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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 740

जान कर पतिका मत । उसपे चलके सतत ।
सहज पाती आत्म-हित । पतिव्रता जैसे ॥ ५६ ॥
अथवा श्रीगुरुका वचन । करके नित परिपालन ।
कर लेना है आत्म-मंचन । अपना वैसे ॥ ५७ ॥
अंधेरेमें रखा कोई सामान । प्राप्त करलेना हो तो अर्जुन ।
सदा दीप करते हैं जान । आगे वैसे ॥ ५८ ॥
पुरुषार्थोंका संपूर्ण । स्वामी होना तो अर्जुन ।
श्रुति स्मृतिके वचन । मानना वंद्य ॥ ५९ ॥
शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य सुख भोग भी तृण मानना ।
विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द भी विरुद्ध ॥ ४६० ॥
ऐसी जिसकी वेदकी निष्ठा । स्थिर हुई तो देख सुभटा ।
होगी कैसी आहितकी भेट । कहां किसको ॥ ६१ ॥
अहितसे जो निकालती । हित करके जो बढाती ।
ऐसी दूसरी न दीखती । श्रुति-मातासी ॥ ६२ ॥
कराती यह ब्रह्मसे मिलन । न करना कभी अवहेलन ।
कर तू इसका सदा अर्जुन । विशेष आश्रय ॥ ६३ ॥
आज तू यहां है पार्थ । शास्त्रोंको सुनले सार्थ ।
जन्म लिया है हितार्थ । धर्म-कार्यके ॥ ६४ ॥
तथा धर्मानुज नामसे । बोध होता सहजतासे ।
इससे भिन्न कुछ ऐसे । करना नहीं ॥ ६५ ॥
कार्याकार्यका विवेक । करना शास्त्रोंको देख ।
अकृत्य जो कुछ देख । तजना उसे ॥ ६६ ॥
तथा जो कुछ है करणीय । दृढतासे उसका आश्रय ।
करके संपन्न धनंजय । करना उसको ॥ ६७ ॥
विश्व-प्रामाण्यकी जो है मुरी । आज तेरे हाथमें सुबुद्धी ।
लोक-संग्रहार्थ तू त्रिशुद्धी । योग्य है इससे ॥ ६८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६८