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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 183

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥
मेरे कारणसे यह भया । किंतु मैंने यह नहीं किया ।
ऐसे जिसने प्रतीत किया । हुआ वह सूझ ॥ ८१ ॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
पूर्ववर्ती मुमुक्षु जन । ऐसा हूं मैं, यह जान ।
करते कर्माचरण । धनुर्धर ॥ ८२ ॥
किंतु जैसे भुने हुए बीज । उगते नहीं कभी सहज ।
वैस ही उन्हे कर्म महज । होते मोक्ष हेतु ॥ ८३ ॥
यहां और एक बात अर्जुन । यह् कर्माकर्मका विवेचन ।
अपने ही बुध्दिसे है करना । नहीं योग्य ॥ ८४ ॥
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें—
कर्म करते हैं वह कौन । या अकर्मका है क्या लक्षण ।
ऐसे सोचनेमें विचक्षण । पडते उलझनमें ॥ ८५ ॥
अजी ! खोटा सिक्का जैसा होता है । सच्चेकी समानता करता है ।
देखनेवालोंको जो डालता है । भ्रममें जैसे ॥ ८६ ॥
न लीपते मुझे कर्म न मुझे फल-कामना ।
मुझे जो जानते ऐसे कर्ममें भी अलिप्त वे ॥ १४ ॥
कर्म जो मुमुक्षुओंने किये हैं इस ज्ञानसे ।
कर तू कर्म वैसे ही उनसे पाठ लेकर ॥ १५॥
जाननेमें कर्माकर्म भ्रमते बुध्दिमान भी ।
तुझे मैं कहता कर्म छूटेगा जानके यह ॥ १६ ॥
११५ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग