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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 169

स्वयं पापसे हैं हटते । सर्वस्वसे अलिप्त होते ।
फिर उसीमें आ पचते । बलात्कारसे ॥ ३६ ॥
जिससे अरुचि है मनसे । वे ही आ चिपकते चितसे ।
टालना चाहें सतत जिसे । वही लिपटते हैं ॥ ३७ ॥
दीखता यहां बलात्कार । यहां चलता किसका जोर ।
जानना चाहूं चक्रधर । कहता पार्थ ॥ ३८ ॥
हृदय कमलका आराम । योगियोंका जो निष्काम ।
कहता है श्री पुरुषोत्तम । कहता हूं सुन ॥ ३९ ॥
भगवान उवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
इसका मूल रजोगुण—
अजी ! सुन ये कामक्रोध जो हैं । इनमें दयाका नाम नहीं है।
ये कृतांत यमके ही सम हैं । मान ले तू ॥ ३४० ॥
ये हैं ज्ञान निधिके भुजंग । विषय काननके हैं बाघ ।
भजन मार्गके हैं ये मांग । अति घातुक ॥ ४१ ॥
ये हैं देह दुर्गके आधार । इंद्रिय ग्रामके सरदार ।
अविवेक करते गदर । विश्वमें सब ॥ ४२ ॥
रजो गुण है मनका । मूल है असुरताका ।
पोषण किया इनका । अविद्याने ॥ ४३ ॥
यदि हैं ये रजसे संपन्न । किंतु हैं तमसे भी अभिन्न ।
तभी उसने दिया आसन । प्रमाद मोहका ॥ ४४ ॥
मृत्यु नगरके भीतर । मान है इनका अपार ।
करते जीवनका वैर । इसीलिये ॥ ४५ ॥
श्री भगवानने कहा
यह तो काम औ' क्रोध जो रजो-गुणसे बने ।
बडे खाऊ तथा पापी वैरी हैं जान तू इन्हे ॥ ३७ ॥
१०१ कर्मयोग