुण वैसे पार्थ । यह जान तू ॥ ६१ ॥
बढता कभी सत्वशुद्ध । ज्ञानकी चाह होती सिद्ध ।
किंतु दोनों होते विरुद्ध । यहां तब ॥ ६२ ॥
होती तब सत्य विषयक । श्रद्धा जो मोक्ष-फल दायक ।
किंतु रज तम सहायक । होंगे क्या कभी ॥ ६३ ॥
सत्वके बलको तोड कर । चढता रज आकाश पर ।
होती तब श्रद्धा कूडा घर । कर्म-उसका झाडू ॥ ६४ ॥
फिर उठती तमकी आग । करती है वह श्रद्धा भंग ।
तब चाहता विषय-भोग । भोगनेमें निषिद्ध ॥ ६५ ॥
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३
ऐसे है सत्व रज तम । श्रद्धा-रूप जान सुधर्म ।
नहीं रखता जीव ग्राम । इससे कुछ भिन्न ॥ ६६ ॥
स्वभाव जिसका जैसे श्रद्धा वैसे मिले उसे ।
श्रद्धासे ही बना जीव श्रद्धा-सा वह भी रहा ॥ ३
६७५ श्रद्धा-निरूपण-योग