ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
या प्रकृतिमें रत हो कर । इंद्रियोंको दुलारकर ।
मेरे मतको ठुकरा कर । बरतते हैं ॥ ९४ ॥
तथा इसको तुच्छ मानते । इसकी जो अवज्ञा करते ।
इसे बेकार बात मानते । वाचालतासे ॥ ९५ ॥
हैं ये मोह मदिरासे अमित । विषय बिषमें रत सतत ।
अज्ञान कीचमें पतित नित । निःसंशय ॥ ९६ ॥
शवके हाथमें दिया रत्न । जैसे व्यर्थ जाता है अर्जुन ।
जन्मांधको उदयास्त दिन । अनुपयुक्त ॥ ९७ ॥
या हे चंद्रका उदय जैसा । कागको अनुपयुक्त वैसा ।
मूर्खको है विवेक भी वैसा । अरुचिकर ॥ ९८ ॥
वैसे ही जान तू पार्थ । विमुख जो परमार्थ ।
उनसे बात सर्वथा । न की जाती ॥ ९९ ॥
तभी वे कछु न मानते । निंदा भी करने लगते ।
पतंग कैसे क्या सहते । कभी प्रकाश ? ॥ २०० ॥
दीपसे पतंगका आलिंगन । उनका वहां निश्चित मरण ।
ऐसा होता है विषयाचरण । आत्मघातसा ॥ १ ॥
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥
शरीर नाशवान है—
तभी इंद्रियोंका दुलार । न करें कभी जानकर ।
मन रंजनके खातिर । त्याज्य मान ॥ २ ॥
अजी सापसे क्या खेल होगा । या बाघका साथ क्या निभेगा।
या हलाहल कभी पचेगा । खाया तो ॥ ३ ॥
जैसी खेलमें आग लगती । न संभलते बढ़ती जाती ।
वैसी स्थिति इंद्रियोंकी होती । दुलारनेसे ॥ ४ ॥
ज्ञानीकी कर्म-चेष्टा भी चलती निज भावसे ।
स्वभाव वश हैं प्राणी बलात्कार निरर्थक ॥ ३३ ॥
९७ कर्मयोग
(13)
वैसे तो सुन अर्जुन । शरीर है पराधीन ।
नाना भोग क्यों निर्माण । करें सब ॥ ५ ॥
आयास करके बहुत । सकल ही समृद्ध जात ।
इस देहको अनवरत । पाले क्यों ? ॥ ६ ॥
सर्वस्व तज कर । संपत्तिको पाकर ।
स्वधर्म छोड़कर । पालना देह ॥ ७ ॥
फिर है यह पंच मेलका । अनुसरेगा पंच तत्वका ।
तब अपने किये श्रमका । मूल्य क्या है ? ॥ ८ ॥
केवल शरीर पोषण । धोखा मान असाधारण ।
इस पर अतःकरण । न देना कभी ॥ ९ ॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत् तो ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥
इसलिये स्वधर्माचरण ही करना—
वैसे इंद्रियोंके हितार्थ । विषय दिये नियमित ।
होगा संतोषित चित्त । यह है सच ॥ २१० ॥
किंतु जैसे सभ्य चोरका साथ । केवल समाजमें है विश्वस्थ ।
निश्चित ही है करता जो घात । एकांत आते ही ॥ ११ ॥
अजी विषकी है मधुरता । उपजाती चितमें ममता ।
परिणाममें भयंकरता । प्राणहारी ॥ १२ ॥
जैसे कंटियामें लगाया आमिष । भुलाता है मीनको दिखाके आस ।
वैसे भुलाते हैं विषय सुखाश । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥
आमिषमें कांटिया होती । प्राणको वह हर लेती ।
आमिषमें वह छिपी होती । न जानता मीन ॥ १४ ॥
वैसे यहां अभिलाषामें होगा । यदि विषयकी आशा करेगा ।
अभिलाषासे है बलि जायेगा । क्रोधानलका ॥ १५ ॥
इंद्रियोंके स्व-अर्थोंमें रहते राग द्वेष हैं ।
उन्हें वश नहीं होना देहीके पथ-शत्रु वे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ९८
शिकारी जैसे घेरकर। देखता है सु-अवसर ।
मारनेमें रहे तत्पर । मृगको सदा ॥ १६ ॥
यहां ऐसा ही होता है । संग उचित नहीं है ।
पार्थ काम औ' क्रोध है । अति घातुक ॥ १७॥
उसका आश्रय नहीं करना । मनमें स्मरण भी न धरना ।
ल्लान नष्ट नहीं होने देना । स्वधर्मकी ॥ १८ ॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥
स्वधर्ममें मृत्यु भी श्रेष्ठ है—
अजी ! स्वधर्म जो है अर्जुन । यदि आचरणमें कठिन ।
किंतु उसीका है अनुष्ठान । शुभदायक ॥ १९॥
यदि पराया आचार । देखनेमें है सुंदर ।
किंतु करना स्वीकार । अपना ही ॥ २२० ॥
शूद्रके घरके मिष्टान्न । खाये कैसे वह ब्राह्मण ।
हुआ भी है अति उद्विग्न । भूखसे ॥ २१ ॥
करना कैसे अनुचित । अनुचित इच्छाको प्राप्त ।
इच्छा हुई तो अनुचित । वह साधना क्या ? ॥ २२ ॥
दूसरोंका घर सुंदर । देखके अपना कुटीर ।
करें गिरानेका व्यापार । उचित क्या ? ॥ २३ ॥
अजी ! है अपनी सती । यदि कुरूप भी होती ।
संसारमें वही गति । वैसे ही यह ॥ २४ ॥
चाहे जैसे असुविधा-जनक । आचरणमें कष्ट-दायक ।
फिर भी स्वधर्म ही है तारक । इह परमें ॥ २५ ॥
अल्प भी अपना धर्म सु-सेव्य पर-धर्मसे ।
स्वधर्ममें भला मृत्यु पर-धर्म भयंकर ॥ ३५ ॥
९९ कर्मयोग
अजी ! शर्करा तथा दूध । रुचिकर अति प्रसिद्ध ।
है क्रिमिरोगमें निषिद्ध । कैसे सेव्य ॥ २६ ॥
जानकर भी किया सेवन । होगा ही वह दुःख कारण ।
कुपथ्यसे होता है जीवन । अति कष्टकर ॥ २७ ॥
तभी औरोंको जो उचित । अपनेको है अनुचित ।
जो अंतिम हितके हित । अनाचरणीय ॥ २८ ॥
करनेमें स्वधर्मानुष्ठान । नष्ट होता है यदि जीवन ।
तो भी भला है वह अर्जुन । दोनों अर्थसे ॥ २९ ॥
ज्ञान पूर्वक स्वधर्माचरण नहीं करते उनका क्या—
ऐसा समस्त सुरशिरोमणि । बोले जहां श्रीशार्गपाणी ।
अर्जुन कहे वहां विनवणी । सुनो देव ॥ २३० ॥
यह है तेरा कहना । मैंने वह सारा सुना ।
किंतु अब कछु पूछना । मेरे मनकी ॥ ३१ ॥
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥
तभी देव यह है कैसा । ज्ञानियोंका स्मृति-भ्रंश-सा ।
पथ-भ्रष्ट होके सहसा । चलते हैं ॥ ३२ ॥
सर्वज्ञ ही हैं वे होते । औ' उपाय भी जानते ।
अधर्ममें व्यभिचरते । वह किस गुणसे ॥ ३३ ॥
अजी ! बीज तथा है भूसा । अंध न जाने चुनना कैसा ।
क्षण भर चतुर भी वैसा । बहकता क्यों ? ॥ ३४ ॥
जो संसारका संग भी हैं छोड़ते । वे संग संसर्गसे गुप्त न होते ।
वनवास छोड़कर भी हैं आते । जन-पदमें ॥ ३५ ॥
अर्जुनने कहा
मनुष्य करता पाप किसकी प्रेरणा लिये ।
जुता हुवा व्यर्थका-सा स्वेच्छाके प्रतिकूल भी ॥ ३६ ॥
ज्ञानेश्वरी १००
स्वयं पापसे हैं हटते । सर्वस्वसे अलिप्त होते ।
फिर उसीमें आ पचते । बलात्कारसे ॥ ३६ ॥
जिससे अरुचि है मनसे । वे ही आ चिपकते चितसे ।
टालना चाहें सतत जिसे । वही लिपटते हैं ॥ ३७ ॥
दीखता यहां बलात्कार । यहां चलता किसका जोर ।
जानना चाहूं चक्रधर । कहता पार्थ ॥ ३८ ॥
हृदय कमलका आराम । योगियोंका जो निष्काम ।
कहता है श्री पुरुषोत्तम । कहता हूं सुन ॥ ३९ ॥
भगवान उवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
इसका मूल रजोगुण—
अजी ! सुन ये कामक्रोध जो हैं । इनमें दयाका नाम नहीं है।
ये कृतांत यमके ही सम हैं । मान ले तू ॥ ३४० ॥
ये हैं ज्ञान निधिके भुजंग । विषय काननके हैं बाघ ।
भजन मार्गके हैं ये मांग । अति घातुक ॥ ४१ ॥
ये हैं देह दुर्गके आधार । इंद्रिय ग्रामके सरदार ।
अविवेक करते गदर । विश्वमें सब ॥ ४२ ॥
रजो गुण है मनका । मूल है असुरताका ।
पोषण किया इनका । अविद्याने ॥ ४३ ॥
यदि हैं ये रजसे संपन्न । किंतु हैं तमसे भी अभिन्न ।
तभी उसने दिया आसन । प्रमाद मोहका ॥ ४४ ॥
मृत्यु नगरके भीतर । मान है इनका अपार ।
करते जीवनका वैर । इसीलिये ॥ ४५ ॥
श्री भगवानने कहा
यह तो काम औ' क्रोध जो रजो-गुणसे बने ।
बडे खाऊ तथा पापी वैरी हैं जान तू इन्हे ॥ ३७ ॥
१०१ कर्मयोग
इनकी भूखकी अभिलाष । जो कहती विश्वं है एक ग्रास ।
इसकी प्रबंधक है आस । जो असीम ॥ ४६ ॥
लीलामें जब यह मुट्ठी कसती । चौदहों भुवनोंको ओछा मानती ।
इसकी भगिनी भ्रांति कहलाती । अति लाड़ली ॥ ४७ ॥
कौर बनाकर इक लोकत्रयका । खेल खेलती सहज निगलनेका ।
दासी-पनमें इठलाती है भ्रांतिका । तृष्णा वहां ॥ ४८ ॥
होता है वहां मोहका सम्मान । जिससे अहंका है लेन-देन ।
सर्वत्र करता तांडव महान । चातुर्यसे जो ॥ ४९ ॥
सत्यका जिसने सार निकाल कर । उसमें अकृत्यका भूसा भरकर ।
दंभ रूढ किया वह विश्वभर । इसने ही ॥२५० ॥
साध्वी शांतिको सुन नग्न किया । हत्यारी मायाका श्रृंगार किया ।
साधु समाजको भ्रष्ट कराया । उनसे यहां ॥ ५१ ॥
नींव मिटा दी विवेककी । खाल उतारी वैराग्यकी ।
गर्दन तोड़ दी निग्रहकी । जीते जी ॥ ५२ ॥
उजाड़ा संतोष वनको । गिराया धैर्यके दुर्गको ।
उखाड़ा आनंद गाछको । जग भरमें ॥ ५३ ॥
उखाड़ा बोध पौधको । पोंछा सुखकी लिपिको ।
हियमें जलायी आगको । तापत्रयकी ॥ ५४ ॥
देहके साथ ये पैदा हुए । जीवके साथ ये जुड़ गए ।
न मिलते बैठे छिपे हुए । ब्रह्मको भी ॥ ५५ ॥
रहते हैं चैतन्यके पडोसमें । बैठते हैं ज्ञानके ही पंगतमें ।
उठते हैं कुहराम मचानेमें । तब रुकते नहीं ॥ ५६ ॥
शस्त्रके बिन ये मारते । डोरके बिन हैं बांधते ।
ज्ञानियोंको तो मिटा देते । प्रतिज्ञापूर्वक ॥ ५७ ॥
जल बिन ये डुबोते हैं । आगके बिन जलाते हैं ।
मौन रह लपेटते हैं । प्राणिमात्रको ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी १०२
बिन कीचडके ये गाड़ते । बिन पाशके भी हैं कसते ।
किसीके हाथमें न आते । काबू कभी ॥ ५९ ॥
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनाऽवृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥
चंदन वृक्षमें जैसे । लिपट रहता साप वैसे ।
या खोल रहता जैसे । गर्भ पर ॥ २६० ॥
या प्रभाके बिन भानु । हुताशन धूमके बिनु ।
या दर्पण मल हीन । कहीं न रहता ॥ ६१ ॥
ज्ञानके पास ये दुष्ट आ बसते हैं—
इनके बिन ज्ञान नहीं । न देखा है हमने कहीं ।
भूसेके बिन बीज नहीं । उपजता जैसे ॥ ६२ ॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥
वैसे ज्ञान है विशुद्ध । किंतु इनसे प्ररुद्ध ।
तभी है हुआ अगाध । पानेमें वह ॥ ६३ ॥
पहले इनको है जीतना । फिर ज्ञानको प्राप्त करना ।
इनका पराभव करना । कष्ट साध्य ॥ ६४ ॥
जब इनको जीतनेमें । घल लावे तब तनमें ।
ईंधन डालनेसे आगमें । जैसे बढती ॥ ६५ ॥
इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥
ढका है धूमसे अग्नि जैसे दर्पण धूलसे ।
जेरीसे घिरता गर्भ वैसे है ज्ञान कामसे ॥ ३८ ॥
काम-रूप महा अग्नि न होता तृप्त जो कभी ।
ज्ञानीका तो नित्य-शत्रु उसने ज्ञानको ढका ॥ ३९ ॥
इंद्रियां मन औ'बुद्धि इनका आसरा लिये ।
छिपाके ज्ञान जीवोंका करता मोह-ग्रस्त जो ॥४०॥
१०३ कर्मयोग
जो जो साधन है करते । वे सब इन्हीको बढ़ाते ।
इसीलिये येही जीतते । हठयोगियोंको ॥ ६६ ॥
इंद्रिय दमन, इनको जीतनेका उपाय है—
किंतु इन्हे जीतनेमें एक । उपाय है बडा ही नेक ।
करना हो तो करके देख । कहता हूं तुझे ॥ ६७ ॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥
इंद्रिय इनका पहला आसन । वहांसे ही होते हैं कर्म उत्पन्न ।
करना है इंद्रियोका निर्दलन । सर्वथैव ॥ ६८ ॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
दौड रुकेगी मनकी । औ' मुक्ति होगी बुध्दिकी ।
नींव हिलेगी इनकी । ये जो पापी ॥ ६९ ॥
मिटे जब ये अंतरंगसे । तभी गये ये जड मूलसे ।
न रहता मग जल जैसे । सूर्य किरण बिन ॥ २७० ॥
एवं बुद्धे परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥
तभी जीवको ब्रह्म-स्वराज्य मिलेगा—
ऐसे रागद्वेष जब मिटता । ब्रह्मात्मका तब स्वराज्य आता ।
फिर वह् आनंद है भोगता । अपने आप ॥ ७१ ॥
इनका पहला स्थान जीतके इंद्रियां सब ।
टाल तू इस पापीको ज्ञान विज्ञान नाशक ॥ ४१ ॥
इंद्रियोंको कहा श्रेष्ठ उससे श्रेष्ठ है मन ।
मनसे बुद्धि है श्रेष्ठ श्रेष्ठ है उससे प्रभु ॥ ४२ ॥
जान ऐसा प्रभु श्रेष्ठ निजको जीत आप ही ।
काम रूपी महा-शत्रु इसका नाश तू कर ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी १०४
गुरु शिष्योंके संवादमें । पद-पिंडके एकत्वमें ।
स्थिर रह नित्य-रूपमें । न उठो कभी ॥ ७२ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
सिद्ध है जो सकल सिद्धोंका । रमण है श्रीरमादेवीका ।
स्वामी सकल देवादिकोंका । कहने लगा ॥ ७३ ॥
अब पुन वह अनंत । कहेगा आदीकी जो बात ।
जब उनसे पांडुसुत । प्रश्न करेगा ॥ ७४॥
उसके बोल होंगे सरस । उसमें अनुभवेंगे रस ।
श्रोताओंमें उमडेगा उन्मेष । श्रवण सुखका ॥ ७५ ॥
ज्ञानदेव कहे निवृत्तिका । जागृत करके विवेकका ।
आप सुनिये हरि-पार्थका । संवाद सब ॥ ७६ ॥
गीता श्लोक ४३
ज्ञानेश्वरी ओवी २७६
ॐ
(14)
४
ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन-
सुकाल हुआ श्रवणेंद्रियोंका । दर्शन हुआ गीता-निधानका ।
अजी ! साकार ही हुआ स्वप्नका । उनको यहां ॥ १ ॥
मूलमें है विवेककी गोष्ठि । कहनेवाला श्रीकृष्ण श्रेष्ठी ।
भक्तराज जो स्वयं किरीटी । सुनते हैं ॥ २ ॥
पंचमालाप है सुगंध । तथा परिमल सुस्वाद ।
वहां है भलासा विनोद । कथानकका ॥ ३ ॥
श्री हरिकी कृपा हुई । अमृतकी गंगा बही ।
तपस्या सफल हुई । श्रोताओंकी ॥ ४ ॥
इंद्रियोंको अब संपूर्ण । बनकर स्वयं श्रवण ।
अनुभवना गीताख्यान । संवाद सुखका ॥ ५ ॥
अब यह अप्रासंगिक । विस्तार छोडके अधिक ।
कहो कृष्णार्जुन हो एक । बोले क्या हैं ॥ ६ ॥
तब संजय बोले राजासे । सुदैव जुड़ा है अर्जुनसे ।
तभी अति प्रीति है उनसे । नारायणकी ॥ ७ ॥
जो न कहा पिता वसुदेवसे । औ' न जो कहा माता देवकीसे ।
या न कहा गुह्य बलभद्रसे । कहा वह पार्थसे ॥ ८ ॥
देवी लक्ष्मी इतनी नजदीक । वह भी न जानती यह सुख ।
कृष्ण प्रेमका फल जो अधिक । मिला अर्जुनको ॥ ९ ॥
थी सनकादिकोंकी जो आस । सुननेकी यह उपदेश ।
किंतु उनको भी ऐसा यश । मिला नहीं ॥ १० ॥
जगदीश्वरका है प्रेम । दीखता यहां निरुपम ।
पार्थने ऐसा सर्वोत्तम । किया पुण्य ॥ ११ ॥
अजी ! जिसकी अति प्रीति । अमूर्तको बनाती व्यक्ति ।
: उसकी है एकात्म स्थिति । जंचती बहु ॥ १२ ॥
योगियोंको जो नहीं मिलता । वेदार्थमें भी जो नहीं आता ।
ध्यानस्थका नहीं पहुंचता । ध्यान चक्षुभी ॥ १३ ॥
ऐसा यह निज स्वरूप । अनादि तथा औ' निष्कंप ।
किंतु कैसा हुआ सरूप । इस भांतिसे ॥ १४ ॥
यह त्रिलोक पटका थान । जो है आकारके परे जान ।
प्रेमसे करमें है अर्जुन । कर लिया है ॥ १५ ॥
भगवान उवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥
इस योगकी प्राचीनता—
कहता है देव पांडुसुत । हमसे यह है विवस्वत ।
सुनी है योगकी गुह्य बात । बहुत पहले ॥ १६ ॥
बोले फिर वह भास्कर । योग स्थिति यह सुंदर ।
पूर्ण रूपसे सुअवसर । मनुसे तब ॥ १७ ॥
मनुने इसका अनुष्ठान । कर दिया ज्ञानोपदेश दान ।
इक्ष्वाकुको, ऐसी है महान । आदि परंपरा ॥ १८ ॥
पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय ।
मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ १ ॥
१०७ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥२॥
कितने ही इस योगसे और । हुए हैं राजऋषि जानकार ।
किंतु इस युगमें पृथ्वो पर । कोई न जानता ॥ १९ ॥
जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर ।
जिससे विस्मृति अपार । आत्म बोधकी ॥ २० ॥
अजी ! बदल गयी आस्था बुध्दि । विषय सुखकी परमावधि ।
इससे जीव हुवा है उपाधि । उन्हे भाता यही ॥ २१ ॥
गांवमें सुनो नग्न लोगोंके । काम क्या महीन कपडोंके ।
तथा जन्मांधोंमें सूरजके । कहो मुझे ॥ २२ ॥
या बहिरोंकी सभामें । गावें गीत सु-रागोंमें ।
सियारको चांदनीमें । होगी क्या चाह ? ॥ २३ ॥
अथवा पहले चंद्रोदयके । चक्षु होते हैं व्यर्थ जिनके ।
चंद्रोदयसे उन कागोंके । लाभ क्या हुआ ॥ २४ ॥
जैसे वैराग्यकी सीमा न जानते । विवेककी भाषा नहीं है सुनते ।
वैसे मूर्ख कहो कैसे जानते । मुझ ईश्वरको ॥ २५ ॥
मोहके बहुत बढनेसे । काल बहुत बीत जानेसे ।
लोप हुआ है योग इससे । इस लोकमें ॥ २६ ॥
स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥
वही योग तुझसे अर्जुन । कहा है मैंने इसी क्षण ।
उसको तू तत्वता जान । न करके भ्रांति ॥ २७ ॥
ऐसी परंपरासे जो मिला राजर्षि-वृंदको ।
आगे समय जानेसे विश्वमें लोप होगया ॥२॥
वही आज तुझे मैंने कहा योग पुरातन ।
कहा है गुह्य जो सार भक्त है तू सखा मम ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी १०८
मेरे जीवनका यह गुपित । तुझसे छिपाना नहीं उचित ।
तू है मेरा आत्मीय बहुत । इसीलिये ॥ २८॥
प्रेमका तू पुतला । भक्तिका है जिव्हाला ।
मित्रताकी चित्कला । धनुर्धर ॥ २९॥
मेरा निकट तू अर्जुन । कैसे करूं तेरी वंचना ।
रण सज्ज हुए समान । हम दोनों ॥ ३० ॥
अन्य सब अब रहने देना । कोलाहलका विचार न करना ।
अज्ञान सब तेरा दूर करना । इसी समय ॥ ३१॥
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥
आजके तूने विवस्वतसे कैसे कहा ?—
अर्जुन कहता है तब श्रीधर । माता प्रेम करती संतान पर ।
इसमें विस्मय क्या है चक्रधर । कृपानिधि ॥ ३२ ॥
संसार भ्रांतोंकी ह छाया । अनाथ जीवोंकी तू माय ।
हमने जो जन्म है पाया । तव कृपासे ही ॥ ३३ ॥
जन्म देकर पंगुको माता । कष्ट उठाती है स-ममता ।
ऐसी देव कैसे कहें वार्ता । तेरी तुझसे ही ॥ ३४॥
अब पूछूंगा देव एक बात । उस पर देना भला स्व-चित्त ।
प्रश्न पर क्रोध तू न किंचित । करो देव ॥ ३५॥
पिछली जो वह बात । तूने कही थी अनंत ।
न मानता मेरा चित्त । क्षण भी देव ॥ ३६॥
अजी ! वह विवस्वत नामका । अ-परिचित है बाप-दादाका ।
कैसा किया है तूने उनका । उपदेश देव ॥ ३७॥
अर्जुनने कहा
अभीका जन्म है तेरा पूर्वका उस सूर्यका ।
पहले ही कहा तूने कैसे मैं वह मान लूं ॥ ४ ॥
१०९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
वह है देव किस कालका । तू भीहरि है इस कालका ।
तभी दीखता तेरी बातका । असंगत पन ॥ ३८ ॥
किंतु तेरा चरित्र वैसे । हम उसको जाने कैसे ।
तभी वह असत्य ऐसे । नहीं कहता ॥ ३९ ॥
यह बात संपूर्ण ऐसे । कहना मैं समझूं वैसे ।
तूने उस सूर्यको कैसे । किया उपदेश ॥ ४० ॥
भगवान उवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥
तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं—
कृष्ण कहे तब पांडुसुत । जब था वह विवस्वत ।
तब मैं नहीं था ऐसा चित्त- । भ्रम है तेरा ॥ ४१ ॥
अजी ! तू नहीं जानता सब । जन्म हमारे तुम्हारे अब ।
बीते हैं कितने कैसे कब । यह तू भूला है ॥ ४२ ॥
मैं जिस जिस अवसरमें । अवतरा हूं जिस रूपमें ।
वह सब अपने मनमें । स्मरता पार्थ ॥ ४३ ॥
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥
धर्म रक्षणके लिये मेरा अवतार--
इसीलिये मुझे संपूर्ण । बीतेका होता है स्मरण ।
रहित मैं जन्म मरण । जन्मता प्रकृति योगसे ॥ ४४ ॥
श्रीभगवानने कहा
बीते मेरे कयी जन्म तेरे भी बहु अर्जुन ।
जानता मैं सभी बातें तू उन्हे जानता नहीं ॥ ५ ॥
होते हुये अजन्मा मैं निर्विकार जगत्प्रभु ।
जन्मता हूं स्वमायासे प्रकृति ओढके निज ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ११०
अव्ययत्व मेरा नहीं मिटता । किंतु जन्म मरण हे दीखता ।
यह सब प्रकृतिसे भासता । मुझमें नहीं ॥ ४५ ॥
मिटती नहीं मेरी स्वतंत्रता । दीखती मुझमें कर्माधीनता ।
यह हे भ्रम-बुद्धिसे घड़ता । अन्यथा नहीं ॥ ४६ ॥
एक ही दीखता दूसरा । जो दर्पणका ले आधार ।
किंतु वहां वस्तु विचार । एक मात्र ॥ ४७ ॥
निराकार हूं मैं धनुर्धर । लेकर प्रकृतिका आधार ।
नटता हूं लेकर आकार । कार्यके लिये ॥ ४८ ॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
धर्ममात्र जो संपूर्ण । युगयुगमें रक्षण ।
करना मेरा लक्षण । आदिकालसे ॥ ४९ ॥
भूलता हूं तब अजत्व । छोड़ता हूं निराकारत्व ।
गिरता जब धर्म तत्त्व । अधर्मसे ॥ ५० ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥८॥
हितार्थ अपने भक्तोंके । आता हूं अवतार लेके ।
मिटाता तब अज्ञानके । अंधकारको ॥ ५१ ॥
अधर्मकी सीमा तोड़ता । पापकी सनद फाड़ता ।
सुखका ध्वज उभारता । सज्जनोंसे ॥ ५२ ॥
दैत्य कुलका संहार करता । साधु जनोंका सम्मान करता ।
धर्म नीतिका मेल बिठाता । धनुर्धर ॥ ५३ ॥
जब है गिरता धर्म जगमें तब अर्जुन !
अधर्म उठता भारी लेता हूं जन्म मैं स्वयं ॥ ७ ॥
रक्षण कर संतोंका दुष्टोंका नाश करने ।
स्थापना करने धर्म जन्मता मैं पुनः पुनः ॥ ८ ॥
१११ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
मिटाकर अविवेकका काजल । करता हूं विवेक दीप उज्ज्वल ।
जिससे योगियोंकी दीपमाळ । जले निरंतर ॥ ५४ ॥
आत्म-सुखसे विश्व खिलता । जगतमें धर्म ही रहता ।
सात्विकताका वसंत आता । भक्त जनोंमें ॥ ५५ ॥
पापका जहां पहाड टूटता । पुण्यका है प्रभात प्रकटता ।
मेरा रूप जब प्रकट होता । धनंजय ॥ ५६ ॥
ऐसे कार्यार्थ जगतमें । जनमता हूं युगयुगमें ।
जानता जो यह विश्वमें । विवेकी वही ॥ ५७ ॥
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥
जो मेरा रूप जानते हैं वे मद्रूप होते हैं—
मैं जो अजत्वमें ही जनमता । अक्रियतामें सक्रिय रहता ।
अविकारत्व यह जो जानता । पाता वह मोक्ष ॥ ५८ ॥
संगमें वह असंग रहता । देहमें निर्देह अनुभवता ।
पंचतत्वमें जब मिल जाता । मेरे ही रूपमें ॥ ५९ ॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥
वे अपना पराया न सोचते । सदा कामना शून्य हो रहते ।
कभी वे राह भी नहीं देखते । क्रोधकी ॥ ६० ॥
सदा वे मद्भावमें ही रहते । मेरी सेवामें ही रत रहते ।
आत्म-बोधमें ही मगन होते । वीत राग हो ॥ ६१ ॥
मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य जो जानता सही ।
तजके देह पुनर्जन्म न पाता मिलके मुझे ॥ ९ ॥
नहीं तृष्णा भय क्रोध जो मेरे कार्यमें रत ।
हुये ज्ञान तपोपूत तथा मद्भावमें कयी ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ११२
होते वे तप तेजके पुंज । एकायत-ज्ञान-निकुंज ।
पवित्रतामें हैं तीर्थराज । धनुर्धर ॥ ६२ ॥
सहजमें वे मद्भाव हुये । मेरे ही रूपमें एक भये ।
फिर मेरे उनमें न आये । बीच परदा ॥ ६३ ॥
जैसे पीतलके गंज कालिख । मिटे यदि वे दोनों निःशेष ।
सुवर्णत्व इससे अधिक । क्या रहा ? ॥ ६४ ॥
पूर्ण जो यम नियममें । शुद्ध है जो तपज्ञानमें ।
हुये वे मेरे ही रूपमें । निःसंदेह ॥ ६५ ॥
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥
केवल भ्रमवश मुझ एकको अनेक देखते हैं —
मुझे जो जैसा भजता । उसको वैसा ही देखता ।
दोनोंमें आती एकता । जान यह् ॥ ६६ ॥
वैसे ही मनुष्य मात्र सकल । स्वभावसे ही है भजन-शील ।
हुए ऐस मुझमें ही केवल । पांडुकुमार ॥ ६७ ॥
किंतु ज्ञानाभावसे नाश होता । उससे ही बुद्धिभेद होता ।
उससे जगती है कल्पकता । अनेकत्वकी ॥ ६८ ॥
तभी अभेदमें भेद देखते । मुझे अनामको हैं नाम देते ।
देव देवीके रूपमें पूजते । है जो शब्दसे परे ॥ ६९ ॥
जहां जो सर्वत्र सदा सम । वहां विभाग अधमोत्तम ।
करते हैं मतिसे संभ्रम । विवेचन ॥ ७० ॥
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
भजते मुझ जो जैसे वैसे मैं भजता उन्हे ।
मेरे ही मार्गमें आते सभी हैं सब मार्गसे ॥ ११ ॥
देवोंको पूजते जो हैं चाहसे कर्म-सिद्धिकी ।
कर्मकी सिद्धि वे शीघ्र पाते हैं नर-लोकमें ॥ १२ ॥
(15) ११३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
फिर नाना हेतु प्रकारसे । यथोचित पूजोपचारसे ।
देवदेवान्तरोंको मान्यतासे । उपासते ॥ ७१ ॥
जो हैं ऐसे अपेक्षित । पाते हैं वैसे समस्त ।
कर्मफल वे निश्चित । जान ले तू ॥ ७२ ॥
बिन कर्मके लेना देना अधिक । निर्भ्रान्त ऐसा नहीं कुछ सम्यक ।
यहां है कर्म ही फल रूपक । मनुष्य लोकमें ॥ ७३ ॥
खेतमें जैसे जो कछु बोया जाता । उसके बिना अन्य न उपजता
अथवा जो देखता वही दीखता । देर्पणमें जैसे ॥ ७४ ॥
या गिरिकंदरामें जैसे । अपने ही शब्द वैसे ।
गूंजते हैं दश दिशासे । निमित्तयोग ॥ ७५ ॥
ऐसे ये सभी भजन । साक्षीभूत हूं अर्जुन ।
प्रति-फलती भावना । अपनी ही ॥ ७६ ॥
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
चातुर्वर्ण्य प्राकृतिक गुणोंके कारण—
इसी भांति तू जान । चार हैं ये वर्ण ।
रचे हैं मैंने गुण- । कर्म वि भागसे ॥ ७७ ॥
जो प्रकृतिके आधारसे । गुणोंके व्यभिचारसे ।
कर्मकी तदनुसारसे । योजना की ॥ ७८ ॥
है यहां यह एक अर्जुन । किंतु हुए हैं ये चार-वर्ण ।
ऐसे गुण कर्मके कारण । सहज हुआ ॥ ७९ ॥
तभी सुन तू पार्थ । ये वर्ण-भेद संस्था ।
कर्ता मैं न सर्वथा । इसीलिये ॥ ८० ॥
सृजे मैं ने वर्ण चार गुण-कर्म विभागसे ।
करके सब तू जान अकर्ता निर्विकार मैं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ११४
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥
मेरे कारणसे यह भया । किंतु मैंने यह नहीं किया ।
ऐसे जिसने प्रतीत किया । हुआ वह सूझ ॥ ८१ ॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
पूर्ववर्ती मुमुक्षु जन । ऐसा हूं मैं, यह जान ।
करते कर्माचरण । धनुर्धर ॥ ८२ ॥
किंतु जैसे भुने हुए बीज । उगते नहीं कभी सहज ।
वैस ही उन्हे कर्म महज । होते मोक्ष हेतु ॥ ८३ ॥
यहां और एक बात अर्जुन । यह् कर्माकर्मका विवेचन ।
अपने ही बुध्दिसे है करना । नहीं योग्य ॥ ८४ ॥
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें—
कर्म करते हैं वह कौन । या अकर्मका है क्या लक्षण ।
ऐसे सोचनेमें विचक्षण । पडते उलझनमें ॥ ८५ ॥
अजी ! खोटा सिक्का जैसा होता है । सच्चेकी समानता करता है ।
देखनेवालोंको जो डालता है । भ्रममें जैसे ॥ ८६ ॥
न लीपते मुझे कर्म न मुझे फल-कामना ।
मुझे जो जानते ऐसे कर्ममें भी अलिप्त वे ॥ १४ ॥
कर्म जो मुमुक्षुओंने किये हैं इस ज्ञानसे ।
कर तू कर्म वैसे ही उनसे पाठ लेकर ॥ १५॥
जाननेमें कर्माकर्म भ्रमते बुध्दिमान भी ।
तुझे मैं कहता कर्म छूटेगा जानके यह ॥ १६ ॥
११५ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
वैसे निष्कर्म्यके भ्रममें । पड़ते हैं कर्म-पाशमें ।
जो दूसरी सृष्टि मनमें । कर सकते ॥ ८७ ॥
मूर्खोंकी यहां कहें क्या बात । क्रांतदर्शी होते मोह-ग्रस्त ।
तभी कहता तुझसे बात । वही अब ॥ ८८ ॥
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥
तभी कर्म जिसके स्वभावसे । विश्वाकार संभव हो उससे ।
जानना उसे संपूर्ण रूपसे । यहां सर्व प्रथम ॥ ८९ ॥
वर्णाश्रममें फिर उचित । तथा विशेष कर्म विहित ।
जानना उसको सुनिश्चित । उपयोगी जो ॥ ९० ॥
फिर जानना जो निषिद्ध । उसका भी रूप विशद ।
तभी न हो सकता बद्ध । सहज कर्ममें ॥ ९१ ॥
नहीं तो विश्व है कर्माधीन । उसका फैलाव है गहन ।
सुन लक्षण अब तू अर्जुन । बोध प्राप्तोंका ॥ ९२ ॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
कर्मका तिरस्कार और कर्मफलोंमें आशा दोनों नहीं --
करते हुए सकल कर्ममें । अकर्म देखता जो अपनेमें ।
निरपेक्ष होता कर्म संगमें । फलाशासे ॥ ९३ ॥
तथा कर्त्तव्य करनेमें । अन्य न कोई जगतमें ।
ऐसेको बोध अकर्ममें । अच्छा होता है ॥ ९४ ॥
क्रिया कलापका वह संपूर्ण । करता है उत्तम आचरण ।
किंतु इन लक्षणके कारण । जानना ज्ञानी ॥ ९५ ॥
जानना कर्म सामान्य विकर्म भी विशेष जो ।
जानना अकर्ममें भी गूढ जो कर्मकी गति ॥ १७ ॥
अकर्म कर्ममें देखें तथा कर्म अकर्ममें ।
विज्ञ है वह लोगोंमें योगी वह कृतार्थ भी ॥१८॥
ज्ञानेश्वरी ११६