ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 744, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब अर्जुनका मानस । कहता यह ऐसा कैसा ।
शास्त्रके बिना नहीं ऐसा । कर्मसे मुक्ति ॥ २३ ॥
तक्षकके फन परसे । निकाल लेना मणि कैसे ।
अथवा तोडें बाल कैसे । सिंहकी नाकका ॥ २४ ॥
मणि तब उसमें पिरोना । तथा अलंकारसे सजना ।
नहीं तो क्या वैसे ही रहना । खुले गलेसे ॥ २५ ॥
शास्त्रोंकी जो मत-भिन्नता । उसे कहो कौन जानता ।
होगी कैसी एक-वाक्यता । फलदायी उसकी ॥ २६ ॥
होने पर भी एक-वाक्यता । होगी क्या आचरण शक्यता ।
तथा जीवन होगा विस्तृत । इतना कैसे ॥ २७ ॥
तथा शास्त्र अर्थ देश काल । इन चारोंका जो एक फल ।
मिलेगा ऐसा योग सकल । किसको कब ॥ २८ ॥
तभी शास्त्रोचित घड़ना । असंभव है यह जान ।
अज्ञानी जो मुमुक्षु जन । उसकी गति क्या ? ॥ २९ ॥
पूछनेमें यह अर्जुन । करता है प्रस्ताव जान ।
आरंभ कहांसे कथन । करनेका ॥ ३० ॥
सबके विषयमें जो वितृष्ण । तथा सकल कलामें प्रवीण ।
कृष्णको आश्चर्य है जो कृष्ण । अर्जुनत्वमें ॥ ३१ ॥
शौर्यसे जुड़ा हुवा आधार । तथा सोम-वंशका शृंगार ।
सुखादिके लिये उपकार । जिसकी लीला ॥ ३२ ॥
प्रज्ञाका है जो प्रियतम । ब्रह्म विद्याका है विश्राम ।
सहचर औ' मनोधर्म । देवका है जो ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
अर्जुनने कहा
शास्त्रकी विधिको छोड श्रद्धासे पूजते जन ।
कौन सी उनकी निष्ठा सत्व या रज या तम ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७२