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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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गुरु शिष्योंके संवादमें । पद-पिंडके एकत्वमें ।
स्थिर रह नित्य-रूपमें । न उठो कभी ॥ ७२ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
सिद्ध है जो सकल सिद्धोंका । रमण है श्रीरमादेवीका ।
स्वामी सकल देवादिकोंका । कहने लगा ॥ ७३ ॥
अब पुन वह अनंत । कहेगा आदीकी जो बात ।
जब उनसे पांडुसुत । प्रश्न करेगा ॥ ७४॥
उसके बोल होंगे सरस । उसमें अनुभवेंगे रस ।
श्रोताओंमें उमडेगा उन्मेष । श्रवण सुखका ॥ ७५ ॥
ज्ञानदेव कहे निवृत्तिका । जागृत करके विवेकका ।
आप सुनिये हरि-पार्थका । संवाद सब ॥ ७६ ॥
गीता श्लोक ४३
ज्ञानेश्वरी ओवी २७६
ॐ
(14)