सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 176

एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥२॥
कितने ही इस योगसे और । हुए हैं राजऋषि जानकार ।
किंतु इस युगमें पृथ्वो पर । कोई न जानता ॥ १९ ॥
जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर ।
जिससे विस्मृति अपार । आत्म बोधकी ॥ २० ॥
अजी ! बदल गयी आस्था बुध्दि । विषय सुखकी परमावधि ।
इससे जीव हुवा है उपाधि । उन्हे भाता यही ॥ २१ ॥
गांवमें सुनो नग्न लोगोंके । काम क्या महीन कपडोंके ।
तथा जन्मांधोंमें सूरजके । कहो मुझे ॥ २२ ॥
या बहिरोंकी सभामें । गावें गीत सु-रागोंमें ।
सियारको चांदनीमें । होगी क्या चाह ? ॥ २३ ॥
अथवा पहले चंद्रोदयके । चक्षु होते हैं व्यर्थ जिनके ।
चंद्रोदयसे उन कागोंके । लाभ क्या हुआ ॥ २४ ॥
जैसे वैराग्यकी सीमा न जानते । विवेककी भाषा नहीं है सुनते ।
वैसे मूर्ख कहो कैसे जानते । मुझ ईश्वरको ॥ २५ ॥
मोहके बहुत बढनेसे । काल बहुत बीत जानेसे ।
लोप हुआ है योग इससे । इस लोकमें ॥ २६ ॥
स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥
वही योग तुझसे अर्जुन । कहा है मैंने इसी क्षण ।
उसको तू तत्वता जान । न करके भ्रांति ॥ २७ ॥
ऐसी परंपरासे जो मिला राजर्षि-वृंदको ।
आगे समय जानेसे विश्वमें लोप होगया ॥२॥
वही आज तुझे मैंने कहा योग पुरातन ।
कहा है गुह्य जो सार भक्त है तू सखा मम ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी १०८